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भाजपा के अंदर मुखर होती नाराजगी

BJP Political Crisis

BJP Political Crisis: भारतीय जनता पार्टी एक बेहद अनुशासित पार्टी पहले से मानी जाती है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के इसकी कमान संभालने के बाद तो यह कुछ ज्यादा ही अनुशासित पार्टी बन गई थी। परंतु लोकसभा चुनाव, 2024 के नतीजों के बाद अनुशासन के लौह द्वार में दरारें दिखाई देने लगी हैं। पार्टी के नेताओं ने संसद के अंदर और संसद के बाहर ऐसे बयान देने शुरू कर दिए हैं, जिनकी उम्मीद नहीं की जाती थी। भाजपा की सहयोगी पार्टियों के नेता और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पदाधिकारी तो बोल ही रहे हैं, अब भाजपा के नेता भी बोलने लगे हैं।(BJP Political Crisis)

चाहे शिकायत के अंदाज में हो, तंज करने के अंदाज में हो या पीड़ा व्यक्त करने के अंदाज में हो लेकिन अब नेताओं की जुबान खुल गई है। ऐसा नहीं है कि इस चुनाव से पहले किसी ने जुबान नहीं खोली थी लेकिन तब जुबान खामोश कर दी जाती थी। बलिया से 2014 में जीते भरत सिंह ने पार्टी की बैठक में शिकायत की थी और अब वे कहां हैं किसी को पता नहीं है। 2019 में टिकट तो कट ही गई थी। इसी तरह भाजपा की टिकट पर महाराष्ट्र की भंडारा गोंदिया सीट से 2014 में जीते नाना पटोले ने भी आवाज उठाई तो उनको भी पार्टी छोड़ कर वापस कांग्रेस में लौटना पड़ा। अपवाद के तौर पर नितिन गडकरी का नाम लिया जा सकता है, जो बोलते भी रहे और पार्टी में बने भी रहे। लेकिन उनका भी कद तो कम हुआ ही। 2022 में शिपिंग मंत्रालय उनसे ले लिया गया।

प्रतीकात्मक रूप से देखने की जरुरत

बहरहाल, लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद भाजपा के कई नेताओं ने अलग अलग अंदाज में अपनी नाराजगी या पीड़ा जताई। मिसाल के तौर पर झारखंड से राज्यसभा सदस्य आदित्य साहू ने एक दिन संसद में खड़े होकर कहा कि उनकी सिफारिश पर ट्रेन में टिकट भी कन्फर्म नहीं होती है। हालांकि यह कहने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की जम कर तारीफ की। लेकिन एक सांसद की सिफारिश पर टिकट कन्फर्म नहीं होने की शिकायत मामूली नहीं है। इसे प्रतीकात्मक रूप से देखने की जरुरत है।

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यह शिकायत भाजपा के सांसदों, विधायकों

यह शिकायत भाजपा के बहुत सारे सांसदों, विधायकों और दूसरे नेताओं की है। तभी यह अनायास नहीं है कि उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक भाजपा के विधायकों ने यह शिकायत की है कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते हैं। उत्तर प्रदेश के एक नेता ने तो यहां तक कहा कि अधिकारी चाहते हैं कि विधायक और नेता उनके पैर छुएं। असल में पिछले 10 साल में बहुत से भाजपा नेता यह कहते मिले कि उनका कोई महत्व नहीं रह गया है। वे आम जनता का कोई काम नहीं करा पाते हैं। पार्टी उनको 24 घंटे किसी न किसी कार्यक्रम में दौड़ाती रहती है और वे भी जनता को जोड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं लेकिन जनता का काम नहीं करा पाते हैं। पहले यह बात दबी जुबान में कही जाती थी और अब खुल कर कही जाने लगी है।(BJP Political Crisis)

भाजपा के शीर्ष नेताओं को इसका अर्थ समझना चाहिए। इसके दो स्पष्ट अर्थ हैं। पहला, चंद नेताओं या अधिकारियों के हाथ में सत्ता का केंद्रीकरण से होने से पार्टी के अंदर नाराजगी है। पार्टी के पुराने जमीनी नेता खुश नहीं हैं और दूसरा, जिला और प्रखंड स्तर पर कार्यकर्ताओं के छोटे छोटे काम भी नहीं होने की वजह से उनका मोहभंग हो रहा है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में प्रादेशिक पार्टियों से मुकाबले में भाजपा कमजोर पड़ी। जिन राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों का शासन है वहां उन्होंने पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला स्तर पर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को मजबूत व सक्षम बनाया है। अधिकारी उनकी बात सुनते और मानते हैं। इसके उलट भाजपा की व्यवस्था में अधिकारी शीर्ष पर बैठे चंद नेताओं की ही बात सुनते हैं।

