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एमएमडीआर संशोधन पर बाबूलाल का पलटवार

Ranchi, Dec 15 (ANI): BJP Jharkhand President Babulal Marandi speaks during a press conference at BJP party office, in Ranchi on Monday. (ANI Photo)

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के एमएमडीआर संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर लिखे पत्र का जवाब देते हुए राज्य सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगाया है।

श्री मरांडी ने आज यहां कहा कि झारखंड के आर्थिक नुकसान का पूरा दोष केंद्र सरकार पर डालना उचित नहीं है। एमएमडीआर संशोधन पूरे देश में समान रूप से लागू है, ऐसे में इससे केवल झारखंड सरकार को परेशानी क्यों हो रही है, यह सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है।

श्री मरांडी ने कहा कि केंद्र से राज्य का जायज हक मांगना गलत नहीं है, लेकिन राज्य को हो रहे नुकसान के लिए दिल्ली को जिम्मेदार ठहराने से पहले रांची की नीतियों का हिसाब देना चाहिए। उन्होंने वित्त मंत्री को लिखे पत्र में राज्य के वित्तीय प्रबंधन को लेकर कई सवाल उठाए और कहा कि वह ये सवाल अपने मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों से पूछने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं।

श्री मरांडी ने कहा कि राज्य सरकार ने उपकर (सेस) को वित्तीय समाधान बताया था। पिछले वर्ष सेस से करीब 7,500 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, लेकिन उसी वर्ष बजटीय अनुमान में 22,000 करोड़ रुपये की खनन रॉयल्टी के मुकाबले वास्तविक आय घटकर करीब 16,000 करोड़ रुपये रह गई। यानी करीब 6,000 करोड़ रुपये की कमी हुई।

उन्होंने आरोप लगाया कि कोयले पर 450 रुपये और लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन का अतिरिक्त उपकर लगाए जाने से झारखंड के खनिज बाजार में अप्रतिस्पर्धी हो गए हैं। उनके मुताबिक 30 टन के कोयला ट्रक पर 13,500 रुपये और लौह अयस्क पर 18,000 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। इसका असर खनन और क्रशर उद्योग पर पड़ा है तथा सिंहभूम क्षेत्र में कई खदानें और आयरन क्रशर बंद पड़े हैं।

श्री मरांडी ने कहा कि खनन से अधिक आय केवल सेस से नहीं, बल्कि खदानों की नीलामी और खनिज रॉयल्टी से होती है। उन्होंने पड़ोसी राज्य ओडिशा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 76 प्रमुख खनिज ब्लॉकों की नीलामी की गई और 34 खदानें चालू हुईं। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में ओडिशा को इससे करीब 87,000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।

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श्री मरांडी ने सवाल उठाया कि झारखंड में लौह अयस्क की कई खदानें बंद हैं और केंद्र से मिले कोल ब्लॉक भी शुरू नहीं हो पाए हैं। उन्होंने दावा किया कि नीलामी और खनिज उत्पादन बढ़ाकर झारखंड हर वर्ष 20 से 25 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त कमा सकता था।

श्री मरांडी ने कहा कि वैध खनिज पर भारी बोझ डालने से अवैध खनिज उसके मुकाबले सस्ता हो गया है। इससे वैध खनन घट रहा है और अवैध खनन बढ़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे राज्य सरकार को राजस्व नहीं मिलता और खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को भी इसका लाभ नहीं पहुंचता। उन्होंने सवाल किया कि झारखंड की वैध खदानें आखिर कब तक चालू होंगी और इस लंबे विलंब के लिए जवाबदेह कौन है।

श्री मरांडी ने वित्त मंत्री से यह भी पूछा कि एमएमडीआर संशोधन केवल प्रमुख खनिजों पर लागू है, जबकि लघु खनिजों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसे में पिछले वर्षों में राज्य की बालू घाटों और पत्थर खदानों की नीलामी क्यों नहीं हुई और जिनकी नीलामी हुई, वे चालू क्यों नहीं हैं। उन्होंने इससे होने वाले राजस्व नुकसान की जिम्मेदारी तय करने की मांग की।

श्री मरांडी ने आरोप लगाया कि राज्य के वित्तीय कुप्रबंधन का आलम यह है कि वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में सभी विभाग मिलकर कुल बजट का एक प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाए। उन्होंने उपयोगिता प्रमाण पत्र, निकाय चुनाव और राज्य वित्त आयोग का गठन नहीं होने के कारण हजारों करोड़ रुपये के केंद्रीय अनुदान से राज्य के वंचित होने का भी दावा किया।

उन्होंने डीएमएफटी के तहत खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए उपलब्ध करीब 19 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि इस राशि के कथित दुरुपयोग की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

श्री मरांडी ने वित्त मंत्री से सवाल किया कि क्या वह इन तमाम मुद्दों को मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों के सामने उठाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएंगे। उन्होंने कहा कि “सरकारें आती-जाती हैं, राज्य स्थायी रहता है”, लेकिन राज्य के साथ जवाबदेही का हिसाब भी स्थायी रहता है। यह बात तभी सार्थक होगी, जब जवाबदेही केंद्र से सवाल पूछने के साथ राज्य सरकार पर भी लागू हो।

Pic Credit : ANI

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