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गृह मंत्रालय के अंतर्विरोधी आदेश, एवं कानून

यदि वह आदेश और यह बिल पढ़ें, तो हैरत होगी! मानो शासन को अपने ही आदेश और कानून का अंतर्विरोध समझने की बुद्धि नहीं है। अथवा कहना होगा कि उन्हें न तो राष्ट्रगान, न ही राष्ट्रगीत के सम्मान की परवाह है। बल्कि, किसी बहाने बस विपक्षी नेताओं को नीचा दिखाने की चाह रही है। सोचें — किसलिए कैसी यह कवायद हुईई? जिस से वन्दे मातरम् को कुफ्रकहने वालों पर तो कोई असर नहीं पड़ा। उलटे जाने-अनजाने राष्ट्र गानकी अवमानना हुई है।

गत 30 जुलाई को वन्दे मातरम् बिल संसद से पास हो गया। इस में पहले से बने राष्ट्रीय सम्मान कानून, 1971 (2005) के अनुच्छेद 3 में केवल एक शब्द ‘राष्ट्र-गीत’ जोड़ दिया गया है। बस। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह बिल कानून बन जाएगा। तदनुसार राष्ट्र-गान अथवा राष्ट्र-गीत के गायन में बाधा डालने वाले को दंड मिलेगा।

संसद में यह बिल गृह मंत्री ने पेश किया था। पर छः महीने पहले उन के मंत्रालय ने तमाम संस्थाओं को ‘तत्काल’ रूप में ‘भारत के राष्ट्र गीत के संबंध में आदेश’ (फाइल नं. 14/2/2025-Public, 28 जनवरी 2026) जारी किया था। देश के सभी विद्यालयों तथा एजेंसियों को इस का ‘कड़ाई से पालन करने’ कहा गया था।

यदि वह आदेश और यह बिल पढ़ें, तो हैरत होगी! मानो शासन को अपने ही आदेश और कानून का अंतर्विरोध समझने की बुद्धि नहीं है। अथवा कहना होगा कि उन्हें न तो राष्ट्रगान, न ही राष्ट्रगीत के सम्मान की परवाह है। बल्कि, किसी बहाने बस विपक्षी नेताओं को नीचा दिखाने की चाह रही है। यह संदेह इसलिए, क्योंकि गत एक वर्ष से अनेक सत्ताधारी नेता ‘वन्दे मातरम्’ के नाम पर मानो केवल कांग्रेस की निन्दा का अभियान-सा चलाते रहे हैं। जबकि किसी कांग्रेसी ने कुछ कहा भी नहीं था। तब वन्दे मातरम् का सम्मान केवल बहाना हो जाता है…।

इसीलिए संसद में बिना किसी बहस के वन्दे मातरम् बिल पास होने से कुछ नेताओं को निराशा हुई होगी। उन का असल उद्देश्य ही धरा रह गया! वे चाहते थे कि विपक्ष कुछ बोलता,और वे अपना नेहरू निन्दा का कीचड़ पनाला बहा देते! पर‌ विपक्ष अनुपस्थित रहा। बिल बिना चर्चा पास हो गया। वह होना ही था। कौन भारतवासी राष्ट्र-गीत को सम्मान नहीं देना चाहता!

यहाँ दु:खद बात — और राजनीतिक विडंबना भी — यह है कि जो नेता वर्ग गत सौ सालों से खुले आम ‘वन्दे मातरम्’ का विरोध करता रहा है, उस के खिलाफ फतवे भी जारी करता है — (जिस कारण भी वन्दे मातरम् ही राष्ट्र गान न बन सका था, क्योंकि हर अवसर पर वे नेता इसे गाने से इन्कार करते या विरोध करते थे) — उन नेताओं, दलों, उन के फतवेदारों से हमारे बलवान नेताओं को कुछ नहीं कहना है!

