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जो मुद्दे चुनाव पर छाये और जो गायब रहे

Jahanabad, Nov 11 (ANI): Women voters wait in a queue to cast their vote for the second phase of the Bihar assembly election, in Jahanabad on Tuesday. (ANI Photo)

भारत की ढांचागत आर्थिक समस्याएं हैं। ऊपर से ईरान युद्ध से पैदा हुई चुनौतियां हैं, जो वैश्विक ढांचागत बदलाव की जनक बन रही हैं। इन मुश्किलों के कारण दुनिया को गहरी आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है। जो पहले से कमजोर है, लाजिमी है कि उसे ये पीड़ा ज्यादा महसूस होगी। बेशक, भारत उसी श्रेणी में आता है।  ईरान युद्ध ने भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के लिए बहुआयामी चुनौतियां पेश की हैं।

चार राज्यों- पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल- और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के नतीजे कल आएंगे। उसके पहले कई एग्जिट पोल के अनुमान सामने आए हैं, लेकिन उनसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के बारे में ठोस संकेत नहीं मिल सका है। असम और केरल के बारे में इन पोल्स ने जरूर पूर्व-अनुमानों के अनुरूप भविष्यवाणी की है। इसके मुताबिक असम में भारतीय जनता पार्टी की वापसी होगी, जबकि केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) के हाथ से सत्ता निकल जाएगी। मतलब यह कि केरल में दस साल के अंतराल के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) सत्ता में लौटेगा।

भारत में एग्जिट पोल का संदिग्ध रिकॉर्ड है। ऐसा सिर्फ मतदाताओं से सर्वेक्षण करने की विधि की खामियों के कारण नहीं है। बल्कि अक्सर ऐसे आरोप लगे हैं कि सर्वे करने वाली एजेंसियां जानबूझ कर उभरे रुझानों में हेरफेर करती हैं। इसलिए उनके आधार पर विश्लेषण निरर्थक प्रयास है। बहरहाल, ये सर्वेक्षण उस बड़े चुनावी ड्रामा का एक अभिन्न अंग बन चुके हैं, जिनका मंचन मीडिया से लेकर सियासी दायरों और प्रचार अभियानों में देखने को मिलता है। फिल्मी गानों, डायलॉग, जुमलों और नाटकीय भाषणों का दिलचस्प नज़ारा इस बार भी खूब देखने को मिला।

मगर उसके साथ एक अन्य पहलू काबिल-ए-गौर रहा और वह है- युद्ध के अंदाज में चुनाव लड़ना। भारत में चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का यह खास योगदान है। इस चुनाव में जंग का ये अंदाज खासकर पश्चिम बंगाल में देखने को मिला। इसकी वजह शायद यह थी कि असम में अपनी स्थिति को लेकर भाजपा आश्वस्त थी, जबकि तमिलनाडु और केरल में उसे पांव कुछ और पसार लेने से ज्यादा की उम्मीद नहीं थी। तो उसके पास नया हासिल करने का एकमात्र मोर्चा पश्चिम बंगाल बना, जिसे ममता बनर्जी ने अब तक उसकी पहुंच से दूर रखा है। तो ममता बनर्जी को ढाहने की कोशिश में भाजपा ने साम-दाम-दंड-भेद के हर उपाय का सहारा ले लिया।

वैसे ममता बनर्जी आत्म-निरीक्षण करें, तो पाएंगी कि सफल होने की जुगत में ऐसे तौर-तरीकों से उन्हें भी कोई गुरेज नहीं रहा है। आखिर वाम मोर्चे के खिलाफ अपनी मोर्चाबंदी में उन्होंने माओवादियों से लेकर आरएसएस तक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जोड़ा था। इस बार अपने चुनाव क्षेत्र भवानीपुर में केंद्रीय बलों की कथित जोर-जबरदस्ती के आगे असहाय-सी दिख रहीं ममता बनर्जी ने कहा- चुनाव में ऐसा होते उन्होंने कभी नहीं देखा था! मगर उन्हें यह याद होगा कि “ऐसा करने” के लिए जिस भाजपा को उन्होंने दोषी माना, पश्चिम बंगाल में उसकी जड़ें फैलाने में उनका अपना योगदान कम नहीं है!

फिलहाल इन बातों का याद करने का संदर्भ बस इतना है कि आज चुनाव अगर बाहुबल और धनबल की जोर-आजमाईश, अनैतिकता के प्रदर्शन, ड्रामा और प्रलोभन (मतदाताओं को नकदी देने के वादे) का मौका भर बन गए हैं, तो यह स्थिति बनने का एक क्रम रहा है। आज अपनी ताकत और अनैतिकता के कारण भले भाजपा सबसे बड़ी खलनायक नजर आती हो, लेकिन ऐसी प्रवृत्तियों का इतिहास लंबा और प्रसार का दायरा कहीं बड़ा है। दरअसल, भाजपा आज इस हैसियत में पहुंची है, तो उसे वहां लाने में तृणमूल कांग्रेस या डीएमके जैसे “धर्मनिरपेक्ष” दलों या “सामाजिक न्याय” के मसीहाओं का योगदान कम नहीं है।

