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असम में क्या पूरी होगी कांग्रेस की उम्मीद?

अप्रैल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें से दो राज्य कांग्रेस की उम्मीदों के प्रदेश हैं। कांग्रेस को केरल और उसके साथ साथ असम से बहुत उम्मीदें हैं। कांग्रेस को लग रहा है कि 10 साल की सत्ता ने प्रदेश में भाजपा को अलोकप्रिय बनाया है और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के भड़काऊ भाषणों व विभाजनकारी राजनीति से लोग ऊबे हुए हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? यह सही है कि 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी है और संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए से भी असम के लोगों में नाराजगी है। फिर भी पिछले दो चुनावों से जिस स्तर का ध्रुवीकरण हो रहा है वह कांग्रेस के लिए चुनौती है। हालांकि इस बार कांग्रेस ने बदरूद्दीन अजमल की पार्टी से तालमेल नहीं किया है। इससे ध्रुवीकरण की संभावना थोड़ी कम हुई है।

बहरहाल, पहले सीएए की बात करते हैं। भाजपा ने 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए पर अमल इसलिए रोक दिया था क्योंकि असम में उसको इसके नुकसान का अंदाजा हो गया था। गौरतलब है कि सीएए का कानून 2019 में पास किया गया लेकिन उसे लागू करने के नियम नहीं बनाए गए। 2021 के चुनाव में भाजपा को इसका असम में फायदा हुआ और पश्चिम बंगाल में थोड़ा नुकसान हुआ। अब पश्चिम बंगाल में फायदे के लिए उसने सीएए लागू कर दिया लेकिन हो सकता है कि असम में इसका नुकसान हो। असम में यह धारणा बनी है कि सीएए से बांग्ला बोलने वाली आबादी बढ़ जाएगी और असमिया भाषा व संस्कृति कमजोर होगी।

कांग्रेस के नेता और मुख्यमंत्री पद के अघोषित दावेदार गौरव गोगोई अहोम वंश से जुड़े हैं और असमिया भाषा और संस्कृति के मुद्दे उठाते रहते हैं। साथ ही कांग्रेस ने भाषा व संस्कृति के आधार पर सीएए का विरोध करने वाले समूहों द्वारा बनाई गई पार्टियों से तालमेल किया है। वह भाजपा के धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण के मुकाबले भाषा और अस्मिता के आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है।

कांग्रेस पार्टी ने असम में उम्मीदवारों का चयन करने के लिए छंटनी समिति बनाई है, जिसका अध्यक्ष प्रियंका गांधी वाड्रा को बनाया गया है। इससे भी लग रहा है कि कांग्रेस असम को लेकर काफी भरोसे में है। गठबंधन की बातचीत भी लगभग तय है। सांप्रदायिक ध्रुवीकऱण रोकने के लिए कांग्रेस ने इस बार बदरूद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एआईयूडीएफ से तालमेल नहीं किया है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने अजमल की पार्टी के लिए 20 सीटें छोड़ी थीं।

पिछली बार की तरह इस बार बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट यानी बीपीएफ भी कांग्रेस के साथ नहीं है। हागरामा मोहिलारी की पार्टी ने बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल यानी बीटीसी का चुनाव जीता और उसके बाद भाजपा ने उससे तालमेल कर लिया है। अब बोडोलैंड की दोनों पार्टियां बीटीसी और यूपीपीएल भाजपा के साथ हैं। कांग्रेस ने अजमल और मोहिलारी की पार्टी को 32 सीटें दी थीं और खुद 95 सीटों पर लड़ी थी। इस बार ये दोनों पार्टियां कांग्रेस के साथ नहीं हैं। लेकिन कांग्रेस ने अलग अलग जातीय समूहों में असर रखने वाली छोटी पार्टियों के साथ अपना गठबंधन किया है।

कांग्रेस ने पिछली बार महाजोत बनाया था, जिसमें एआईयूडीएफ, बीपीएफ के साथ साथ राष्ट्रीय जनता दल, तीन कम्युनिस्ट पार्टियां और एक अन्य दल शामिल था। इस बार कांग्रेस ने असोम सम्मिलितो मोर्चा बनाया है। इसमें कांग्रेस के अलावा पहले की तरह सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले शामिल है। पिछली बार यूआरएफ बना कर अलग चुनाव लड़ी दो स्थानीय पार्टियों लुरिनजोत गोगोई की असम जातीयता परिषद और अखिल गोगोई की रायजोर दल से इस बार कांग्रेस ने तालमेल किया है। इनके अलावा ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस से भी कांग्रेस ने तालमेल किया है। यूपीपीएल और बीपीएफ के नहीं होने से हिल एरिया के लिए कांग्रेस को एक पार्टी की जरुरत थी। सात पार्टियों का सम्मिलित मोर्चा भले पिछली बार के मुकाबले कमजोर दिख रहा है लेकिन जमीनी असर और नैरेटिव के मामले में इस मोर्चे ने चुनाव से पहले भाजपा को कड़ी टक्कर देने का संकेत दिया है।