बहरहाल, चुनाव नतीजों के बाद राजनीतिक मसल्स फ्लेक्सिंग भी होने लगी है। हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के 2022 के अंत में विधानसभा का चुनाव हारने के बाद से ही वहां स्थानीय ईकाई में नाराजगी थी लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद अनुराग ठाकुर को केंद्र में मंत्री नहीं बनाने से वह नाराजगी खुल कर सामने आ गई है। अनुराग ठाकुर के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। हालांकि उन्होंने बेटे को मंत्री नहीं बनाए जाने का जिक्र नहीं किया है लेकिन नौ विधानसभा सीटों के उपचुनाव में से छह पर हार जाने के बाद उन्होंने बयान दिया। धूमल ने कहा कि कांग्रेस के छह और तीन निर्दलीय विधायकों को भाजपा में शामिल कराने और उनको पार्टी की टिकट देने से पहले पार्टी में विचार विमर्श किया जाना चाहिए था।

यह बात भले हिमाचल प्रदेश की है लेकिन इस तरह की शिकायत भाजपा के नेता पूरे देश में कर रहे हैं। यह अलग बात है कि किसी ने धूमल की तरह खुल कर यह बात नहीं कही। लेकिन हकीकत यह है कि हर राज्य में भाजपा के नेता इस चिंता में रहते हैं कि पांच साल तक पार्टी 24 घंटे उनको दौड़ाती है और किसी न किसी कार्यक्रम में लगाए रहती है और टिकट देने के समय दूसरी पार्टियों से नेताओं को लाकर टिकट दे देती है। उन्हें पार्टी के पुराने नेताओं के सिर पर बैठाया जाता है। कई नेताओं का मानना है कि विरोधी पार्टियों को कमजोर करने की रणनीति के तहत ऐसा किया जाता है लेकिन इससे भाजपा अंदर से कमजोर होती जा रही है क्योंकि बाहर से आए नेताओं की कोई गारंटी नहीं होती है।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में चाहे जिसकी शह पर अभी का घटनाक्रम चल रहा हो और इसका उद्देश्य चाहे जो लेकिन यह स्पष्ट मैसेज है कि भाजपा के अंदर जो अनुशासन बना था वह टूट रहा है। पार्टी के नेता अपने निजी हित साधने के लिए अपनी ही सरकार को निशाना बना रहे हैं। अपने ही मुख्यमंत्री के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। उप मुख्यमंत्रियों का मुख्यमंत्री की बैठक में नहीं शामिल होने और अन्य नेताओं के नौकरशाही के बहाने मुख्यमंत्री के प्रशासन को निशाना बनाने से पार्टी के कार्यकर्ताओं में गलत मैसेज जा रहा है और साथ ही विपक्षी पार्टियों का मनोबल बढ़ रहा है। जवाबी कार्रवाई में मुख्यमंत्री का ऐसे नेताओं से मिलना, जो भाजपा के विरोधी हैं और जिन्होंने भाजपा के एक शीर्ष नेता को हराया है वह भी अनुशासन भंग होने का संकेत है।

सबसे दिलचस्प यह है कि असम में कांग्रेस नेता गौरव गोगोई की जीत पर भाजपा के दो विधायकों ने उनको बधाई दी। मृणाल सैकिया और सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने गोगोई को बधाई दी और पार्टी की ओर से इस पर आपत्ति जताने और कहने के बावजूद उन्होंने बधाई वापस नहीं ली। सोचें, असम में आठ साल से भाजपा का राज है और हिमंत बिस्व सरमा मुख्यमंत्री हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे भाजपा के उन दो मुख्यमंत्रियों में से हैं, जिनका अपना निजी जनाधार भी है। फिर भी भाजपा के विधायकों ने कांग्रेस सांसद को जीत पर बधाई दी और बागी तेवर दिखाए। अब तक असम में भाजपा कांग्रेस के विधायकों को तोड़ती थी अब कहीं उलटी गंगा न बहने लगे।

भाजपा के अंदर अंदर जो खदबदाहट है वह अपनी जगह है। राज्यों में पार्टी के जितने मजबूत और जनाधार वाले नेता थे उनको किनारे कर दिया गया है। अपवाद के तौर पर कुछ नेता जरूर केंद्र में लाए गए हैं लेकिन आडवाणी, वाजपेयी के दौर के ज्यादातर नेताओं को घर बैठा दिया गया है। ऐसे नेता नाराज हैं और उनके समर्थक भी है। तभी लोकसभा चुनाव के बाद नेताओं की जैसे आवाज लौटी है। शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद ट्रेन से यात्रा करके ताकत दिखाई और उनके बेटे ने कहा कि उनके सामने दिल्ली भी झुकती है। इसी तरह वसुंधरा राजे ने कद, पद और मद का अनुप्रास बना कर निशाना साधा। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को छोड़ देना चाहिए। सो, अगर चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो नक्कारखाने में अभी गूंज रही तूती की आवाज नगाड़े के शोर में बदल जाएगी।

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