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कॉकरोच: एक शब्द का बल

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने दिया था। उन के शब्दों ने हिटलर के सामने पस्त हो रहे इंग्लैंड को बल दिया। इस हद तक कि कई यूरोपीय देशों को टिके रह कर लड़ने का हौसला मिला।…. चर्चिल ने अंग्रेजी भाषा को बुलाया और उसे युद्धभूमि में उतार दिया।” आज कम लोग याद करते हैं कि चर्चिल को 1953 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला था — इतिहास और साहित्यिक लेखन, तथा उदात्त मानवीय मूल्यों की रक्षा में अद्भुत वक्तृता के लिए। कला के किसी अन्य माध्यम में इतने शक्ति-संचय और प्रभाव की संभावना नहीं है।

देखें तो एक शब्द — ‘कॉकरोच’ — ने निवर्तमान शिक्षा मंत्री के पद की बलि ले ली। चाहे इस से उन का संबंध नहीं था। पर सामाजिक क्षेत्र में प्रयोग होकर वह शब्द तीखा बन गया था। उस का जन्म हिकारत और घमंड की भावना से हुआ था। इसलिए ‘पार्टी’ रूप में शरीर पाकर एक कोरे शब्द ने शक्ति रूप धारण कर लिया। वह बलि माँगने लगा, और परिस्थितिवश उस के सामने शिक्षा मंत्री पड़ गये!

फिर उस ने कुछ ही दिनों में उन्हें अपदस्थ कर डाला। उस सरकार को हिला दिया जिसे बारह साल से कोई दल या नेता झुकाने में विफल रहा था। पर चार दिन पहले बनी कॉकरोच जनता पार्टी, जो कहीं औपचारिक दर्ज भी नहीं, ने सीधी झड़प में उसे झुकाया। यदि ‘कॉकरोच’ शब्द उस सामाजिक अर्थ में उच्चरित होकर अवतरित न हुआ होता, तो क्या भारतीय राजनीति में वह होता जो गत सप्ताह हुआ?

कॉकरोच पार्टी बनाने से पहले अभिजीत दीपके एक साधारण छात्र था। वह वही बना रहता, यदि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने 15 मई 2026 को इस शब्द का वैसा प्रयोग न किया होता। जिस का समाचार हजारों मील दूर दीपके ने सुनकर अपना क्षोभ व्यक्त करने के लिए उस नाम से एक व्यंग्यात्मक पार्टी बनाई। महज शाब्दिक!

जैसे कॉकरोच नाम भर था, वैसे ही कॉकरोच पार्टी भी। एक एक्स (ट्विटर) मंच, जहाँ उस ने वैसे ‘कॉकरोचों’ को इकट्ठा होने की अपील की। ऐसी गतिविधि सोशल मीडिया पर हजारों लोग करते रहते हैं। दुनिया भर में बड़े-बड़े सितारे, नेता, लेखक, पत्रकार ट्विटर पर कुछ न कुछ लिखते बोलते हैं और उन के लाखों फॉलोअर उसे लाइक करते हैं। उस से कुछ नहीं होता।

पर इस सामाजिक शब्द, ‘कॉकरोच’, का जिस रूप में जन्म हुआ उस में तीखा अर्थ भरा हुआ था। चीफ जस्टिस ने 15 मई को अपनी अदालत में किंचित वितृष्णा से कहा, “कुछ युवक कॉकरोच की तरह होते हैं, जिन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता और किसी भी पेशे में उनके लिए कोई स्थान नहीं होता। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं, और फिर वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।” उन की बात में सत्य का अंश था। कुछ लोग किसी बड़े व्यक्ति या संस्था को निशाना बनाकर सफल होने की तिकड़म करते ही रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर करना इस का एक साधन रहा है।

