सुधार किसी एक प्रदर्शन की जीत-हार से नहीं निकलेगा। बल प्रयोग की हर घटना की वीडियो, समय और आदेश-श्रृंखला सार्वजनिक होनी चाहिए। निषेधाज्ञा लिखित हो और बाद में आनुपातिकता की स्वतंत्र जाँच हो। चिह्नित स्थलों पर पूर्व सूचना और यातायात व्यवस्था को अनुमति के पूर्ण निषेध से अलग रखा जाए। प्रदर्शनकारियों के लिए भी सीमा साफ है।
लोकतंत्र केवल मतपेटी में बंद मतों का नाम नहीं है। वह उस सांस का भी नाम है, जिसमें नागरिक अपनी नाराजगी शांतिपूर्वक सड़क पर रख सके। भारत के संविधान ने यह सांस अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) में दी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बिना हथियार के शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार और सीमा भी उसी अनुच्छेद में है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) संप्रभुता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देते हैं। यहीं से पुलिस का कठिन कर्तव्य शुरू होता है। उसे न विरोध को कुचलना है, न अव्यवस्था को खुली छूट देनी है।
यह द्वंद्व किसी एक आंदोलन की संपत्ति नहीं है। परीक्षा-पत्र लीक से निकले युवा मार्च हों, किसान कानूनों के खिलाफ घेराव हो, नागरिकता कानून पर धरना हो, या चुनावी सूची और निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर उठे सवाल हों। हर बार सवाल एक ही लौटता है। राज्य विरोध को सुविधा दे रहा है, या केवल उसे नियंत्रित करने के नाम पर संकुचित कर रहा है। अक्टूबर 2026 का दिल्ली दृश्य इसी प्रश्न की ताजा तस्वीर है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर विपक्षी गठबंधन के सांसद जंतर-मंतर की ओर बढ़े, तो लुटियंस दिल्ली बैरिकेड, आरएएफ और केंद्रीय बलों की छावनी बन गई। बसें रोक दी गईं, रास्ते सील कर दिए गए। उसी बीच, पेपर लीक मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन की औपचारिक सूचना संसद मार्ग थाने में दी। पिछली बार के धरने से सबक लेते हुए इस बार दिल्ली पुलिस ने अनुमति नामंजूर कर दी।
तर्क यह था कि निर्धारित स्थल पर भी बैठक या धरने के लिए आवेदन कम से कम दस दिन पहले देना होता है, और भीड़ के आकार के अनुसार स्थल जंतर-मंतर, रामलीला मैदान या बुराड़ी तय होते हैं। आयोजकों का जवाब सीधा था। जंतर-मंतर ऐतिहासिक और चिह्नित विरोध-स्थल है। पुलिस का काम सुरक्षा, व्यवस्था और यातायात है, अनुमति देकर नागरिक के अधिकार का फैसला करना नहीं।
कानून इस बहस में खाली नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की वे धाराएँ, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 से 132 थीं, कार्यपालक मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी को गैरकानूनी जमाव को तितर-बितर करने का आदेश देती हैं। बल तभी है जब आदेश न माना जाए, और तब भी जितना कम बल और जितनी कम क्षति हो, उतना ही। धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लगाई जा सकती है, पर सर्वोच्च न्यायालय अनुराधा भसीन मामले में कह चुका है कि ऐसा आदेश वास्तविक आपात पर टिका हो, तथ्यों को दर्ज करे और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरे।
