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आंकड़े छिपाने से हकीकत नहीं बदलती

हर साल नवंबर, दिसंबर में दिल्ली में हिंदी फिल्मों का यह गाना खूब चर्चा में रहता है कि ‘आंखों में जलन, सीने में तूफान सा क्यूं है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है’। इस साल भी ऐसा ही है। आंखों में जलन है, गले में खराश है, सीने में तूफान सा है, अस्पतालों  में सांस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है लेकिन फर्क यह है कि इस बार सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि हवा की गुणवत्ता ज्यादा खराब नहीं हुई है। दिल्ली में नंगी आंखों से हवा प्रदूषित दिख रही है और लोग उसे महसूस कर रहे हैं। यह साफ दिख रहा है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई ‘गंभीर श्रेणी’ में है या चार सौ से कम नहीं है।

लेकिन सरकार कह रही है कि एक्यूआई पहले ‘बेहद खराब श्रेणी’ में थी लेकिन अब सुधार हुआ है और अब वह ‘खराब श्रेणी’ में आ गई है। इसका मतलब है कि एक्यूआई तीन से आसपास थी, जो अब दो सौ या उससे नीचे आ गई है। वास्तविकता और आंकड़ों का यह फर्क इसलिए आय़ा दिख रहा है क्योंकि दिल्ली में अब भाजपा की सरकार है। 27 साल के बाद सत्ता में लौटी भाजपा की सरकार यह साबित करने में लगी है कि उसने नौ महीने के ही अपने राज में हवा की गुणवत्ता सुधार दी है।

हालांकि दिल्ली सरकार अपनी पोल खुद ही खोल रही है। एक तरफ उसकी एजेंसियां कह रही हैं कि वायु गुणवत्ता में कभी भी बहुत ज्यादा खराबी नहीं आई है। उसने ‘खराब श्रेणी’ का दावा किया है और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी ग्रैप का पहला चरण लागू किया है। लेकिन दूसरी ओर सरकार खुद ही ऐसे उपायों को लागू कर रही है, जो प्रदूषण बढ़ने पर ग्रैप के दूसरे चरण में लागू किए जाते हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली में भाजपा के नेतृत्व वाले नगर निगम ने बुधवार, 29 अक्टूबर को पार्किंग शुल्क दोगुना कर दिया। ग्रैप का दूसरा चऱण लागू करने पर यह किया जाता है।

इसी तरह दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने अपने फेरे 30 फीसदी बढ़ाने का ऐलान कर दिया। प्रदूषण बढ़ने पर ही सार्वजनिक परिवहन की सेवाओं में बढ़ोतरी की जाती है। ऐसे ही एक नवंबर से बीएस छह से नीचे के व्यावसायिक वाहनों का दिल्ली में प्रवेश रोकने की घोषणा कर दी गई है। सो, सरकार ऐसे उपाय कर रही है, जिससे लग रहा है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ा है लेकिन दूसरी ओर वह इस बात को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं है। उलटे ऐसे आंकड़े पेश कर रही है, जिससे लग रहा है कि दिल्ली में सब कुछ ठीक है।

इसी तरह दिल्ली सरकार ने कृत्रिम बारिश कराने का भी प्रयास किया। आईआईटी कानपुर के साथ मिल कर इसके दो ट्रायल हुए। हालांकि सरकार और आईआईटी दोनों को पता था कि हवा में नमी 10 फीसदी से ज्यादा नहीं है और 50 फीसदी से कम नमी होने पर क्लाउड सीडिंग काम नहीं करता है। फिर भी करीब दो करोड़ रुपए खर्च करके क्लाउड सीडिंग की गई। इसका कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि बारिश नहीं हुई। तब सरकार ने यह दावा शुरू कर दिया कि बारिश भले नहीं हुई है लेकिन इससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिली है। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने दावा किया कि हवा में मौजूद खतरनाक धूल कणों में से एक पीएम 10 में 42 फीसदी की कमी आई है। हालांकि यह ट्रायल करने वाले आईआईटी का कहना है कि पीएम 10 में छह से 10 फीसदी तक की कमी आई है। सोचें, सरकार क्या बढ़ा चढ़ा कर पीएम 10 कम होने का दावा कर देगी तो लोगों को प्रदूषण से राहत मिल जाएगी?