यानी, वन्दे मातरम् गीत को ‘कुफ्र’ कहकर घृणा करने वालों की आलोचना करते, या उन्हें समझाते-बुझाते, किसी सत्ताधारी महानुभाव को नहीं देखा गया। पर जो कांग्रेस इन सत्ताधारियों के जन्म से भी पहले से अपने अधिवेशनों, सम्मेलनों में इसे गाती रही थी, उसी की फजीहत करने को सत्ताधारी उत्साहित रहते हैं!

ऐसे बलवानों की मानसिकता श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ वाले सिपाहियों जैसी है। जो वहाँ जाने के लिए बंदूक ले लेते थे ‘जहाँ मुठभेड़ नहीं होनी थी’। उसी तरह, जो खुल कर वन्दे मातरम् के विरुद्ध हैं — उसे कुछ नहीं बोलना। पर जो इस का आदर करते हैं, उन्हीं के गले पर चढ़कर कहना कि ‘तेरे पुरखे को वन्दे मातरम् नापसंद था;  चल तुझे मजा चखाता हूँ!’ यदि यह बचकानी चाह नहीं, तो सोचें — किसलिए साल भर से यह कवायद की गई? जिस से वन्दे मातरम् को ‘कुफ्र’ कहने वालों पर तो कोई असर नहीं पड़ा। उलटे जाने-अनजाने ‘राष्ट्र गान’ की अवमानना हुई है।

जी हाँ, गृह मंत्रालय का 28 जनवरी 2026 वाला उक्त आदेश पढ़ कर देखिए। उस में झलकता है मानो ‘राष्ट्र गान’ को भी कुछ सम्मान देना लाचारी है। वरना उस पाँच पन्ने के विस्तृत आदेश में, शीर्षक समेत, केवल ‘राष्ट्र गीत’ लिखा हुआ है।

यह भी उन की विचित्र बुद्धि का ही संकेत है कि यह पंक्तियाँ लिखे जाने तक भी, जब तक वन्दे मातरम् बिल औपचारिक रूप से कानून नहीं बना है, गृह मंत्रालय का 28 जनवरी वाला आदेश देश के ‘राष्ट्रीय सम्मान कानून, 1971 (2005)’ के शब्द और भावना दोनों के विरुद्ध पड़ता है।

वस्तुत: इस बिल के कानून बन जाने के बाद भी, 28 जनवरी वाला आदेश इस नये कानून के प्रति विसंगत ही रहेगा। क्योंकि उस में केवल राष्ट्र गीत के सम्मान का विस्तृत निर्देश है। उस का शीर्षक भी यही है। उस आदेश में 30 बार ‘राष्ट्र गीत’ का उल्लेख है, जबकि ‘राष्ट्र गान’ का 2 बार। वह भी पुछल्ले सा, मानो लाचारी में कि उस की एकदम उपेक्षा तो कैसे करें! परन्तु भाव वही है।

यह उस आदेश के अनुच्छेद IV (2) से बिलकुल स्पष्ट है, जिस के अनुसार, “जहाँ  राष्ट्र गीत और राष्ट्र गान गाया जाता है, वहाँ पहले राष्ट्र गीत गाया जाएगा।” यह निश्चित रूप से राष्ट्रीय सम्मान कानून, 1971 (2005) के विरुद्ध पड़ता है, जिस में लिखा है कि राष्ट्र गान के गायन में बाधा डालना दंडनीय है। तब किसी भी चीज से उसे विस्थापित कर देना, उस के गायन में बाधा डालना — बल्कि हटा देना ही है! आखिर कानून में केवल ‘राष्ट्र गान’ का उल्लेख है, जिस के गायन में बाधा डालना अपराध है। तब राष्ट्र गीत द्वारा भी उसे हटाना या पीछे करना वही बात है।

बल्कि, अभी संशोधित राष्ट्रीय सम्मान कानून में भी राष्ट्र गान पहले है, राष्ट्र गीत बाद में। अतः गृह मंत्रालय का 28 जनवरी वाला आदेश अभी भी उस से विसंगत पड़ता है। इस आदेशानुसार राष्ट्र गान *बाद में* गाना है, यदि गाना भी हो तो। जबकि नये संशोधित कानून में भी राष्ट्र गान पहले है। यह अंतर्विरोध क्या दिखाता है?

