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एक साथ चुनाव पर जनमत बनाने का प्रयास

लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने और उसके एक सौ दिन के अंदर सभी स्थानीय निकायों के चुनाव करा लेने के प्रस्ताव पर संसदीय समिति विचार कर रही है। भाजपा नेता पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति तीन दिन के दौरे पर गुजरात गई तो समिति के अध्यक्ष की ओर से एक बड़ा दावा किया गया। उन्होंने कहा कि देश के सारे चुनाव एक साथ होंगे तो इससे सात लाख करोड़ रुपए की बचत होगी। वे इतने पर ही नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा कि इससे देश की जीडीपी में 1.6 फीसदी की बढ़ोतरी होगी और इस रकम से देश के बुनियादी ढांचे का विकास किया जा सकेगा।

उन्होंने जब सात लाख करोड़ रुपए की एक भारी भरकम रकम का हवाला दिया तो अनायास भारत के पूर्व सीएजी विनोद राय याद आए, जिन्होंने कथित संचार घोटाले में एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए के नुकसान का आंकड़ा दिया था। उस रकम का कहीं अस्तित्व नहीं था। लेकिन संख्या इतनी सटीक थी कि देश के लोगों ने उस पर यकीन किया। उसके बाद ही यूपीए दो की सरकार के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ, जिसकी परिणति 2014 में नरेंद्र मोदी की ताजपोशी में हुई।

पीपी चौधरी के सात लाख करोड़ रुपए की बचत का आंकड़ा सुन कर विनोद राय के एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए के आंकड़े की याद आना सिर्फ संयोग नहीं है। उनके एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का अस्तित्व नहीं था। इस सात लाख करोड़ रुपए का अस्तित्व है। लेकिन उसे बचा लेने से वह न तो सरकार के खजाने में जाएगा, न जीडीपी में जुड़ेगा और न उससे बुनियादी ढांचे का विकास होगा। सिर्फ जनमत बनाने के लिए यानी लोगों को एक देश, एक चुनाव के आइडिया के पक्ष में तैयार करने के लिए यह भारी भरकम आंकड़ा बोला गया।

असल में सरकार जो दो मुख्य कारण बता कर एक साथ चुनाव कराना चाहती है उन दोनों का कोई ठोस आधार नहीं है। न तो चुनाव पर होने वाले बहुत अधिक खर्च का कोई ठोस आधार है और न लगातार आचार संहिता लगी रहने और उससे विकास कार्य प्रभावित होने के तर्क का कोई ठोस आधार है। पर ये दोनों मुद्दे जनता के दिमाग में बैठाए जा रहे हैं।

इसी सिलसिले में संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी सात लाख करोड़ रुपए की बचत का मामला ले आए हैं। इसमें उन्होंने पार्टियों और उम्मीदवारों की ओर से होने वाले खर्च को भी जोड़ लिया है। इसमें सरकारी खर्च का हिस्सा बहुत कम है। पिछले लोकसभा चुनाव के लिए बजट में एक हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। बाद में एक हजार करोड़ रुपए और खर्च होने की बात आई। ध्यान रहे चुनाव कराने में लॉजिस्टिक के अलावा दूसरा कोई खास खर्च नहीं होता है। सारे सरकारी कर्मचारी चुनाव में शामिल होते हैं, जिनको अलग से वेतन नहीं देना होता है। ईवीएम खरीद का बजट अलग होता है, जो चुनाव कराने के खर्च में नहीं जुड़ता है। चुनाव चाहे एक बार हो या बार बार ईवीएम की खरीद का उससे कोई मतलब नहीं होता है। सो, कुछ जागरूकता पैदा करने वाले विज्ञापन देने होते हैं और सुरक्षाकर्मियों व चुनावकर्मियों की आवाजाही और उनके ठहरने आदि की व्यवस्था का खर्च होता है।

इसके अलावा कुछ और खर्च होते हैं। इसको दो हजार करोड़ नहीं 10 हजार करोड़ मान लें तब भी आंकड़ा कितना पहुंचेगा? अगर पूरे देश में लोकसभा चुनाव कराने में 10 हजार करोड़ खर्च होता है और प्रति राज्य औसतन एक हजार करोड़ रुपए का खर्च मानें तब भी देश में चुनाव कराने का खर्च 50 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं होगा। ईवीएम खरीदने का बजट अलग होता है। उस मद में 10 हजार करोड़ रुपए आवंटित हुए थे। इसे भी जोड़ें तो चुनाव कराने का पांच साल का सरकारी खर्च करीब 60 हजार करोड़ का होगा। अगर एक साथ चुनाव होगा तो यह खर्च थोड़ा कम हो जाएगा। लेकिन एक साथ चुनाव होने और अलग अलग चुनाव होने से खर्च में कोई बड़ा अंतर नहीं आता है।

