भारत की ढांचागत आर्थिक समस्याएं हैं। ऊपर से ईरान युद्ध से पैदा हुई चुनौतियां हैं, जो वैश्विक ढांचागत बदलाव की जनक बन रही हैं। इन मुश्किलों के कारण दुनिया को गहरी आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है। जो पहले से कमजोर है, लाजिमी है कि उसे ये पीड़ा ज्यादा महसूस होगी। बेशक, भारत उसी श्रेणी में आता है। ईरान युद्ध ने भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के लिए बहुआयामी चुनौतियां पेश की हैं।
चार राज्यों- पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल- और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के नतीजे कल आएंगे। उसके पहले कई एग्जिट पोल के अनुमान सामने आए हैं, लेकिन उनसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के बारे में ठोस संकेत नहीं मिल सका है। असम और केरल के बारे में इन पोल्स ने जरूर पूर्व-अनुमानों के अनुरूप भविष्यवाणी की है। इसके मुताबिक असम में भारतीय जनता पार्टी की वापसी होगी, जबकि केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) के हाथ से सत्ता निकल जाएगी। मतलब यह कि केरल में दस साल के अंतराल के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) सत्ता में लौटेगा।
भारत में एग्जिट पोल का संदिग्ध रिकॉर्ड है। ऐसा सिर्फ मतदाताओं से सर्वेक्षण करने की विधि की खामियों के कारण नहीं है। बल्कि अक्सर ऐसे आरोप लगे हैं कि सर्वे करने वाली एजेंसियां जानबूझ कर उभरे रुझानों में हेरफेर करती हैं। इसलिए उनके आधार पर विश्लेषण निरर्थक प्रयास है। बहरहाल, ये सर्वेक्षण उस बड़े चुनावी ड्रामा का एक अभिन्न अंग बन चुके हैं, जिनका मंचन मीडिया से लेकर सियासी दायरों और प्रचार अभियानों में देखने को मिलता है। फिल्मी गानों, डायलॉग, जुमलों और नाटकीय भाषणों का दिलचस्प नज़ारा इस बार भी खूब देखने को मिला।
मगर उसके साथ एक अन्य पहलू काबिल-ए-गौर रहा और वह है- युद्ध के अंदाज में चुनाव लड़ना। भारत में चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का यह खास योगदान है। इस चुनाव में जंग का ये अंदाज खासकर पश्चिम बंगाल में देखने को मिला। इसकी वजह शायद यह थी कि असम में अपनी स्थिति को लेकर भाजपा आश्वस्त थी, जबकि तमिलनाडु और केरल में उसे पांव कुछ और पसार लेने से ज्यादा की उम्मीद नहीं थी। तो उसके पास नया हासिल करने का एकमात्र मोर्चा पश्चिम बंगाल बना, जिसे ममता बनर्जी ने अब तक उसकी पहुंच से दूर रखा है। तो ममता बनर्जी को ढाहने की कोशिश में भाजपा ने साम-दाम-दंड-भेद के हर उपाय का सहारा ले लिया।
वैसे ममता बनर्जी आत्म-निरीक्षण करें, तो पाएंगी कि सफल होने की जुगत में ऐसे तौर-तरीकों से उन्हें भी कोई गुरेज नहीं रहा है। आखिर वाम मोर्चे के खिलाफ अपनी मोर्चाबंदी में उन्होंने माओवादियों से लेकर आरएसएस तक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जोड़ा था। इस बार अपने चुनाव क्षेत्र भवानीपुर में केंद्रीय बलों की कथित जोर-जबरदस्ती के आगे असहाय-सी दिख रहीं ममता बनर्जी ने कहा- चुनाव में ऐसा होते उन्होंने कभी नहीं देखा था! मगर उन्हें यह याद होगा कि “ऐसा करने” के लिए जिस भाजपा को उन्होंने दोषी माना, पश्चिम बंगाल में उसकी जड़ें फैलाने में उनका अपना योगदान कम नहीं है!