परन्तु जिस तरह चीफ जस्टिस ने हल्के से वैसे लोगों को ‘बेरोजगार युवक’ कह दिया, वह बात एक तिक्त युवा समूह पर जाकर बैठ गई। यानी, उन भरे बैठे बेरोजगार युवकों पर जो कई तरह से योग्य होते हुए भी शासकों के भ्रष्टाचार, जातिवाद, आरक्षण, दलबंदी, स्थान की कमी, कुशिक्षा, आदि कारणों से बेकारी, और फलत: उपेक्षा व कष्ट झेलते हैं।

सो चीफ जस्टिस के उस शब्द की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया हुई। दूसरे दिन,16 मई को, दीपके ने उस शब्द से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से एक ट्विटर हैंडल बनाया। एक ही दिन में उस के उनतीस हजार फॉलोअर बन गये। चार दिन में उन की संख्या दो लाख हो गई। पाँचवें दिन सत्ताधारियों के दबाव से ट्विटर ने भारत में उस हैंडल को हटा दिया। छठे दिन, 22 मई को दीपके ने ‘कॉकरोच इज बैक’ नाम से नया हैंडल बनाकर ‘कॉकरोचों’ द्वारा शिक्षा मंत्री का इस्तीफा माँगने का अभियान आरंभ किया, क्योंकि कई परीक्षाओं के पर्चे लीक होने से देश भर के छात्रों को बार-बार परेशानी हो रही थी।

इस अनायास आह्वान ने देश के युवाओं के क्षोभ को एक रास्ता और स्वर दे दिया। जो सत्ताधारियों की लापरवाही और गैर-जबावदेही से दुःखी थे। उस दुःख को ‘कॉकरोच’ बिल्ले के क्षोभ ने एक नैतिक धार दे दी। एक तो, उन्हें देश के सत्ताधारी वितृष्णा से देखते हैं — आखिर न्यायाधीश सरकार का तीसरा अंग हैं। दूसरे, पर्चे लीक एवं शैक्षिक तंत्र की लापरवाहियों के लिए कोई जिम्मेदार नहीं! प्रधानमंत्री आए-दिन कुछ कुछ बोलते रहते हैं, पर लाखों छात्रों के साथ हो रहे अन्याय पर चुप बने रहे हैं।

फलत: यह दोहरा आक्रोश जुड़ कर दीपके द्वारा 22 मई को एक ठोस माँग में परिणत हुआ। फिर उस ने 6 जून को जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए धरना शुरू किया। उस में जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी आ जुड़े। फिर उन के समर्थन में बड़े लोग बयान देने‌ लगे। इस प्रकार, शिक्षा तंत्र में लापरवाही की जिम्मेदारी के लिए मंत्री के इस्तीफे की माँग एक भौतिक शक्ति बन गई। उस ने अन्य शक्तियों को भी आकर्षित किया।

इस तरह, 15 मई को ‘कॉकरोच’ शब्द के जन्म लेने, अगले दिन उस की प्रतिक्रिया में ट्विटर पर ‘कॉकरोच पार्टी’ बनने, वहीं 22 मई को ‘कॉकरोच’ द्वारा शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग का आरंभ, फिर 6 जून से जंतर-मंतर धरना, और अंततः 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री का इस्तीफा — यह सब मूलतः उस एक शब्द के उच्चारण से बनी गति है।

चीफ जस्टिस का कहा एक शब्द अनजाने पूरी सरकार पर भारी पड़ गया। यदि वह शब्द उस रूप में उच्चरित और अवतरित न हुआ होता, तो गत दो महीने की घटनाएं शायद ही घटी होती। यह संयोग भी था। परन्तु एक शब्द की शक्ति भी, जो कभी-कभी कैसा रूप दिखा सकती है!