सो, सवाल है कि सात लाख करोड़ रुपए कहां से बचेंगे? इसका जवाब इस बात में है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद मीडिया में खबर आई कि इस पर अनुमानित खर्च एक लाख 35 हजार करोड़ रुपए रहा। इसी तरह अलग अलग राज्यों से भी अनुमानित खर्च की खबरें आती हैं। यह वो खर्च है, जो पार्टियां करती हैं और उम्मीदवार करते हैं। अब सवाल है कि पार्टियां या उम्मीदवार जो रकम चुनाव में खर्च करते हैं वह खर्च तो जब एक साथ चुनाव होगा तब भी होगा, फिर बचत कैसे होगी? खर्च में थोड़ा बहुत अंतर आ जाएगा। दूसरा सवाल यह है कि अगर पार्टियों या व्यक्तिगत रूप से किसी उम्मीदवार या नेता का पैसा बचेगा तो उसका इस्तेमाल देश के बुनियादी ढांचे के विकास में कैसे होगा? क्या कोई पार्टी और नेता पैसा बचा कर सरकार को बुनियादी ढांचे का विकास करने के लिए देगा?

असल में एक साथ चुनाव होगा तो पैसे बचेंगे, यह पूरा सिद्धांत ही गलत है। यह सिद्धांत तो और भी गलत है कि एक साथ चुनाव होने पर जो पैसे बचेंगे उससे देश के बुनियादी ढांचे का विकास होगा। इसके उलट चुनाव में होने वाले खर्च से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। चुनावों में पार्टियों और नेताओं का बेहिसाब पैसा निकल कर अर्थव्यवस्था में आता है। चुनाव आयोग कहता है कि लोकसभा का एक उम्मीदवार 95 लाख रुपए खर्च कर सकता है। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ दें तो किसी भी पार्टी का उम्मीदवार इतने कम पैसे में चुनाव नहीं लड़ता है। सब इससे कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं। वह सब काला धन होता है।

यह हकीकत है कि भ्रष्टाचार रोकने और काला धन खत्म करने के तमाम दावों के बावजूद देश में और खास कर नेताओं के पास बेहिसाब काला धन है, जो चुनाव में खर्च होता है। अगर कोई इससे इनकार करता है तो उसकी मासूमियत पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। चुनाव आयोग को भी पता होता है कि सबके बिल फर्जी होते हैं फिर भी सब चलता है।

अब रही बात आचार संहिता लगी होने या विकास कार्यों को ठप्प होने की तो वह भी पूरी तरह से गलत है। क्योंकि अगर एक साथ चुनाव होगा तो एक बार आचार संहिता लगेगी और अलग अलग चुनाव होगा, जैसा कि अभी होता है तो दो बार आचार संहिता लगेगी। अगर चुनाव आयोग चाहे तो 35 से 40 दिन की आचार संहिता में चुनाव करा सकता है। इस बार कई राज्यों में ऐसा हुआ है। सो, पांच साल यानी 60 महीने यानी 1,825 दिन में से किसी राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनाव मिला कर 70 या 80 दिन आचार संहिता लग जाती है तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाता है। यह ध्यान रखने की जरुरत है कि आचार संहिता के कारण कोई नीतिगत फैसला नहीं रूकता है, न लोक कल्याण की कोई योजना रूकती है और न बुनियादी ढांचे के निर्माण का काम रूकता है।

अगर आचार संहिता की अवधि में कोई आपदा आती है या कोई दूसरी जरुरत पड़ती है तो चुनाव आयोग की अनुमति से सरकार उससे निपटने के उपाय कर सकती है। इसलिए आचार संहिता की वजह से विकास के काम बाधित होता हैं ऐसा कहना और मानना दोनों बहुत बचकानी बात है। बहरहाल, सरकार जो कराना चाहती है वह करा ही लेती है। इसलिए अगर उसे एक साथ चुनाव कराना है तो करा ले, इस तरह के बेसिरपैर के तर्क देकर लोगों को बरगलाना ठीक नहीं है।

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