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भारत में मुश्किल है दो दलीय व्यवस्था

हो सकता है कि यह कांग्रेस के कुछ नेताओं की सदिच्छा हो या यह भी हो सकता है कि कांग्रेस से ज्यादा भाजपा, मीडिया के एक हिस्से और राइटविंग इकोसिस्टम की सदिच्छा हो कि प्रादेशिक पार्टियां समाप्त हो जाएं। लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं दिख रही है। हां, यह जरूर है कि प्रादेशिक पार्टियों के कमजोर होने से कांग्रेस की राजनीति थोड़ी मजबूत हो जाए। ध्यान रहे भाजपा के साथ वाली प्रादेशिक पार्टियां कमजोर नहीं हो रही हैं। एकाध अपवाद हो सकते हैं लेकिन भाजपा के साथ साथ उसकी सहयोगी पार्टियां भी मजबूत हुई हैं। दूसरी ओर भाजपा विरोधी प्रादेशिक पार्टियां थोड़ी कमजोर हुई हैं। उनके कमजोर होने से कांग्रेस मजबूत हो सकती है क्योंकि उनके समर्थक मतदाता समूहों में यह मैसेज जा सकता है कि अब प्रादेशिक पार्टियां भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं और इसलिए कांग्रेस के साथ जाना चाहिए। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की धर्मनिरेपक्ष और बहुजन समाज वाली पार्टी की छवि मजबूत हुई है। इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रादेशिक पार्टियां खत्म हो जाएंगी।

असल में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के चुनाव हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद हुए विभाजन और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिव सेना में चार साल के भीतर दूसरी बार टूट होने के बाद से यह चर्चा तेज हुई है कि प्रादेशिक पार्टियों का अस्तित्व खतरे में है। इस चर्चा में एक अहम पहलू इस सदिच्छा का है कि प्रादेशिक पार्टियां खत्म हो जाएगी तो उसके बाद भारत में दो दलीय व्यवस्था बन जाएगी। सिर्फ भाजपा और कांग्रेस दो पार्टियां बचेंगी। हालांकि ऐसा सोचना सरासर मूर्खता है क्योंकि पहले भी कभी भारत दो दलीय व्यवस्था वाला देश नहीं रहा है। दो दलीय व्यवस्था उन देशों में चलती है, जिनका समाज एकरूपता वाला हैं। जिन देशों में सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, भौगोलिक स्तर पर विविधता नहीं है या कम है वहां दो पार्टियों का सिस्टम चलता है।

दो दलीय व्यवस्था की बात करने वालों के मन में यह धारणा काम करती है कि आजादी के बाद भारत में कांग्रेस इकलौती पार्टी थी। लेकिन यह धारणा गलत है। पहले चुनाव में भी 489 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस 364 सीट जीत पाई थी। बाकी 125 सीटें अन्य पार्टियों के खाते में गई थीं। कांग्रेस को 46 फीसदी ही वोट मिले थे और 54 फीसदी वोट विपक्ष को मिले थे। तब 16 सीट के साथ सीपीआई दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। उसके बाद आचार्य नरेंद्र देव और जेबी कृपलानी की पार्टियां थीं। नरेंद्र देव के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी को सीटें 12 मिली थीं लेकिन वोट 11 फीसदी के करीब मिले थे। इनके अलावा भारतीय जनसंघ भी थी और किसानों की, मजदूरों की क्रांतिकारियों की, आदिवासियों की पार्टी भी थी।

दूसरे चुनाव के बाद तो प्रादेशिक पार्टियों की संख्या लगातार बढ़ती गई। कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियों के विभाजन से कई पार्टियों का जन्म हुआ। केरल में कम्युनिस्ट सरकार बनी। छठे दशक में तो द्रविड पार्टियों का जन्म हो चुका था और छठा दशक समाप्त होते होते, कांग्रेस का विभाजन हुआ और देश के कई राज्यों में संविद सरकारों का गठन हुआ। सो, कांग्रेस आजादी के बाद भी राजनीति की केंद्रीय ताकत जरूर थी लेकिन वह कभी भी इकलौती ताकत नहीं रही।

