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राज्यों के चुनाव हैं सभ्यतागत संघर्ष नहीं

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव वैसे तो दोनों सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के साथ साथ मजबूत प्रादेशिक क्षत्रपों और वामपंथी पार्टियों के लिए परीक्षा वाले हैं। लेकिन ये चुनाव खासतौर से भाजपा के लिए परीक्षा वाले इसलिए हैं क्योंकि इनके नतीजों से पता चलेगा कि भाजपा गैर कांग्रेस दलों और प्रादेशिक क्षत्रपों के मुकाबले अपनी चिरंतन कमजोरी से उबर पाई है या नहीं। यह भी पता चलेगा कि क्षेत्रीय और भाषायी अस्मिता वाले राज्यों में भाजपा की अखिल भारतीय राजनीति के दांव पेंच, व्यापक हिंदू ध्रुवीकरण और राष्ट्रवाद की राजनीति कारगर होती है या नहीं। ध्यान रहे इस बार जिन चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु व केरल और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में, चुनाव हो रहा है, वहां हिंदुत्व बिल्कुल उस रूप में न तो प्रचलित है और न स्वीकार्य है, जिस रूप में भाजपा उसका उत्तर व पश्चिमी भारत में राजनीतिक इस्तेमाल करती है। साथ ही इन राज्यों में राष्ट्रवाद की भावना के साथ साथ उप राष्ट्रीयता की एक बेहद मजबूत अंतरधारा भी हमेशा मौजूद रहती है। इसलिए इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का चुनाव भाजपा के लिए परीक्षा वाला है।

तमिलनाडु को छोड़ दें तो बाकी तीनों बड़े राज्यों में भाजपा अकेले लड़ रही है या गठबंधन की केंद्रीय पार्टी है। सबसे बड़े और सबसे ज्यादा विधानसभा वाले राज्य पश्चिम बंगाल में भाजपा अकेले लड़ रही है। असम में जरूर असम गण परिषद, बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट और यूपीपीएल के साथ भाजपा का तालमेल है लेकिन गठबंधन का नेतृत्व भाजपा कर रही है। 126 सदस्यों की विधानसभा में इस बार वह अकेले बहुमत हासिल करना चाहती है। इससे पहले दो चुनावों से वह बहुमत के आंकड़े यानी 64 सीट से थोड़ा नीचे रूक गई थी। उधर केरल में भी भाजपा ने साबू जैकब की ट्वेंटी20 पार्टी से तालमेल किया है। यह एक ईसाई पहचान वाली पार्टी है। वहां भी भाजपा केंद्रीय ताकत है। तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी अपना मजबूत आधार नहीं बना पा रही है और उसे अन्ना डीएमके के पीछे चलना पड़ रहा है, जिसने लोकसभा चुनाव में भाजपा को छोड़ दिया था। हालांकि बाद में भाजपा फिर उसके साथ जुड़ी। इन राज्यों के चुनाव भाजपा के लिहाज से इसलिए भी बहुत अहम हैं क्योंकि इनसे दक्षिण भारत में भाजपा के विस्तार की संभावनाओं का भी पता चलेगा। धीरे धीरे ही सही लेकिन भाजपा ने कर्नाटक के बाद तेलंगाना में अपना मजबूत आधार बना लिया है। केरल में पिछले चुनाव में उसका वोट प्रतिशत दहाई में पहुंच गया। उसके गठबंधन को 12 फीसदी से ज्यादा वोट मिले, जो लोकसभा चुनाव में और बढ़ा।

बहरहाल, अगले महीने होने वाले चुनावों में भाजपा के लिए सबसे अहम पश्चिम बंगाल का चुनाव है। भारत की राजनीति में एकाध ही प्रादेशिक क्षत्रप हैं, जिनसे भाजपा सीधी लड़ाई लड़ती है और हरा नहीं पाती है। ममता बनर्जी को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा आज तक नहीं हरा पाई है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा बंगाल में सबसे मजबूत होकर उभरी तब भी ममता बनर्जी की पार्टी को उससे ज्यादा सीटें मिलीं। उसके बाद के चुनाव में तो ममता ने चैलेंज देकर भाजपा को सौ सीट के नीचे रोका। भाजपा को 2021 के चुनाव में 77 सीटें मिलीं। इसकी एक व्याख्या तो यह है कि भाजपा 2016 की तीन सीटों से बढ़ कर 77 पहुंची और दूसरी व्याख्या यह है कि भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में सौ से ज्यादा सीटों पर मिली बढ़त से घट कर 77 पर रह गई।

जो हो, इस बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा विधानसभा चुनाव में तीसरी बार ममता बनर्जी के मुकाबले सीधी लड़ाई में उतरेगी। ध्यान रहे तीसरी सीधी लड़ाई में भाजपा ने अरविंद केजरीवाल को भी हरा दिया था। दिल्ली में 2013 के चुनाव में भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी। वह 2015 और 2020 में आम आदमी पार्टी से हारी लेकिन 2025 में उसने उसे हरा दिया। ऐसे ही पश्चिम बंगाल में 2016 और 2021 के बाद अब तीसरी लड़ाई है। इस बार हर दांव आजमाए जा रहे हैं। पिछले 10 साल में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के हर दांव पेंच को समझा है। उसकी ताकत और चुनाव लड़ने के तरीके को ऑब्जर्व किया है और उस हिसाब से रणनीति बनी है। इसमें चुनाव आयोग भी अहम भूमिका निभा रहा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के जरिए 63 लाख नाम काटे जा चुके हैं। 60 लाख नाम विचाराधीन श्रेणी में रखे गए हैं, जिनमें से 25 से 30 लाख नाम और कट सकते हैं।

