कर्नाटक उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को वचनानंद स्वामी को सत्र अदालत से मिली अग्रिम ज़मानत रद्द कर दी। स्वामी के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।
न्यायालय ने कहा कि जिस तरह से गिरफ्तारी से पहले ज़मानत दी गई, वह परेशान करने वाली कार्रवाई है। यह सुनवाई शिकायतकर्ता की उस याचिका के संबंध में हुई जिसमें सत्र अदालत के दो मई के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत आरोपी को अग्रिम ज़मानत दी गयी थी। आरोपी पर पॉक्सो कानून की धाराओं 4, 6, 8, 10 और 12 के तहत आरोप हैं।
न्यायाधीश एम नागप्रसन्ना की पीठ ने कहा कि शिकायत दर्ज होने से पहले ही अग्रिम ज़मानत दे दी गई थी और निचली अदालत द्वारा अपनाई गयी प्रक्रिया की आलोचना की। न्यायाधीश ने कहा, “गिरफ्तारी से पहले ज़मानत देने का तरीका ही इस अदालत को परेशान करता है।
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उन्होंने कहा कि आदेश का समय और परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनमें दखल देना ज़रूरी था। न्यायालय ने कहा कि ज़मानत रद्द करने का कारण सिर्फ़ आरोप पत्र दाखिल होना नहीं है, बल्कि ज़मानत का आदेश देने का तरीका है। हालांकि, न्यायालय ने वचनानंद स्वामी को तीन हफ़्ते के भीतर नियमित ज़मानत के लिए संबंधित निचली अदालत में जाने की छूट दे दी। अदालत ने उसी अवधि के लिए अग्रिम ज़मानत का संरक्षण भी बढ़ा दिया, क्योंकि आरोपी को हिरासत में नहीं लिया गया है।
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि निचली अदालत इस आदेश में की गयी टिप्पणियों से प्रभावित हुए बगैर किसी भी ज़मानत अर्ज़ी पर उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करे और साथ ही ज़मानत मामलों के तेज़ी से निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का पालन करे। सुनवाई के दौरान, शिकायतकर्ता के वकील ने पीड़ित को कथित धमकियों के बारे में भी चिंता जताई और कड़ी शर्तें लगाने की मांग की। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि पीड़ित की बात सुनी जानी चाहिए थी, जिस पर अदालत ने कहा कि पॉक्सो के मामले में पीड़ित की बात न सुनना भी ज़मानत आदेश रद्द करने का एक अहम कारण हो सकता है।
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