इस से पहले भारतीय राजनीति में एक शब्द का प्रभाव छब्बीस वर्ष पहले देखा गया था। जब भाजपा के उभरते नेता गोविंदाचार्य ने 1997 में अपने सर्वोच्च नेता वाजपेई के लिए ‘मुखौटा’ शब्द का प्रयोग किया था। यद्यपि उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था। पर स्वयं भाजपा के बड़ों द्वारा उसे सत्य मानने से बात जमी रह गई। तब के हालात में वह शब्द सही लगता भी था। पर जल्द ही गोविंदाचार्य को भुगतना पड़ा। उन का राजनीतिक कैरियर ही खत्म हो गया। पहले उन्हें किनारे किया गया। फिर पार्टी में उन की कोई जगह न बन सकी। वरना, वे एक स्टार नेता थे। उन का व्यक्तित्व, वक्तृता, जाति, पार्टी, आयु, सब कुछ संभावनाओं से भरा था। पर उस एक शब्द प्रयोग ने उन को ग्रहण लगा दिया।

सो, कभी-कभी एक शब्द भी गजब ढाता है! यह भाषा की रहस्यमय शक्ति है। यद्यपि वह अपने आप में दुर्बल है। जो चाहे इस का दुरुपयोग कर लेता है! इसीलिए कवि अज्ञेय ने भाषा को ‘सभी कला माध्यमों में सबसे कमजोर’ बताया था। जिसे आसानी से तोड़ा-मरोड़ा, भ्रष्ट किया जा सकता है! किसी साधारण या घटिया वस्तु, पर्चा, भाषण, नेता, आदि – को भी ‘सर्वोत्तम’, ‘शानदार’, ‘महान’, ‘ऋषि’, आदि कह कर धड़ल्ले से परोसा जाता है। सत्ता, धन, संगठन, प्रचार, आदि बल से लफ्फाजी रूप में भाषा का दुरुपयोग होता है। तब वह लोगों को दुष्प्रभावित कर सकती है।

वैसी स्थिति में, ठगे जाते लोगों का तो क्या, भाषा अपना भी बचाव नहीं कर पाती! इस रूप में, संगीत, चित्र, आदि कला-माध्यमों की तुलना में भाषा कमजोर है। इस का सर्वाधिक दुरुपयोग होता है। दूसरे कला माध्यमों का इतना दुरुपयोग नहीं हो सकता। फिर भी, यही भाषा कभी-कभी अपने प्रयोग करने‌ वाले को भारी चकमा भी देती है। इसलिए साहित्य ही नहीं, राजनीति में भी भाषा के प्रयोग के प्रति सावधानी रखना आवश्यक है।

अपने सर्वोत्तम उदात्त रूप में भाषा लोगों को सहारा भी देती है।‌ इस का उदाहरण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने दिया था। उन के शब्दों ने हिटलर के सामने पस्त हो रहे इंग्लैंड को बल दिया। इस हद तक कि कई यूरोपीय देशों को टिके रह कर लड़ने का हौसला मिला।

चर्चिल की इस ऐतिहासिक भूमिका को बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने कवित्वमय रूप में रखा था: “उन के शब्दों की प्रज्वलित शक्ति ने अपने देशवासियों के साहस को आलोकित किया। चर्चिल ने अंग्रेजी भाषा को बुलाया और उसे युद्धभूमि में उतार दिया।” आज कम लोग याद करते हैं कि चर्चिल को 1953 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला था — इतिहास और साहित्यिक लेखन, तथा उदात्त मानवीय मूल्यों की रक्षा में अद्भुत वक्तृता के लिए।

अर्थात्, वही भाषा किसी सच्चे लेखक अथवा सामाजिक के हाथों विशिष्ट शक्ति हासिल कर लेती है। तब उस का लेखन समानांतर सरकार जैसी सत्ता बन जाता है। बड़ी-बड़ी तानाशाही उस से डरती है। वैसे लेखक को प्रतिबंधित करती, देश-निकाला देती है। जैसे सोल्झेनित्सिन, या अभी तसलीमा नसरीन। कला के किसी अन्य माध्यम में इतने शक्ति-संचय और प्रभाव की संभावना नहीं है। यह शब्द और भाषा की दोहरी स्थिति है। एक ओर सब से दुर्बल, दूसरी ओर बड़ी प्रभावशाली। हाल के भारतीय घटनाक्रम ने यह भी दिखाया है।

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