आयोजन की अव्यवस्था एक रूपक बन गई। भीड़ से भरे हॉल, कमजोर कनेक्टिविटी और कड़ी सुरक्षा ने उन सहज संवादों को बाधित किया, जहां से नए विचार जन्म लेते हैं। यदि भारत नेतृत्व चाहता है तो उसे पैमाने के साथ-साथ सटीकता भी साधनी होगी—वह शांत दक्षता जो घोषणाओं को टिकाऊ संस्थाओं में बदलती है।….उत्सवी मॉडल से पहुंच तो बढ़ती है, पर फोकस धुंधला हो सकता है। श्रेष्ठ वैज्ञानिक सहयोग गहराई और घनत्व पर फलता है।
भारत का एआई मेला
सुबह नौ बजे तक बैरिकेड लग चुके थे। नई दिल्ली के भारत मंडपम के बाहर प्रतिनिधि सुरक्षा जांच से गुजर रहे थे। स्वयंसेवक क्यूआर कोड स्कैन कर रहे थे और कैमरे अपनी जगह तलाश रहे थे। अंदर बड़े हॉल एलईडी स्क्रीन से चमक रहे थे, जिन पर लिखा था—“People, Planet, Progress।” दोपहर तक वाई-फाई दबाव नहीं झेल पाया। होटलों ने ऊंचे दाम बोलने शुरू कर दिए। सुरक्षा घेरा दूर तक फैला था। फिर भी भीड़ आती रही।
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया, सामान्य सम्मेलन नहीं था। यह एक बड़ा आयोजन था—करीब 100 देशों से ढाई लाख से अधिक लोग आए। अलग-अलग मंडपों में बहुभाषी एआई मॉडल से लेकर खेती में एआई के प्रयोग तक सब दिखाया गया। अगर 2023 में ब्लेचली पार्क का पहला वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन अस्तित्वगत जोखिमों पर सावधानी से चर्चा करने वाला सेमिनार था, तो दिल्ली का आयोजन लोकतांत्रिक तमाशा था—महत्त्वाकांक्षा का मेला। सवाल यही है कि क्या मेले गिरजाघर बनाते हैं?
इस वंशावली को समझना जरूरी है। 2023 का ब्लेचली पार्क सीमित और संयत था, जहां ‘गार्डरेल’ और सीमाओं की चर्चा हुई। 2024 में सियोल ने नवाचार और समावेशन पर जोर देते हुए स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं की बात की। 2025 का पेरिस निवेश और टिकाऊ विकास की ओर झुका। भारत ने इन सब विषयों को अपनाया, पर पैमाना बदल दिया। जहां ब्लेचली में लगभग 100 प्रतिभागी थे, दिल्ली में ढाई लाख थे।
पहले आयोजन चुने हुए लोगों तक सीमित थे, भारत का आयोजन खुला था—आधा कूटनीतिक शिखर सम्मेलन, आधा व्यापार मेला, और कुछ-कुछ जनोत्सव। वैश्विक दक्षिण में इस तरह की यह पहली बड़ी बैठक थी, और इसका प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट था। दशकों से डिजिटल शासन के नियम वाशिंगटन, ब्रसेल्स और बीजिंग में लिखे जाते रहे हैं। भारत का दांव यह है कि 1.4 अरब लोगों वाला देश—जहां दुनिया के सबसे बड़े डेवलपर समुदायों में से एक है और करीब 20 करोड़ सक्रिय एआई उपयोगकर्ता हैं—सिर्फ नियम माने नहीं, उन्हें लिखने में भाग भी ले।
इसे केवल रंगमंच कहकर खारिज करना भूल होगी। भारत ने ठोस घोषणाएं कीं—वैश्विक बाजार से कम दर पर जीपीयू उपलब्ध कराने की सब्सिडी, 22 भारतीय भाषाओं में स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल को समर्थन, स्टार्टअप्स के लिए सरकारी वेंचर फंड, और एक अरब डॉलर से अधिक के विस्तारित इंडिया एआई मिशन का बजट। यह मामूली नहीं है। एआई के दौर में कंप्यूट ही किस्मत है, और भारत लंबे समय से कंप्यूट की कमी से जूझता रहा है। बुनियादी ढांचा साझा कर और प्रवेश की बाधाएं घटाकर सरकार एक ढांचागत बदलाव की कोशिश कर रही है—एआई को चुनिंदा प्रयोगशालाओं से निकालकर व्यापक प्रयोग का विषय बनाना।
भारत की रणनीति में भू-राजनीतिक समझ भी दिखती है। अमेरिका और चीन चिप्स और निर्यात नियंत्रण को लेकर शून्य-योग की प्रतिस्पर्धा में उलझे हैं, वहीं भारत अपेक्षाकृत लचीली जगह पर खड़ा है। अब तक के सबसे बड़े एआई आयोजनों में से एक की मेजबानी कर और उसे प्रभुत्व नहीं, ‘इम्पैक्ट’ की भाषा में रखकर भारत ने खुद को विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सेतु की तरह पेश किया। इस अर्थ में मेला भी रणनीति है। एआई को किसी रहस्यमय सीमांत तकनीक के बजाय विकास के औजार की तरह दिखाया गया—गांवों में टेलीमेडिसिन, सरकारी स्कूलों में अनुकूलित शिक्षण, छोटे किसानों के लिए सटीक कृषि। जिस देश में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने भुगतान और पहचान की तस्वीर बदल दी हो, वहां यह कथा असर करती है।