अब अगर पिछले चुनाव की बात करें तो एनडीए और महाजोत के बीच बेहद करीबी मुकाबला हुआ था। एनडीए को 44.51 फीसदी वोट मिला था तो महाजोत को 43.68 फीसदी वोट मिला था। यानी अंतर एक फीसदी से भी कम था। हालांकि सीटों में बड़ा अंतर आ गया था। यह भारत की ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ सिस्टम की अंतर्निहित खामी है। 44.51 फीसदी वोट पर एनडीए को 75 यानी 59.5 फीसदी सीटें मिलीं। दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला महाजोत 43.68 फीसदी वोट लेकर 50 यानी 39.7 फीसदी सीटें जीत सका। महाजोत का असली फायदा अजमल की पार्टी को मिला, जो 20 सीटों पर लड़ कर नौ फीसदी वोट लाई और 16 सीटें जीत गई।

मोहिलारी की पार्टी 3.39 फीसदी वोट लेकर तीन ही सीट जीत पाई और कांग्रेस 29 फीसदी वोट लेकर 29 सीट जीत पाई। वोट का यह ट्रेंड थोड़े बहुत अंतर के साथ लोकसभा चुनाव 2024 में भी बना रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 42 फीसदी और कांग्रेस को 40 फीसदी के करीब वोट मिले। लोकसभा चुनाव गौरव गोगोई की कमान में लड़ा गया था। उनकी कोलियाबोर सीट परिसीमन में समाप्त हो गई तो वे जोरहाट सीट से लड़े और चुनाव जीते। कांग्रेस को तीन ही सीट मिली, लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि कांग्रेस के रकिबुल हसन ने बदरूद्दीन अजमल को 10 लाख से ज्यादा वोट से हरा दिया।

कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि मुस्लिम वैसे भी कांग्रेस के साथ हैं इसलिए उसने अजमल की पार्टी से तालमेल नहीं किया। कांग्रेस यह भी मानती है कि इससे भाजपा को ध्रुवीकरण कराने का मौका नहीं मिलेगा। हालांकि अजमल की पार्टी अपने असर वाले इलाके खास कर धुबरी, बारपेटा, करीमगंज आदि में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। लेकिन कांग्रेस को यह भी पता है कि जीतने के बाद अजमल के भाजपा के साथ जाने की संभावना नहीं है। यानी जरुरत पड़ने पर वे कांग्रेस के साथ देंगे। सांप्रदायिक विभाजन रोकने के लिए कांग्रेस असम के स्थानीय समूहों में पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है। रायजोर दल और असम जातीयता परिषद से उसको इसका लाभ मिलेगा। दूसरे गौरव गोगोई की वजह से कांग्रेस को एक एडवांटेज मिला हुआ है।

तभी हिमंत बिस्वा सरमा ने गोरव गोगोई को निशाना बनाया है। वे उनकी पत्नी को लेकर हमले कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि गौरव गोगोई की पत्नी का पाकिस्तान से रिश्ता है। वे पाकिस्तानी एनजीओ के लिए काम कर चुकी हैं और उनका बार बार पाकिस्तान आना जाना हुआ है। हालांकि गौरव गोगोई पर इस तरह के निजी हमले से भाजपा को नुकसान हो सकता है। उनके अलावा सरमा का मुख्य मुद्दा घुसपैठ का है। वे लगातार घुसपैठियों को बाहर निकालने के दावे कर रहे हैं। अमित शाह ने भी घुसपैठियों को बाहर निकालने और भारत की जमीन खाली कराने के लिए सरमा की तारीफ की है। अपने कामकाज और उपलब्धियों की बजाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने के मुद्दे, मियां मुस्लिम को बाहर निकालने, घुसपैठियों की पहचान करने या पाकिस्तान के नाम पर गौरव गोगोई को निशाना बनाने जैसे तमाम मुद्दे निगेटिव प्रचार वाले हैं।

इसी तरह के प्रचार सरमा ने झारखंड चुनाव में सह प्रभारी के तौर पर किया था और भाजपा बुरी तरह से हारी थी। खुद हिमंत बिस्वा सरमा कहते हैं कि असम में मुस्लिम आबादी 34 फीसदी है। इसका मतलब है कि भाजपा को जीतने के लिए 66 फीसदी हिंदू आबादी में से 70 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करना होगा। पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनाव से भाजपा इसमें कामयाब होती रही है। लेकिन इस बार रास्ता आसान नहीं है। असमिया संस्कृति का मुद्दा कांग्रेस और उसकी सहयोगियों ने बनाया है तो देश के अलग अलग हिस्सों में भाजपा शासित राज्यों में बांग्लाभाषियों पर हुए हमले का मुद्दा भी है। हिंदी भाषी लोगों की भी अपनी समस्याए हैं। तभी कांग्रेस ने भी उम्मीद लगाई है।

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