फिलहाल इन बातों का याद करने का संदर्भ बस इतना है कि आज चुनाव अगर बाहुबल और धनबल की जोर-आजमाईश, अनैतिकता के प्रदर्शन, ड्रामा और प्रलोभन (मतदाताओं को नकदी देने के वादे) का मौका भर बन गए हैं, तो यह स्थिति बनने का एक क्रम रहा है। आज अपनी ताकत और अनैतिकता के कारण भले भाजपा सबसे बड़ी खलनायक नजर आती हो, लेकिन ऐसी प्रवृत्तियों का इतिहास लंबा और प्रसार का दायरा कहीं बड़ा है। दरअसल, भाजपा आज इस हैसियत में पहुंची है, तो उसे वहां लाने में तृणमूल कांग्रेस या डीएमके जैसे “धर्मनिरपेक्ष” दलों या “सामाजिक न्याय” के मसीहाओं का योगदान कम नहीं है।
इन परिघटनाओं ने चुनावों को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जब आम जन की जिंदगी से जुड़े असल मुद्दे और राष्ट्र की वास्तविक चिंताएं उसकी चर्चा से बाहर बनी रहती हैं। मसलन, मौजूदा चुनाव किन मुद्दों पर लड़े गए, उन पर ध्यान देना दिलचस्प होगा। सरसरी नज़र डालते हैः
पश्चिम बंगालः
- वोटर लिस्ट विवाद: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सिलसिले में लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने और उनमें से 60 लाख मतदाताओं के बारे में पुनर्विचार की अर्जी दायर होने का मामला सबसे बड़ा मुद्दा बना। इस प्रक्रिया में धांधली के आरोप चुनाव प्रचार पर छाये रहे।
- ममता बनाम भाजपा: मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार जीत का इतिहास रचने की कोशिश में नजर आईं। वहीं भाजपा ने बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा किए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाई। इन दोनों चेहरों में कौन भारी पड़ेगा, यह व्यक्ति-केंद्रित चर्चा छायी रही।
- राजनीतिक हिंसा और ध्रुवीकरण: चुनाव प्रचार के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा समर्थकों के बीच हिंसक झड़प और कड़वी बयानबाजी सुर्खियों में रही। इसमें फिल्मी गानों के तमाशाई पहलू भी जुड़े।
असम
- पहचान और अवैध घुसपैठ: भाजपा का ‘अवैध घुसपैठियों’ को पहचान कर बाहर निकालने और असमिया पहचान बचाने का वादा केंद्रीय मुद्दा रहा।
- बाढ़ और विकास: हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ और पुनर्वास की धीमी प्रक्रिया की चर्चा रही। मगर इसका समाधान क्या है, इस बारे में किसी पक्ष ने ठोस योजना पेश नहीं की।
- महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और चाय बागान श्रमिकों की समस्याओं की चर्चा विपक्षी दलों ने की। मगर समाधान की योजना उनके विमर्श से भी गायब रही।
तमिलनाडु
- परिसीमन और हिंदी विरोधः लोकसभा चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के दक्षिणी राज्यों पर कथित खराब प्रभाव और हिंदी थोपने जैसे मुद्दों को सत्ताधारी डीएमके ने प्रमुख मुद्दा बनाया।
- शराब और कानून-व्यवस्था: राज्य में शराब की अवैध बिक्री और इससे जुड़े अपराध बड़ा चुनावी मुद्दा रहे। इसके अलावा, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर भी सियासत गरमाई।
- वोटिंग अवधि: टीवीके प्रमुख विजय ने मतदान का समय दो घंटे और बढ़ाने की मांग को बड़ा मुद्दा बनाया, ताकि अधिक से अधिक लोग मतदान कर सकें।
केरल
- विकास बनाम भ्रष्टाचार: सत्तारूढ़ एलडीएफ (वाम लोकतांत्रिक मोर्चा) ने चरम गरीबी मिटाने और आपदा प्रबंधन को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश किया। कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ का प्रमुख मुद्दा मौजूदा एलडीएफ सरकार का कथित भ्रष्टाचार और राज्य का कर्ज़ बढ़ाने के आरोप रहे।