लेकिन महत्त्वाकांक्षा और क्षमता एक नहीं होतीं। सीमांत एआई में भारत अब भी देर से आने वाला खिलाड़ी है। उसके पास विशाल सॉफ्टवेयर प्रतिभा है, पर शीर्ष शोध का बड़ा हिस्सा विदेश चला जाता है। घरेलू कंपनियां एप्लिकेशन और सेवाओं में दक्ष हैं, खरबों पैरामीटर वाले मॉडल प्रशिक्षित करने में नहीं। समिट में 20 से 50 अरब पैरामीटर वाले सिस्टम प्रदर्शित हुए—व्यावहारिक और किफायती सही, पर अग्रिम पंक्ति से दूर। घोषित निवेश भी निर्भरता दिखाते हैं। भारतीय डेटा केंद्रों में आने वाले कई अरब डॉलर का निवेश मुख्यतः अमेरिकी हाइपरस्केलर्स से आएगा। इससे रोजगार और क्षमता बढ़ेगी, पर पारिस्थितिकी तंत्र की निर्भरता भी गहरी होगी।
आयोजन की अव्यवस्था एक रूपक बन गई। भीड़ से भरे हॉल, कमजोर कनेक्टिविटी और कड़ी सुरक्षा ने उन सहज संवादों को बाधित किया, जहां से नए विचार जन्म लेते हैं। यदि भारत नेतृत्व चाहता है तो उसे पैमाने के साथ-साथ सटीकता भी साधनी होगी—वह शांत दक्षता जो घोषणाओं को टिकाऊ संस्थाओं में बदलती है।
एक सूक्ष्म जोखिम भी है। उत्सव मॉडल से पहुंच तो बढ़ती है, पर फोकस धुंधला हो सकता है। श्रेष्ठ वैज्ञानिक सहयोग गहराई और घनत्व पर फलता है। जन-उत्साह राजनीति को ऊर्जा देता है, पर तकनीकी कठोरता को कमजोर कर सकता है। कला दोनों को साधने में है।
फिर भी अव्यवस्था को केवल कुप्रबंधन कहना जल्दबाजी होगी। भारत का विकास मॉडल अक्सर क्रमिकता से नहीं, साहस से आगे बढ़ा है। डिजिटल भुगतान पूरी तरह परखे पायलटों से नहीं, तेज राष्ट्रीय विस्तार से फैले। आधार, जैविक पहचान प्रणाली, विवादों और चुनौतियों के बीच फैलकर ही बुनियादी ढांचा बनी। एआई समिट भी उसी पैटर्न पर है—पहले विस्तार, फिर परिष्कार।
अंतर केवल समय का है। अमेरिका और चीन जिस गति से निवेश बढ़ा रहे हैं, वह दोध्रुवीय व्यवस्था को स्थायी बना सकती है। यूरोप नियमन में आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है। यदि भारत पूर्ण तैयारी की प्रतीक्षा करेगा तो वह एक पीढ़ी पीछे रह सकता है। यदि वह अपूर्णता के साथ भी निर्णायक कदम उठाता है, तो वह अपनी अलग राह बना सकता है—भाषाई विविधता, लागत दक्षता और सार्वजनिक सेवा वितरण पर केंद्रित एआई।
इस अर्थ में यह मेला चेतावनी भी है और दांव भी। चेतावनी इसलिए कि तमाशा यदि क्रियान्वयन में न बदला तो आलोचक कहेंगे कि भारत भाषण में आगे, व्यवस्था में पीछे है। दांव इसलिए कि पैमाना ही गति पैदा कर सकता है—कि सैकड़ों नहीं, लाखों को साथ लाकर भारत एआई की ऐसी संस्कृति गढ़ सकता है, जो बंद दरवाजों की बैठकों से संभव नहीं।
भारत मंडपम के हॉल में, गड़बड़ियों और भाषणों के बीच, एक देश बेचैन दिखा—सदी की निर्णायक तकनीक में अपनी भूमिका तय करने को उतावला। अब असली परीक्षा दुनिया की मेजबानी नहीं, घर में शांत निर्माण की है—ऐसी शोध संस्थाएं जो प्रतिभा रोक सकें, ऐसे कंप्यूट क्लस्टर जो वैश्विक मानक पर खरे उतरें, ऐसे नियामक ढांचे जो नवाचार और अधिकार के बीच संतुलन रखें।
मेले खत्म होते हैं। संस्थाएं टिकती हैं।
यदि इस सप्ताह की ऊर्जा अगले दशक के अनुशासन में ढल गई, तो इतिहास इस अव्यवस्था को शर्म नहीं, चिंगारी कहेगा। यदि नहीं, तो समिट के बाहर लगे बैरिकेड ही ज्यादा सटीक प्रतीक बनेंगे—सुरक्षा के नहीं, उस देश के जो दुनिया को इकट्ठा तो कर सका, पर उसकी गति से ताल मिलाने में हांफ गया।
