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ईसीआई की संवैधानिक शक्तियों के दायरे में हैं एसआईआर: सुप्रीम कोर्ट

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लागू करने का निर्णय लिया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह पुनरीक्षण चुनाव आयोग की संवैधानिक और वैधानिक शक्तियों के भीतर है और इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखना है। 

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने फैसला सुनाया कि एसआईआर प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए), 1950 या उसके तहत बनाए गए नियमों का उल्लंघन नहीं करती। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और आरपीए की धारा 21(3) के तहत ऐसी पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाने का अधिकार है।

एसआईआर की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने तीन मुख्य प्रश्न तय किए- क्या चुनाव आयोग को ऐसी प्रक्रिया करने का अधिकार है, क्या एसआईआर के तहत जांच का उद्देश्य वैध है और क्या यह आनुपातिकता की कसौटी पर खरी उतरती है, तथा क्या अपनाई गई प्रक्रिया मतदाता सूची से जुड़े कानूनी ढांचे का उल्लंघन करती है?

पहले मुद्दे पर चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया मतदाता सूची के पुनरीक्षण की वैधानिक व्यवस्था को समाप्त नहीं करती। कोर्ट ने कहा, ”जब कानून स्वयं किसी विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देता है, तो इसे केवल इसलिए अवैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया से पूरी तरह मेल नहीं खाता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों की सीमा से बाहर जाकर काम नहीं किया है और यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के दायरे में है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईआर का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक लक्ष्य से सीधे जुड़ा हुआ है। पीठ ने कहा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मतदाता सूची की शुद्धता, विश्वसनीयता और सटीकता पर भी निर्भर करते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव हैं।

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चुनाव आयोग द्वारा दिए गए कारणों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि पिछले चार दशकों से व्यापक पुनरीक्षण नहीं हुआ था और शहरीकरण, प्रवासन तथा बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने-हटाने से मतदाता सूची में दोहराव और त्रुटियों की संभावना बढ़ गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं है, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक आवश्यकता को आगे बढ़ाने के लिए भी है।

आनुपातिकता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया संवैधानिक मानकों पर खरी उतरती है और इसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। कोर्ट ने कहा कि अपनाए गए कदम उद्देश्यों से जुड़े हुए हैं और मनमाने ढंग से नाम हटाने से बचाने के लिए सुरक्षा प्रावधान शामिल किए गए हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रक्रिया के दौरान नोटिस और सुनवाई जैसे अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं और ये अधिकार मतदाता सूची नियमों के तहत ‘मूल रूप से’ सुरक्षित रखे गए हैं।

दस्तावेजी ढांचे को चुनौती देने वाली दलीलों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि सत्यापन के लिए एक संरचित प्रणाली आवश्यक होती है और चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेज मनमाने या अवैध नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव आयोग मतदाता सूची तैयार या संशोधित करते समय नागरिकता से जुड़े पहलुओं की सीमित जांच कर सकता है, लेकिन यह अंतिम नागरिकता निर्धारण नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम नागरिकता पर संदेह के आधार पर हटाया गया है, तो ऐसे मामलों को चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण के पास भेजा जाए, जो नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत निर्णय लेगा। यदि प्राधिकरण यह तय करता है कि संबंधित व्यक्ति नागरिक है, तो उसका नाम मतदाता सूची में फिर से शामिल किया जाएगा।

यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है, जिनमें एसआईआर प्रक्रिया को अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के खिलाफ बताया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे योग्य मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, जबकि चुनाव आयोग ने इसे मतदाता सूची की शुद्धता और निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में उठाया गया कदम बताया था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 29 जनवरी को विस्तृत सुनवाई के बाद इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था।

Pic Credit : ANI

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