नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने के बाद 209 दिन तक चले मंथन से भाजपा का संगठन चलाने के लिए जो ‘रत्न’ चुने गए हैं उनको देख कर कतई हैरानी नहीं हुई। अगर भाजपा संगठन में ऐसे पदाधिकारी नहीं चुने जाते या टीम ऐसी ही नहीं बनती तो हैरानी होती। ध्यान रहे जब कोई पार्टी सरकार में होती है तो उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष या संगठन का कोई खास महत्व नहीं रह जाता है। फिर भी भाजपा चूंकि संगठन वाली पार्टी मानी जाती है इसलिए एक कवायद दिखाई जाती है। उस कवायद से जो टीम बनी है वह बिल्कुल वैसी ही है, जैसी टीम पिछले एक दशक से सरकार और संगठन में बनाई जा रही है। दोनों जगह किसी अन्य चेहरे की जरुरत नहीं है। सरकार में नरेंद्र मोदी और संगठन में अमित शाह का ही मतलब है। बाकी सबको दिए गए निर्देशों का पालन करना होता है। यह नई टीम भी इसी सिद्धांत को व्यवहार रूप में प्रतीकित कर रही है।
ध्यान रहे पिछले एक दशक से ज्यादा समय से भाजपा में यह सिद्धांत अपना लिया गया है कि अगर कोई नेता अपने दम पर या अपनी काबिलियत के दम पर बड़ा बना है, अपना नाम बनाया है, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है, राष्ट्रीय दृष्टि रखता है तो उसको हाशिए में डालना है। इसके एकाध अपवाद हो सकते हैं। लेकिन यही सिद्धांत सरकार में चलता है, संगठन में चलता है और यहां तक कि चुनाव लड़ने में भी इसे ही लागू किया जाता है। बिल्कुल अनजान चेहरों को चुन कर आगे किया जाता है। लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ाया जाता है या राज्यसभा और विधान परिषद में भेजा जाता है। इनमें से ज्यादातर लोग विधायी कामकाज में क्या योगदान करते हैं यह बता पाना उनके खुद के लिए भी मुश्किल ही होगा।
राजनीति के रंगमंच पर अपनी संक्षिप्त भूमिका निभा कर थोड़े समय के बाद ये चेहरे नेपथ्य में चले जाते हैं। फिर उनके बारे में किसी को पता नहीं चलता। लेकिन शुरुआत में जब इन्हें लाया जाता है तो प्रचार यह होता है कि बिल्कुल जमीनी स्तर से नेता खोजा गया है। असल में ऐसे नेताओं की कोई जमीन नहीं होती है। इसलिए वे बाद में जमीन पर दिखाई नहीं देते हैं। इस बार भी ऐसे दर्जनों ‘जमीनी नेता’ पार्टी के पदाधिकारी बनाए गए हैं। हालांकि इनमें से ज्यादातर की कोई खास भूमिका नहीं रहेगी और थोड़े समय के बाद ये लोग कहां चले जाएंगे, वह किसी को पता नहीं चलेगा। कुछ चुनिंदा लोग, जो पहले से संगठन का काम कर रहे हैं या कुछ ऐसे लोग, जिनको वापस संगठन में लाया गया है, वे ही काम करेंगे और जब चुनाव आएंगे तो संगठन के पदाधिकारियों से अलग के कुछ अन्य लोग चुनावी कामकाज में लगाए जाएंगे। वो चेहरे अलग होते हैं।
सो, ‘जमीनी नेता’ के नाम पर जो लोग संगठन में लाए गए हैं उनकी बात छोड़ दें तो कह सकते हैं कि यह एक कंजरवेटिव बदलाव है। कोई बड़ा प्रयोग करने से बचा गया है। महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने या ‘जेन जी’ को महत्व देने के दबाव को दरकिनार किया गया है। भरोसे के कुछ चेहरों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया है, जहां से वे शीर्ष नेताओं के साथ मिल कर संगठन के लिए काम करेंगे। वर्षों तक संगठन में काम कर चुके राम माधव को वापस लाया गया है। ऐसे ही स्मृति ईरानी की वापसी हुई है। उपाध्यक्ष बना कर किनारे किए गए सौदान सिंह फिर से संयुक्त संगठन महामंत्री के तौर पर लाए गए हैं। बीएल संतोष और शिव प्रकाश की संगठन की जिम्मेदारी पहले जैसी ही रखी गई है। पिछले कई वर्षों से संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे विनोद तावड़े और सुनील बंसल को महामंत्री बनाए रखा गया है। तरुण चुघ महामंत्री पद से हटा दिए गए हैं लेकिन उनको पार्टी मुख्यालय का प्रभारी बना कर मुख्यधारा में रखा गया है।
भाजपा ने नई टीम में क्षेत्रीय संतुलन बनाने का प्रयास किया है लेकिन स्पष्ट रूप से पलड़ा चुनावी राज्यों के पक्ष में झुका हुआ दिखाई दे रहा है। चार चुनावी राज्यों से 18 पदाधिकारी बनाए गए हैं। कुल 65 पदाधिकारियों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गुजरात से 18 पदाधिकारी हैं। महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का दिखावा किया गया है फिर भी उनकी हिस्सेदारी 18 फीसदी तक ही पहुंच सकी है। कुल 12 महिलाओं को टीम में रखा गया है, जिनमें से छह उपाध्यक्ष हैं। आमतौर पर उपाध्यक्षों के पास कोई काम नहीं होता है। संगठन महामंत्री, संयुक्त संगठन महामंत्री और महामंत्रियों के 11 पदों में से सिर्फ एक पद महिला को मिला है। स्मृति ईरानी महामंत्री बनाई गई हैं। सोचें, 11 में एक यानी आधी आबादी को नौ फीसदी प्रतिनिधित्व! संगठन में सबसे युवा चेहरा हेमांग जोशी का है, जो 35 साल के हैं।
नितिन नबीन की नई टीम बनने के बाद जितनी चर्चा इसमें शामिल किए गए चेहरों की है उससे ज्यादा चर्चा हटा दिए गए पदाधिकारियों की है। दीपक म्हस्के कैसे सोशल मीडिया के प्रभारी बने या कैसा काम करेंगे इस सवाल से ज्यादा चर्चा इसकी है कि अमित मालवीय क्यों हटा दिए गए? हेमांग जोशी भारतीय जनता युवा मोर्चा में कैसा काम करेंगे से ज्यादा चर्चा इस बात की है तेजस्वी सूर्या को क्यों हटाया गया है और आगे उनका क्या होगा? अनिल बलूनी के साथ मीडिया टीम में आशीष उषा अग्रवाल, प्रदीप भंडारी और सिद्धार्थ यादव को लगाया गया है ये तीनों कैसा काम करेंगे इससे ज्यादा चर्चा में यह सवाल है कि संजय मयूख क्यों मीडिया टीम से हटाए गए? इन सब सवालों का जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।
उधर भाजपा के कई बड़े, पुराने और चर्चित नेता पुनर्वास की उम्मीद में बैठे हैं। संगठन में शामिल नहीं किए जाने से उनको निराशा हुई होगी लेकिन उनमें से बहुत से लोग अब भी उम्मीद में होंगे कि क्या पता सरकार में जगह मिल जाए। अगले कुछ दिन में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा है। अभी प्रवक्ताओं की सूची आनी है, राष्ट्रीय कार्यकारिणी की भी घोषणा होनी है और भाजपा की सबसे बड़ी ईकाई संसदीय बोर्ड का भी पुनर्गठन होना है। कहा जा रहा है कि मार्गदर्शक मंडल का भी विस्तार हो सकता है।