ऐसा लग रहा है कि दिल्ली की सरकार हर जगह आंकड़े छिपा कर हकीकत बदलने की कोशिश कर रही है। इस बार दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाकर दिल्ली में पटाखों की बिक्री शुरू कराई। अदालत ने हालांकि तीन दिन तक ग्रीन पटाखे बेचने की इजाजत दी थी लेकिन कई दिन तक पटाखे बिके और दिवाली पर खूब पटाखे चले। फिर भी दिवाली के अगले दिन कहा गया कि वायु प्रदूषण नहीं बढ़ा है। दावा किया गया कि एक्यूआई तीन सौ आसपास रहा यानी ‘बेहद खराब श्रेणी’ तक ही हवा की क्वालिटी बिगड़ी। हालांकि बाद में खबरें आईं कि दिवाली की रात को जिस समय एक्यूआई सबसे ज्यादा बिगड़ी उस समय के आंकड़े नहीं जोड़े गए। यानी दिवाली के अगले दिन का एक्यूआई पीक पॉल्यूशन के आंकड़ों के बगैर निकाला गया। सोचें, आंकड़ों के साथ ऐसी धोखाधड़ी कोई जिम्मेदार सरकार कैसे कर सकती है? अभी जो भी प्रदूषण है उसके लिए दिल्ली सरकार ने सारा ठीकरा पंजाब पर फोड़ दिया है। जैसे आम आदमी पार्टी की सरकार भाजपा शासित राज्यों में पराली जलाए जाने को दिल्ली के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताती थी वैसे ही भाजपा की दिल्ली सरकार पंजाब की आप सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है। कहा जा रहा है कि पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं के कारण दिल्ली में प्रदषण बढ़ा है।

हवा के साथ साथ यमुना की सफाई के मामले में भी दिल्ली सरकार का यही रवैया है। दिल्ली में सरकार बनने के बाद पहले दिन से दिल्ली सरकार और भाजपा नेताओं ने यमुना में सफाई का कथित अभियान शुरू किया। ड्रेजिंग करने वाली मशीनें लगा दी गईं। लेकिन हकीकत यह है कि छठ के समय तक यमुना के पानी में रत्ती भर सुधार नहीं हुआ। कहीं कहीं सफाई हुई लेकिन पानी में ऑक्सीजन का स्तर नहीं बढ़ा और पहले की तरह झाग बनती रही। झाग हटाने के लिए उसी केमिकल का इस्तेमाल किया गया, जिसका आप सरकार के समय इस्तेमाल किए जाने पर भाजपा पानी में जहर मिलाने के आरोप लगाती थी। अंत में जब यमुना का पानी साफ नहीं हुआ और बिहार विधानसभा चुनाव के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छठ घाट पहुंचने का कार्यक्रम बन गया तो यमुना के तट पर गंगा के पानी से एक तालाब निर्मित किया गया। उसके सहारे यमुना की सफाई का दावा किया गया। लेकिन आम आदमी पार्टी के नेताओं की सक्रियता से इसकी पोल खुल गई और बाद की शर्मिंदगी से बचने के लिए प्रधानमंत्री वहां नहीं गए।

अब सवाल है कि क्यों दिल्ली की सरकार हवा की गुणवत्ता या यमुना की सफाई के मामले में इस किस्म के दावे कर रही है? दिल्ली में 27 साल से भाजपा की सरकार नहीं थी। इन 27 वर्षों में यमुना लगातार गंदी होती गई और ट्रैफिक से लेकर कई और घटनाक्रम रहे, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ा। इसमें भाजपा की कोई गलती नहीं है। फिर अगर वह नौ महीने में हवा की गुणवत्ता नहीं सुधार सकी या यमुना की सफाई नहीं कर सकी तो इसके लिए कोई उसे दोष नहीं देगा। उसे ईमानदारी से बताना चाहिए कि उसे सिर्फ नौ महीने ही मिले हैं और इतना समय पर्याप्त नहीं है। उसे अपनी ईमानदार कोशिशें दिखानी चाहिए। लेकिन उलटे उसने आंकड़े छिपा कर हकीकत को दबाने का प्रयास किया और झूठ फैलाया। इससे उसकी मंशा पर सवाल उठते हैं। यह धारणा बनती है कि दिल्ली सरकार को कुछ करना नहीं है, बल्कि आंकड़े छिपा कर झूठे दावे करने हैं और ऐसे ही किसी दिन वह दावा कर देगी कि यमुना साफ हो गई और दिल्ली में कोई वायु प्रदूषण नहीं है। ऐसा होना बहुत खतरनाक है।

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