इन परिघटनाओं ने चुनावों को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जब आम जन की जिंदगी से जुड़े असल मुद्दे और राष्ट्र की वास्तविक चिंताएं उसकी चर्चा से बाहर बनी रहती हैं। मसलन, मौजूदा चुनाव किन मुद्दों पर लड़े गए, उन पर ध्यान देना दिलचस्प होगा। सरसरी नज़र डालते हैः

पश्चिम बंगालः

असम

तमिलनाडु

केरल

गौरतलब है कि इन चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम का जब एलान हुआ, उसके पहले ईरान युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। आम जीवन पर युद्ध के मारक असर की खबरें भी आम हो चुकी थीं। रसोई गैस के सिलिंडर के लिए लगी लंबी कतारें, श्रमिक वर्ग के लोगों का बड़े शहरों से पलायन, गैस की किल्लत से कई शहरों में रेस्तरां बंद होने या उनके मेनू सीमित होने आदि जैसी खबरें चर्चित थीं। मंहगाई का दौर लौटने लगा था। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण ह्वाइट कॉलर कर्मचारियों की नौकरी जाने की चर्चा गर्म थी और अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही थीं।

वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट पहले से ही गंभीर रूप लेता दिख रहा था। हाल में अमेरिका स्थित ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन रिसर्च ने इस संकट के कई पहलुओं का सार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने खुले पत्र में पेश किया। ध्यान देः

तो ये भारत की ढांचागत आर्थिक समस्याएं हैं। ऊपर ईरान युद्ध से पैदा हुई चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं, जो वैश्विक ढांचागत बदलाव की जनक बन रही हैं। इन मुश्किलों के कारण दुनिया को गहरी आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है। जो पहले से कमजोर है, लाजिमी है कि उसे ये पीड़ा ज्यादा महसूस होगी। बेशक, भारत उसी श्रेणी में आता है।

ईरान युद्ध ने भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के लिए बहुआयामी चुनौतियां पेश की हैं। उर्वरक और खाद्य तेल जैसे महत्त्वपूर्ण कच्चे माल की बढ़ती और अस्थिर कीमतें बड़ी चुनौती बन कर आई हैं। उर्वरकों के मामले खाड़ी क्षेत्र से आयात पर भारत अत्यधिक निर्भर है। युद्ध के कारण होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाली आपूर्ति शृंखलाएं बुरी तरह बाधित हुई हैं। आयातित उर्वरकों की लागत लगभग दोगुनी हो गई है। यूरिया के एक टेंडर की कीमत युद्ध-पूर्व के लगभग 510 डॉलर प्रति टन थी, जो अप्रैल में 935 डॉलर प्रति टन हो गई। इसी तरह, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की कीमतों में भी जबरदस्त उछाल आया है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक वैश्विक उर्वरक की कीमतें पहले से ही 50-80 प्रतिशत अधिक हो चुकी हैं।

और बात सिर्फ महंगाई की नहीं है। बल्कि अनेक जरूरी चीजों का बाजार में अभाव भी होने लगा है। देश के अंदर यूरिया बनाने में उपयोग होने वाली 60 प्रतिशत से अधिक एलएनजी खाड़ी क्षेत्र से आती है। इसकी आपूर्ति में बाधा के कारण घरेलू संयंत्र कम क्षमता पर चल रहे हैं।

कच्चे माल का यह झटका बढ़ती ईंधन और परिवहन लागत से और जटिल हो गया है। युद्ध क्षेत्र से शिपिंग में देरी और उच्च बीमा लागत के कारण सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के आयात में गंभीर रुकावट आई है। अतः देश खाद्य तेलों की कीमतें सात प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं। तो कुल मिलाकर ईरान युद्ध भारत में ऊर्जा संकट के साथ-साथ खाद्य संकट का जनक भी बनता दिख रहा है।

इस युद्ध के असर से देश की सकल आर्थिक स्थिति बिगड़ने के संकेत भी मिलने लगे हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भारत के आयात बिल को बढ़ाया है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा है। डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हो चुकी है। इसका देश की वित्तीय सेहत एवं आम परिवारों के बजट पर बेहद खराब असर हो रहा है।

वैसे तो कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के अलग-थलग पड़ने की स्थितियां पहले से मौजूद थीं, मगर युद्ध के संदर्भ में नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों ने भारत को कहीं का नहीं छोड़ा है। विश्व मंचों पर भारत आज जितना अप्रासंगिक नजर आता है, उतना इसके पहले कभी नहीं रहा।

ये वो मुद्दे हैं, जिन्हें किसी स्वस्थ लोकतंत्र के चुनाव में सर्व-प्रमुख मुद्दा बनना चाहिए। जिन पर गहरी और पूरी बहस होनी चाहिए। इन मसलों से उबारने की नीति और अपने  कार्यक्रम को लेकर सियासी पार्टियों को मतदाताओं के पास जाना चाहिए। और मतदाताओं को उसी आधार पर जनादेश देना चाहिए। मगर हकीकत यह है कि आज ऐसी बातें करना किसी सपने में जीने जैसा महसूस होता है। जाहिर है, कल चाहे चुनाव नतीजे जो आएं, उनसे इन बिंदुओँ पर किसी पहल या शुरुआत की गुंजाइश नहीं निकलेगी।

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