हिम्मत लाल शाह (1973) में सार्वजनिक सड़कों पर बैठकों का पूर्ण निषेध नकारा गया। रामलीला मैदान (2012) में प्रक्रियात्मक सुरक्षा को औपचारिकता नहीं माना गया। अमित साहनी, यानी शाहीन बाग (2020), में शांतिपूर्ण विरोध को माना गया, पर सार्वजनिक मार्ग के अनिश्चितकालीन कब्जे को नहीं। मार्च 2025 में न्यायालय ने कहा कि पुलिस अनुच्छेद 12 के अर्थ में राज्य का अंग है, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा उसका संवैधानिक दायित्व है। जुलाई 2026 में, नीट व अन्य पेपर लीक पर ‘चलो संसद’ मार्च के बाद, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने मौखिक रूप से रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण विरोध गारंटीकृत है और केवल आंदोलन होने से लाठीचार्ज जायज नहीं हो जाता।
जुलाई का वह मार्च याद दिलाने लायक है, क्योंकि वहाँ बल की सीमा ही विवाद बनी। पुलिस का पक्ष था कि मार्च मना था, भीड़ ने बैरिकेड तोड़े और पथराव किया, बल अंतिम उपाय था और इस प्रदर्शन में सौ से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों, अस्पताल रिकॉर्ड और बाद की रिपोर्टों ने लाठी, आँसू गैस और पेलेट गन के इस्तेमाल की बात कही। न्यायालय ने नाबालिगों की रिहाई के आदेश दिए और स्वतंत्र जाँच का पैनल बनाया। वहीं दिल्ली पुलिस ने अपने आचरण को कानूनी और पेशेवर बताया। दोनों बयान अब भी अधूरे हैं। यही अधूरापन हर बड़े प्रदर्शन के बाद दोहराया जाता है।
इसी ढाँचे में वर्दी की नैतिक स्थिति समझी जा सकती है। धरने प्रदर्शन का सामना कर रहा पुलिस का सिपाही अक्सर उसी वर्ग से आता है जिससे प्रदर्शनकारी। वह परीक्षा की अनियमितता, बेरोजगारी, फसल के दाम या मतदाता सूची के संदेह को व्यक्तिगत रूप से समझ सकता है। पर उसके साथ ही वह वर्दी में वह राजनीतिक कार्यपालिका के आदेश का सेवक है। संविधान की सातवीं अनुसूची में पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं। दिल्ली में यह नियंत्रण केन्द्र के गृह मंत्रालय से जुड़ा है। स्थानांतरण, पदोन्नति और विभागीय जाँच उसी सत्ता के हाथ में हैं, जिसकी नीतियों के खिलाफ भीड़ खड़ी होती है।
परिणाम यह होता है कि ‘न्यूनतम बल’ का सिद्धांत असल में मौके पर ‘आदेश का पालन’ में सिकुड़ जाता है। यह भी सच है कि जब भीड़ पथराव करती है, वाहन क्षतिग्रस्त करती है या सुरक्षाकर्मियों पर हमला होता है, तब संयम बरतने वाले अधिकारी को बाद में ढिलाई का आरोप झेलना पड़ता है। पुलिस न पूरी तरह दमन का औजार है, न भीड़ का स्वयंसेवक। वह बीच की संस्था है। उसकी निष्पक्षता तभी बचती है जब राजनीतिक आका ऐसा कोई आदेश दें, पर कानून सीमा बाँधे।
इसलिए सुधार किसी एक प्रदर्शन की जीत-हार से नहीं निकलेगा। बल प्रयोग की हर घटना की वीडियो, समय और आदेश-श्रृंखला सार्वजनिक होनी चाहिए। निषेधाज्ञा लिखित हो और बाद में आनुपातिकता की स्वतंत्र जाँच हो। चिह्नित स्थलों पर पूर्व सूचना और यातायात व्यवस्था को अनुमति के पूर्ण निषेध से अलग रखा जाए। प्रदर्शनकारियों के लिए भी सीमा साफ है। बिना हथियार, बिना मार्ग के अनंत कब्जे, और बिना हिंसा के। लोकतंत्र में पुलिस संविधान का अभिकर्ता है। जब वह राजनीतिक इच्छा और नागरिक के नैतिक दावे के बीच कानून को चुनती है, तभी विरोध सड़क की गरमी बना रहता है, राजधानी का घेरा नहीं।