इनमें से ज्यादातर नाम मुस्लिम बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तरी दिनाजपुर जिले के हैं। भाजपा का दावा है कि इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे घोस्ट मतदाता थे, जिनकी सरकारी तंत्र से बोगस वोटिंग करा कर ममता बनर्जी जीतती हैं। इस बार के चुनाव में इस दावे की भी परीक्षा हो जाएगी। चुनाव आयोग इस बार बुर्के वाली महिलाओं की मतदान केंद्र से बाहर भी जांच करने की तैयारी कर रहा है। केंद्रीय बलों की तैनाती चुनाव की घोषणा से पहले ही कर दी गई है। पूर्व आईपीएस अधिकारी आरएन रवि को चुनाव से ऐन पहले बंगाल का राज्यपाल बनाया गया। वे तमिलनाडु में डीएमके से टकराव की वजह से मशहूर हुए थे। इसी तरह चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसी ईडी ने ममता बनर्जी का चुनाव प्रबंधन कर रही कंपनी आईपैक के ऊपर छापा मारा। आचार संहिता लगते ही चुनाव आयोग ने ममता की बनाई नंदिनी चक्रवर्ती को मुख्य सचिव के पद से हटा दिया।

भाजपा पश्चिम बंगाल के चुनाव को एक राजनीतिक मुकाबले से ज्यादा सभ्यतागत संघर्ष के रूप में लड़ रही है। यह बात पार्टी के प्रवक्ता चैनलों में कह रहे हैं। भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी राज्य में अगर भाजपा चुनावी मुकाबले को सभ्यतागत संघर्ष बता रही है तो उसकी बेचैनी को समझा जा सकता है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव की घोषणा से एक दिन पहले कोलकाता के परेड ग्राउंड मैदान में अपने भाषण में यह भय दिखाया कि हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। असल में भारत की जो सभ्यता है वह कई संस्कृतियों का समुच्य है। भारत विरूद्धों में सामंजस्य साधने की सहस्त्राब्दियों पुरानी व्यवस्था का नाम है। भाजपा सांस्कृतिक भिन्नता को सभ्यतागत संघर्ष बता रही है। यह काम तमिलनाडु में भी किया जा रहा है। सो, राजनीतिक प्रबंधन, चुनाव आयोग की भूमिका, भाजपा की सर्वशक्तिमान सत्ता की ताकत और चुनाव को सभ्यतागत संघर्ष बनाने का नैरेटिव बंगाल में कितना कामयाब होता है इस पर सबकी नजर होगी। अगर भाजपा इतना सब करने के बाद भी नहीं जीतती है तो उसे गंभीरतापूर्वक अपनी इस राजनीति पर विचार करना होगा।

असम में भाजपा के लिए लड़ाई अपेक्षाकृत आसान इसलिए लगती है क्योंकि वहां परिसीमन के बाद 105 के करीब सीटें ऐसी हो गईं, जिन पर मुस्लिम मतदाताओं का असर बिल्कुल खत्म हो गया है। भाजपा इन्हीं सीटों पर पूरा दम लगा कर लड़ती है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और घुसपैठ के नाम पर राष्ट्रीय सुरक्षा का नैरेटिव भाजपा को सपोर्ट करता है। कुछ भाजपा के प्रयासों और कुछ अपने कारणों से कांग्रेस असम में कमजोर हुई है। उसके कई नेता पार्टी छोड़ कर गए हैं। फिर भी गौरव गोगोई पूरी ताकत से लड़ रहे हैं।

केरल में भाजपा का मुख्य प्रयास अपना वोट आधार बढ़ाने और ऐसी राजनीतिक बिसात बिछाने का है, जिसमें कांग्रेस फिर नहीं जीत पाए। भाजपा को पता है कि किसी भी नए राज्य में कांग्रेस की जीत उसे राष्ट्रीय स्तर पर संजीवनी देगी। लेकिन अगर वाम मोर्चा केरल में जीत जाता है तो उससे राष्ट्रीय राजनीति पर रत्ती भर असर नहीं पड़ेगा। तभी केरल का चुनाव भाजपा के नजरिए से देखने की जरुरत नहीं है। वहां के चुनाव नतीजे में दिलचस्पी का तत्व सिर्फ यह है कि कांग्रेस जीतती है या नहीं।

तमिलनाडु जरुर दिलचस्प चुनाव है क्योंकि एमके स्टालिन ने तमिल उप राष्ट्रीयता और भाषायी अस्मिता के साथ साथ विकास की राजनीति भी की है। देश की 15 फीसदी पंजीकृत विनिर्माण ईकाई तमिलनाडु में है और 15 फीसदी मजदूर वहां काम करते हैं। चाहे निवेश की बात हो, प्रति व्यक्ति आय की बात हो, जीडीपी की बात हो या औद्योगिक विकास की बात हो, तमिलनाडु मिसाल बना है। वहां भाजपा सनातन और हिंदी के सम्मान की बात करती है लेकिन उसकी सहयोगी अन्ना डीएमके ऐसा नहीं करती है। वह भी मोटे तौर पर डीएमके वाले एजेंडे पर ही चलती है। भाजपा राज्य की राजनीति में छोटी पार्टी है और बहुत कम सीटों पर लड़ेगी। लेकिन उसका प्रयास होगा कि अन्ना डीएमके के कंधे पर सवार होकर डीएमके को हराए। इससे भाजपा के लिए तमिल राजनीतिक का दरवाजा खुलेगा और कांग्रेस की एक बड़ी मददगार पार्टी कमजोर होगी।

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