इसी तरह अभी भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय ताकत है लेकिन इकलौती ताकत नहीं है। उसके सामने कांग्रेस की चुनौती है। साथ ही इन दोनों पार्टियों के सामने अनेक प्रादेशिक पार्टियों की चुनौती है, जो आगे भी बनी रहेगी। इस बात को समझने के लिए पश्चिम बंगाल की ही मिसाल ले सकते हैं, जहां ममता बनर्जी की पार्टी के चुनाव हारने और उसके बाद पार्टी के विभाजित होने के घटनाक्रम से प्रादेशिक पार्टियों के समाप्त होने की चर्चा शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस के विभाजन के बाद ऐसा लग रहा है कि तृणमूल अब खड़ी नहीं हो पाएगी और उससे जो खालीपन आया है, उसे सिर्फ कांग्रेस भर सकती है। कुछ आशावादी लोगों को लग रहा है कि वहां सीपीएम का उभार फिर से देखने को मिल सकता है। यह सही है कि ममता बनर्जी की पार्टी कमजोर हुई है। लेकिन एक चुनाव में उसका अस्तित्व नहीं मिटने वाला है। हां, तृणमूल से अलग होकर जो गुट बना है। वह अगला चुनाव आते आते अप्रासंगिक हो जाएगा। उसे अगर असली तृणमूल कांग्रेस बना दिया जाए तब भी वह ममता बनर्जी वाले तृणमूल जैसी राजनीति नहीं कर सकेगा। दूसरे, भाजपा अपने जैसी राजनीति करने वाली एक और पार्टी को वहां मजबूत नहीं होने देगी। सो, भाजपा से मुकाबले की वैकल्पिक राजनीति बची रहेगी, जिसमें कांग्रेस, सीपीएम और ममता बनर्जी की पार्टी राजनीति करेंगे। भाजपा के अलावा कम से कम दो या तीन पार्टियां बची रहेंगी। इनके अलावा मुस्लिम पार्टियों का उदय होगा। हुमायूं कबीर, नौशाद सिद्दीकी, बदरूद्दीन अजमल और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टियों को भी वहां की राजनीति में स्थान मिल सकता है।

दूसरी मिसाल महाराष्ट्र की ले सकते हैं क्योंकि वहां उद्धव ठाकरे की शिव सेना चार साल में दूसरी बार टूटी है। सवाल है कि क्या उद्धव ठाकरे की पार्टी के कमजोर होने से महाराष्ट्र में क्षेत्रीय पार्टियों की राजनीति समाप्त हो जाएगी? ऐसा नहीं होगा क्योंकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में एक मजबूत क्षेत्रीय पार्टी का जन्म हो चुका है। शिंदे मराठा हैं और महाराष्ट्र के एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में असर रखते हैं। इसी तरह एनसीपी के विभाजन से शरद पवार भले कमजोर हुए हैं लेकिन मराठा और मुस्लिम की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर सुनेत्रा पवार की एनसीपी मजबूत हुई है। सो, जहां पहले भाजपा, कांग्रेस के अलावा शिव सेना और एनसीपी जैसी दो मजबूत प्रादेशिक पार्टियां थीं वहां एक और शिव सेना तथा एक और एनसीपी खड़ी हो गई है।

तीसरी मिसाल तमिलनाडु की ले सकते हैं, जहां द्रविडियन राजनीति खत्म होने की बात कही जा रही है। कुछ हद तक यह बात सही है लेकिन द्रविडियन पार्टियों के खत्म होने से वहां भाजपा और कांग्रेस आ जाएंगे, यह कहना थोड़ी जल्दबाजी है। वहां फिल्म स्टार विजय की पार्टी टीवीके पहले ही चुनाव में सत्ता में आ गई है। विजय वैसे ही चमत्कारिक फिल्म स्टार हैं, जैसे एमजी रामचंद्रन थे। डीएमके और अन्ना डीएमके की राजनीति के कमजोर होने का फायदा उठाने के लिए पूर्व आईपीएस अधिकारी और भाजपा में रहे के अन्नामलाई भी मैदान में आ गए हैं। इनके अलावा एक दर्जन प्रादेशिक पार्टियां पहले से हैं। ऐसे ही आंध्र प्रदेश में टीडीपी के साथ पवन कल्याण की जन सेना पार्टी आ गई है और जगन मोहन की पार्टी पहले से है। तेलंगाना में चंद्रशेखर राव की पार्टी बीआरएस है।

अगर उत्तर भारत के राज्यों की बात करें तो निकट भविष्य में न उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बनाम भाजपा होने वाला है और न बिहार या झारखंड में। इन राज्यों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यू और झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी पार्टियां बहुत मजबूत हैं और इनका अपना जाति और समुदाय का आधार वोट है। सोचें, लोग प्रादेशिक पार्टियों के खत्म होने और देश में भाजपा बनाम कांग्रेस की दो दलीय व्यवस्था की बात कर रहे हैं और उसी बीच यह परिघटना हो रही है, जिन राज्यों में दो दलीय व्यवस्था थी वहां तीसरा या चौथा दल आ रहा है। दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की राजनीति में आम आदमी पार्टी आ गई। गुजरात में कांग्रेस और भाजपा के बीच आप आ गई। हरियाणा में इनेलो, जजपा और आप आ गए हैं। इसलिए प्रादेशिक पार्टियां खत्म नहीं होने जा रही हैं। उलटे समाज के स्तर पर जातीय पहचान मजबूत होने से इनकी संख्या बढ़ सकती है। जैसे जैसे जातियों की सामाजिक पहचान मजबूत होगी वे उसे राजनीतिक पूंजी में बदलने का प्रयास करेंगे। सो, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर प्रादेशिक पार्टियों का अस्तित्व बना रहेगा।

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