- सबरीमला और सांप्रदायिक मुद्देः सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अतीत में रहे एलडीएफ के रुख को भाजपा ने मुद्दा बनाया और इस आधार पर उसे हिंदू विरोधी बताया गया, हालांकि एलडीएफ ने अब इस पर अपना रुख बदल लिया है। केरल के इस चुनाव में एक खास पहलू जातीय एवं सांप्रदायिक गोलबंदी रही। ईसाइयों से भेदभाव, ईसाई-संघी, जमात-ए-इस्लामी का असर, मुस्लिम ध्रुवीकरण, एड़वा (जाति) का झुकाव आदि जैसी चर्चाएं चुनाव प्रचार के दौरान चलती रहीं।
- ईरान संघर्ष का प्रभाव: चूंकि केरल के लाखों नागरिक खाड़ी देशों में रहते हैं, इसलिए ईरान युद्ध की चर्चा यहां हुई। युद्ध के आर्थिक प्रभाव और राज्य की अर्थव्यवस्था पर उसके संभावित असर की चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान हुई।
गौरतलब है कि इन चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम का जब एलान हुआ, उसके पहले ईरान युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। आम जीवन पर युद्ध के मारक असर की खबरें भी आम हो चुकी थीं। रसोई गैस के सिलिंडर के लिए लगी लंबी कतारें, श्रमिक वर्ग के लोगों का बड़े शहरों से पलायन, गैस की किल्लत से कई शहरों में रेस्तरां बंद होने या उनके मेनू सीमित होने आदि जैसी खबरें चर्चित थीं। मंहगाई का दौर लौटने लगा था। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण ह्वाइट कॉलर कर्मचारियों की नौकरी जाने की चर्चा गर्म थी और अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही थीं।
वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट पहले से ही गंभीर रूप लेता दिख रहा था। हाल में अमेरिका स्थित ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन रिसर्च ने इस संकट के कई पहलुओं का सार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने खुले पत्र में पेश किया। ध्यान देः
- बर्नस्टीन रिसर्च ने कहा कि भारत में रोजगार का सवाल चक्रीय नहीं, बल्कि अस्तित्वगत (existential, not cyclical) हो गया है। भारत का IT/ BPO क्षेत्र लगभग एक से डेढ़ करोड़ लोगों को रोज़गार देता है और देश में मध्य वर्ग का मुख्य आधार है। जनरेटिव एआई के कारण इस क्षेत्र में रोजगार के लिए प्रत्यक्ष खतरा पैदा हो गया है। मैनुफैक्चरिंग सेक्टर इस योग्य नहीं है कि यहां नौकरी गंवाने वाले कर्मियों को अपने में खपा सके।
- भारत का कृषि क्षेत्र 1970 के दशक के नीति चक्र में अटका हुआ है। इस क्षेत्र पर आज भी श्रम शक्ति का 42 से 45 फीसदी हिस्सा निर्भर है, जबकि जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान महज 15-16 प्रतिशत है। बर्नस्टीन ने ध्यान दिलाया कि ज्यादातर कृषकों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है, कोल्ड स्टोरेज एवं अन्य कृषि सुविधाओं का अभाव है और फसल बिक्री की ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिससे कृषि क्षेत्र की आमदनी बढ़ सके।
- ब्रोकरेज ने चेतावनी दी है कि एआई अर्थव्यवस्था में निर्माता के बजाय भारत एक “स्थायी उपभोक्ता” बनकर रह जा सकता है। इसका कारण घरेलू एआई मॉडलों का अभाव है। फिलहाल सूरत यह है कि इस क्षेत्र का अधिकांश लाभ अमेरिका और चीन के पास केंद्रित हो रहा है।
- बर्नस्टीन ने आगाह किया कि कैश ट्रांसफर योजनाओं से चुनाव जीतने की लगी होड़ के कारण राजकोष पर दबाव बढ़ रहा है। सियासी मकसद से शुरू की गई इन योजनाओं पर सालाना लगभग 1.7 से 2.5 लाख करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। यह खर्च सड़क, सिंचाई, और अनुसंधान (R&D) जैसे निर्णायक महत्त्व क्षेत्रों में निवेश की कीमत पर किया जा रहा है।
- कारखाना क्षेत्र में पश्चिम कंपनियों की ‘चीन+1’ रणनीति से भारत अपेक्षित लाभ नहीं उठा पाया है। मैनुफैक्चरिंग का जीडीपी में केवल 16-17 प्रतिशत योगदान बना हुआ है और रोज़गार सृजन की इसकी क्षमता सीमित है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी जैसे महत्वपूर्ण कलपुर्जों के लिए भी आयात निर्भरता बनी हुई है।