यदि अब भी संदेह हो, तो उक्त आदेश का अनुच्छेद III (5) भी देख लीजिए। इस के अनुसार “सभी विद्यालयों में दिन भर के कार्य का आरंभ राष्ट्र गीत से हो।” यह आदेश दिए जाते समय भी ‘राष्ट्रीय सम्मान कानून’ के विपरीत था, जिस में राष्ट्र गान के गायन में बाधा डालना दंडनीय है। आदेश इस बात पर मौन है कि देश भर के लाखों विद्यालयों में जहाँ सदा से दिन का आरंभ ‘राष्ट्र गान’ से होता रहा है — वहाँ क्या करना है? आदेश स्पष्ट है दिन का आरंभ ‘राष्ट्र गीत’ से करना है। पर ‘राष्ट्र गान’ को लुप्त कर दिया गया है। अतः स्वभाविक है, हर‌ विद्यालय ‘राष्ट्र गीत’ गायगा जिस का हुक्म आया है। वह ‘राष्ट्र गान’ छोड़ देगा। दो-दो गायन की न कोई तुक है, न वैसा आदेश है। सो, व्यवहार में उक्त आदेश राष्ट्र गान की खुली अवमानना करता है। उसे चुपचाप विस्थापित कर देता है!

आखिर, इस पूरी ऊट-पटाँग, अंतर्विरोधी, मतिहीन, बचकानी कसरत की क्या जरूरत थी? वही, प्रतिद्वंद्वी दल को नीचा दिखाने का मंसूबा। यह कल्पना कि वह प्रतिवाद करेगा और हम उसे नीचा दिखाएंगे कि देखो, यह दल  कितना नीच है! जबकि हम सच्चे देशभक्त हैं जो राष्ट्र गीत के सम्मान का कानून बना रहे हैं!

बरसों से सारी शक्ति अपने हाथ में लिए नेताओं की ऐसी छोटी वृत्ति दु:खद हैं। वे देश के लिए मिल कर काम करने के बदले अन्य दलों को नीचा दिखाने, इस प्रकार राष्ट्रीय भावना को कमजोर करने और दलीय घमंड मजबूत करने में लगे हुए हैं। जबकि इन वर्षों में वे कितना कुछ रचनात्मक कर सकते थे!

इस मामले में वे यह भी न देख सके कि दलीय होशियारी दिखाने में वे राष्ट्र गान का अपमान कर गये! जो अशोभनीय होने के साथ-साथ दंडनीय भी था और है। अभी 30 जुलाई को उन के द्वारा संशोधित कर देने के बावजूद राष्ट्रीय सम्मान कानून में ‘राष्ट्र गान’ प्रथम महत्व क्रम में है। जबकि उन का 28 जनवरी 2026 वाला आदेश ‘राष्ट्र गीत’ को प्रथम, बल्कि एक मात्र जैसा रखता है। जिस का शीर्षक ही है:  ‘भारत के राष्ट्र गीत के संबंध में आदेश’। वह भी ‘तत्काल’ और ‘कड़ाई से पालन’ हेतु। निस्संदेह यह राष्ट्रीय सम्मान कानून की स्थिति के विरुद्ध था। वह अभी संशोधित हुए बिल से भी असंगत है।

यह सब देश-भक्ति नहीं दल-भक्ति है।‌ चाहे कितनी भी अच्छी नीयत से हो रहा हो, परन्तु यह समाज, शिक्षा और संस्कृति की हानि करना है। चाहे सत्तासीन लोग कुछ भी समझें।

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