पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों को कई तरह से पढ़ा जा रहा है। बंगाल से लेकर देश की राजनीति पर उसके असर और भाजपा व विपक्ष की राजनीति पर उसके प्रभाव का आकलन किया जा रहा है। क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व धीरे धीरे कैसे खत्म हो रहा है यह भी रेखांकित किया जा रहा है। लेकिन इस बार पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों का एक आकलन इस लिहाज से भी किया जाना चाहिए कि अब भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने की पहल कौन करेगा? पिछले दो से तीन साल में ऐसे तमाम नेताओं की विदाई हो गई है, जो भाजपा के खिलाफ विपक्षी पार्टियों का एक साझा मोर्चा बनाने की पहल करते रहे हैं। नीतीश कुमार से लेकर ममता बनर्जी और एमके स्टालिन से लेकर चंद्रशेखर राव, शरद पवार और अरविंद केजरीवाल तक कोई ऐसी स्थिति में नहीं दिख रहा है, जो विपक्ष को एकजुट कर सके।
साझा विपक्ष बनाने की कोशिश करने वालों में से इस बार के चुनाव में दो चेहरों और एक विचारधारा आधारित पार्टी की विदाई हो गई है। अगर चेहरों को बात करें तो ममता बनर्जी और एमके स्टालिन ऐसे नेता हैं, जो विपक्ष को एकजुट कर सकते हैं। ममता बनर्जी ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले इसका प्रयास भी किया था। माना जा रहा था कि अगर इस बार वे चौथी बार पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतती हैं तो वे विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत के तौर पर केंद्रीय राजनीति में स्थापित होंगी। उनके इर्द गिर्द विपक्षी पार्टियां एकजुट होने भी लगी थीं। उनके लिए प्रचार करने विपक्ष के सारे नेता गए थे। अखिलेश यादव से लेकर तेजस्वी यादव और अरविंद केजरीवाल से लेकर हेमंत सोरेन तक सबने ममता की मदद की। अब उनकी पार्टी चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो गई है और अगले लोकसभा चुनाव तक उनकी उम्र 75 साल होगी। वे विपक्ष को एकजुट कर पाएंगी इसमें संदेह है।
तमिलनाडु में एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले डीएमके का हारना सबसे अप्रत्याशित था। चुनाव बाद के हर एक्जिट पोल में उनकी जीत बताई जा रही थी। लेकिन उनकी पार्टी बहुत बुरी तरह से हारी। डीएमके को सिर्फ 59 सीटें मिलीं। तमिलनाडु में विजय के रूप में एक नई ताकत का उदय हुआ है और स्टालिन के लिए मुश्किल बात यह है कि नतीजों के तुरंत बाद कांग्रेस ने साथ छोड़ दिया। कांग्रेस विजय को समर्थन दे रही है। सोचें, स्टालिन ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का संकल्प जताया था। लेकिन कांग्रेस ने पहला मौका मिलते ही डीएमके का साथ छोड़ दिया।
केरल में पिनरायी विजयन के नेतृत्व में सीपीएम की बड़ी हार हुई है। 10 साल सत्ता में रहने के बाद सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट मोर्चे की विदाई हो गई है। इसके साथ ही पिछले पांच दशक में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी भी राज्य में कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकार नहीं है। एक समय पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में लेफ्ट की सरकार होती थी। साथ ही बिहार, झारखंड सहित कई राज्यों में उसके विधायक और सांसद होते थे। अब केरल में कम्युनिस्ट किला ढह गया है। इससे पहले संसद में कम्युनिस्ट नेताओं की संख्या भी ऐतिहासिक रूप से कम हो गई है। अब अगले लोकसभा चुनाव तक राज्यसभा में भी लेफ्ट की मौजूदगी नगण्य हो जाएगी। लेफ्ट के तमाम दिग्गज नेताओं का या तो निधन हो गया है या वे हाशिए में चले गए हैं। विजयन आखिरी बड़े नेता हैं। लेकिन चुनावी हार के बाद उनकी स्थिति भी बहुत कमजोर हो गई है। माणिक सरकार हों या प्रकाश करात या वृंदा करात अब सब हाशिए में हैं।