- भारत का अनुसंधान और विकास (R&D) खर्च जीडीपी का मात्र 0.6-0.7 प्रतिशत है, जो वैश्विक मानकों से काफी कम है। आविष्कार आधारित अर्थव्यवस्था बनने के लिहाज से यह बेहद नाकाफी है।
- बर्नस्टीन ने आगाह किया यह चलन भारत को “कम उत्पादकता वाली” ऐसी अर्थव्यवस्था बनाए रख सकता है, जहां राजकोष का पैसा भविष्य की क्षमता विकसित करने के बजाय मौजूदा खपत पर खर्च होता है।
तो ये भारत की ढांचागत आर्थिक समस्याएं हैं। ऊपर ईरान युद्ध से पैदा हुई चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं, जो वैश्विक ढांचागत बदलाव की जनक बन रही हैं। इन मुश्किलों के कारण दुनिया को गहरी आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है। जो पहले से कमजोर है, लाजिमी है कि उसे ये पीड़ा ज्यादा महसूस होगी। बेशक, भारत उसी श्रेणी में आता है।
ईरान युद्ध ने भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के लिए बहुआयामी चुनौतियां पेश की हैं। उर्वरक और खाद्य तेल जैसे महत्त्वपूर्ण कच्चे माल की बढ़ती और अस्थिर कीमतें बड़ी चुनौती बन कर आई हैं। उर्वरकों के मामले खाड़ी क्षेत्र से आयात पर भारत अत्यधिक निर्भर है। युद्ध के कारण होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाली आपूर्ति शृंखलाएं बुरी तरह बाधित हुई हैं। आयातित उर्वरकों की लागत लगभग दोगुनी हो गई है। यूरिया के एक टेंडर की कीमत युद्ध-पूर्व के लगभग 510 डॉलर प्रति टन थी, जो अप्रैल में 935 डॉलर प्रति टन हो गई। इसी तरह, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की कीमतों में भी जबरदस्त उछाल आया है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक वैश्विक उर्वरक की कीमतें पहले से ही 50-80 प्रतिशत अधिक हो चुकी हैं।
और बात सिर्फ महंगाई की नहीं है। बल्कि अनेक जरूरी चीजों का बाजार में अभाव भी होने लगा है। देश के अंदर यूरिया बनाने में उपयोग होने वाली 60 प्रतिशत से अधिक एलएनजी खाड़ी क्षेत्र से आती है। इसकी आपूर्ति में बाधा के कारण घरेलू संयंत्र कम क्षमता पर चल रहे हैं।
कच्चे माल का यह झटका बढ़ती ईंधन और परिवहन लागत से और जटिल हो गया है। युद्ध क्षेत्र से शिपिंग में देरी और उच्च बीमा लागत के कारण सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के आयात में गंभीर रुकावट आई है। अतः देश खाद्य तेलों की कीमतें सात प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं। तो कुल मिलाकर ईरान युद्ध भारत में ऊर्जा संकट के साथ-साथ खाद्य संकट का जनक भी बनता दिख रहा है।
इस युद्ध के असर से देश की सकल आर्थिक स्थिति बिगड़ने के संकेत भी मिलने लगे हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भारत के आयात बिल को बढ़ाया है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा है। डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हो चुकी है। इसका देश की वित्तीय सेहत एवं आम परिवारों के बजट पर बेहद खराब असर हो रहा है।
वैसे तो कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के अलग-थलग पड़ने की स्थितियां पहले से मौजूद थीं, मगर युद्ध के संदर्भ में नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों ने भारत को कहीं का नहीं छोड़ा है। विश्व मंचों पर भारत आज जितना अप्रासंगिक नजर आता है, उतना इसके पहले कभी नहीं रहा।
ये वो मुद्दे हैं, जिन्हें किसी स्वस्थ लोकतंत्र के चुनाव में सर्व-प्रमुख मुद्दा बनना चाहिए। जिन पर गहरी और पूरी बहस होनी चाहिए। इन मसलों से उबारने की नीति और अपने कार्यक्रम को लेकर सियासी पार्टियों को मतदाताओं के पास जाना चाहिए। और मतदाताओं को उसी आधार पर जनादेश देना चाहिए। मगर हकीकत यह है कि आज ऐसी बातें करना किसी सपने में जीने जैसा महसूस होता है। जाहिर है, कल चाहे चुनाव नतीजे जो आएं, उनसे इन बिंदुओँ पर किसी पहल या शुरुआत की गुंजाइश नहीं निकलेगी।


