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पंजाब निकाय चुनाव में फिसड्डी रही भाजपा

भाजपा की चुनावी सोच की दाद देनी चाहिए । कम से कम पंजाब में हुए निकाय चुनावों को लेकर। सूबे में पिछले दिनों हुए इन चुनावों में वह एक ,दो या तीसरे नहीं बल्कि पाँचवें स्थान पर रही यहाँ तक कि थक चुके शिरोमणि अकाली दल और निर्दलीयों से भी कम उसे वोट मिले हैं फिर भी भाजपा ज़िंदाबाद के नारे लगाने में वह पीछे नहीं । हाँ यह अलग बात रही कि 2021 में हुए इन चुनावों उसे 49 वार्डों में जीत मिली थी तो इस बार 170 वार्डों में पर कुल मिलाकर तो वह इन चुनावों पाँचवें स्थान पर ही रही। और बाज़ी फिर आप पार्टी के हाथ में ही रही और उसके पीछे रही कांग्रेस । अब भला फिर भी वह अगर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में यहाँ सत्ता में आने का दम भर रही है तो कहा भी क्या जा सकता है। सिर्फ़ यही कि मोदी है तो मुमकिन है। या फिर यूँ कहिए कि खेला होवै तो मोदी आवै। वरना लोग तो आप पार्टी या फिर कांग्रेस की वापिसी होते बताए जा रहे। यूँ पंजाब में कुछ समय पहले ही प्रदेश का मुखिया बदला गया है। तो साथ ही पाँच साल बाद हुए इन निकाय चुनाव में उसे पारंपरिक हिंदू वोट के साथ ही शहरी वोट भी मिला है और सीटें भी बढ़ी हैं ऐसे में अगर भाजपा यह सोच रही हो कि पंजाब के लोगों से उसे अगले चुनावों के लिए संजीवनी मिल गई तो फिर बात ही दूसरी है। ऐसे में भी अगर भाजपा विरोधी हल्ला मचा रहे हों कि राष्ट्रीय पार्टी भाजपा के तक़रीबन 1142 उम्मीदवारों की ज़मानत ही ज़ब्त हो गई पर अगर भाजपा की निगाहें 49 से बढ़कर करीब 170 सीटों की जीत पर है तो फिर यही कहिए कि जैसी नज़र वैसा नजारा और इंतज़ार रखिए विधानसभा चुनावों का।

अच्छे दिन के इंतज़ार में पूर्व अध्यक्ष 
दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष पद से हटाए गए बीरेन्द्र सचदेवा के कामों का मूल्यांकन तो नए अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा करेंगे ही पर सचदेवा के चहेतों को तो इस बात का इंतज़ार भी है कि सचदेवा को पार्टी बाकी अध्यक्षों की तरह इनाम देती है या फिर पूर्व अध्यक्ष आदेश गुप्ता की तरह फट्टे लगा देती है। यह बात अलग है कि सचदेवा ने आकाओं के दम पर क़रीब साढ़े तीन साल अध्यक्ष के तौर काम किया पर यह बात भी कम दीगर नहीं कि भाजपाई उनकी चिकनी -चुपड़ी और स्वार्थ लोलुप राजनीति की भी चर्चा करने में अब चूक नहीं रहे। कह रहे हैं कि कैसे सचदेवा ने अपनों को मौक़ा दिया तो ग़ैरों को निपटा दिया। हाँ आदेश की तरह वे कई मामलों अपनी पहचान नहीं पाए । आदेश पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और जाँच भी हुई लेकिन भाजपाई भट्टी से निकल कर और नेताओं की तरह ही पाक साफ़ बताए जाने लगे हैं। और तभी आदेश उन पूर्व अध्यक्षों में गिने जा रहे हैं जिन्हें अध्यक्ष रहने के बाद कोई इनाम नहीं मिल सका। वरना तो विजय गोयल गंधी स्मारक की ज़िम्मेदारी सँभाले हुए हैं। मनोज तिवारी लगातार सांसद बने हुए है, तो विजेन्द्र गुप्ता विधानसभा अध्यक्ष,सतीश उपाध्याय की पार्टी में जुगाड़ है सो वे पहले एनडीएमसी में उपाध्यक्ष रहने के बाद अब दिल्ली जलबोर्ड के उपाध्यक्ष बना दिए गए। पर फिर वही कि आदेश के फ़िट होने का कोई आदेश पार्टी की तरफ़ से अभी तक नहीं आया है। तभी अब सचदेवा के अच्छे दिन आने का उनके सिपहसलारों को इंतज़ार है।

बैलट से चुनाव तो भाजपा गई निपट
पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब जीतने का दम भर रही भाजपा के मंसूबे क्या पूरे हो पाएँगे। अगले साल कई राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के बीच आम लोगों के बीच आजकल यह भी चर्चा है। कम से कम पंजाब में हाल ही में हुए निकाय चुनावों के बाद से। निकाय चुनावों के इन नतीजों ने भाजपा के वे दावे भी खोखले साबित कर दिए जिनमें भाजपा कह बैठीं थी कि सूबे के शहरी इलाक़ों में हम बहुत मज़बूत है,हमने बंगाल जीत कर दिखाया और अब पंजाब की बारी है। इन चुनावों भाजपा को निर्दलीयों से भी कमतर वोट मिले हैं और पाँचवें स्थान पर आई है। और तभी अब यह सवाल भी उठ रहे हैं कि सूबे में भाजपा का मुक़ाबला सत्ता में बैठी आप पार्टी से था या फिर इवीएम बनाम बैलट पेपर से चुनाव का था। पर जिस तरह भाजपा के तकरीबन 1142 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हुई और वह पाँचवें स्थान पर जा पहुँची है उससे पंजाब में संदेश तो ज़रूर गया होगा कि पंजाब के इन चुनावों में भाजपा का चुनावी जादू क़तई नहीं चला। अब भला यह कहा जाने लगे कि चुनाव बैलेट पेपर से हुआ तो भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो गया या फिर यह कि भाजपा बैलट से चुनाव का विरोध कर रही थी तो नई बात तो रही नहीं है। हद तो तब हो गई कि जब मुख्यमंत्री भगवंत मान ही कहने लगें कि चुनाव में ईडी पार्टी की हार हुई है। अब भला सूबे के विधानसभा चुनावों में भाजपा क्या कर पाती है यह अलग बात है पर फिलाहल तो पंजाब के लोगों ने आप को जिताकर यह जता ही दिया है कि भाजपा बहुत पीछे रह गई। और तभी एक नया नरेटिव यह भी बनने लगा है कि आख़िर भाजपा और ईवीएम के बीच क्या नरेटिव है।

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