इससे पहले बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ। पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री बनाया। 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उससे पहले नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे। हाल के दिनों में नीतीश एकमात्र नेता थे, जो विपक्षी पार्टियों को एक मंच पर लाने में कामयाब हुए थे। उनसे पहले चंद्रशेखर राव या ममता बनर्जी या अरविंद केजरीवाल को कामयाबी नहीं मिली थी। नीतीश ने अप्रैल 2023 में विपक्षी पार्टियों को एकजुट करना शुरू किया। उनकी पहल पर जून 2023 में पटना के मुख्यमंत्री आवास में विपक्षी पार्टियों की पहली बैठक हुई। इस गठबंधन को बाद में ‘इंडिया’ ब्लॉक का नाम मिला। हालांकि जनवरी 2024 तक यानी लोकसभा चुनाव नजदीक आने तक नीतीश कुमार खुद ही गठबंधन छोड़ कर चले गए। उसमें कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस सहित कई पार्टियों के नेताओं की भी भूमिका थी। लेकिन अब सेहत और राजनीतिक वजन दोनों लिहाज से नीतीश कुमार की स्थिति ऐसी नहीं है कि वे भाजपा से मुकाबले की राजनीति कर सकें। वे कोई भी वैकल्पिक राजनीति करने की स्थिति में नहीं हैं।
विपक्षी नेताओं में चंद्रशेखर राव ने एक समय संघीय मोर्चा बनाने की पहल की थी। इसी पहल के तहत उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति का नाम बदल कर भारत राष्ट्र समिति कर लिया था। वे स्टालिन से मिलने तमिलनाडु गए थे तो कोलकाता में ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। महाराष्ट्र में तो चुनाव लड़ने की तैयारी भी की थी। लेकिन 2023 के चुनाव में कांग्रेस ने उनको हराया। उसके बाद उनके परिवार में ही फूट पड़ गई। उनकी बेटी के कविता ने अलग पार्टी बना ली है। चंद्रशेखर राव की भी उम्र काफी हो गई है और सेहत भी ठीक नहीं है। उधर विपश्री पार्टियों ने शरद पवार को जैसे तैसे इंतजाम करके राज्यसभा भेजा। लेकिन उनकी सेहत ठीक नहीं है और दूसरे, उनकी पार्टी के ज्यादातर नेता भाजपा के साथ बहुत कम्फर्टेबल हो गए हैं। महाराष्ट्र में अगर एनसीपी के दोनों धड़ो का विलय होता है तो वह पार्टी भाजपा के साथ रहेगी। अरविंद केजरीवाल की पार्टी में बिखराव है। अगले साल पंजाब चुनाव के बाद उनकी स्थिति का आकलन होगा।
सो, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और विनरायी विजयन के चुनाव हार कर सत्ता से बाहर होने को सिर्फ तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन के तौर पर नहीं देखना चाहिए। यह विपक्ष की राजनीति को बहुत गहरे तक प्रभावित करने वाला परिणाम है। एक एक करके विपक्षी पार्टियां चुनाव हार रही हैं या उसके नेता उम्र व सेहत के आधार पर निष्क्रिय हो रहे हैं। इसके साथ ही एक परिघटना यह भी हो रही है कि एक विचार के तौर पर भाजपा विरोध लगातार कमजोर होता जा रहा है या महत्वहीन होता जा रहा है। कह सकते हैं कि नेतृत्व और विचार दोनों के स्तर पर भाजपा विरोध की राजनीति बहुत कमजोर हो गई है। पार्टियों और नेताओं को भाजपा के साथ जुड़ जाने या उसके राजनीतिक विचार को स्वीकार कर लेने में कोई समस्या नहीं दिख रही है।
अब ले देकर एक राहुल गांधी हैं, जो मजबूती से लड़ते दिख रहे हैं। केरल में कांग्रेस की जीत ने उन्हें ताकत दी है। लेकिन क्या बिना मजबूत प्रादेशिक समर्थन के कांग्रेस पार्टी अकेले भाजपा से मुकाबला कर सकेगी? यह भी सवाल है कि अगर साझा मोर्चा बनाने का प्रयास कांग्रेस करती है तो क्या सभी प्रादेशिक पार्टियां उसके साथ जुड़ेंगी या कांग्रेस से अलग तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास शुरू हो जाएगा? प्रादेशिक पार्टियों के कमजोर से कांग्रेस के मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस की आमने सामने की लड़ाई में कांग्रेस बहुत मजबूत नहीं दिखती है। बहरहाल, आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब मिलेंगे। लेकिन तब तक ऐसा लग नहीं रहा है कि भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने का कोई ठोस प्रयास हो पाएगा।
