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बंगाल में सबके लिए समान कानून

जिन समाजों में बहुविवाह की प्रथा है वहां आबादी बढ़ने का अनुपात बाकी समाजों के मुकाबले ज्यादा है, जिससे समाज में एक किस्म का असंतुलन बनता है। इस कानून के जरिए उसे भी दूर किया जा सकेगा। इसलिए पश्चिम बंगाल में समान कानून के स्वागत की तैयारी होनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल की सुवेंदु सरकार अपना एक और वादा पूरा करने जा रही है। राज्य में अब सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू होगा। भाजपा ने इस साल के विधानसभा चुनाव में यह वादा किया था कि उसकी सरकार बनेगी तो वह समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करेगी।  नौ मई को शपथ लेने के बाद से ही मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी पार्टी की ओर से किए गए तमाम वादों को एक एक करके लागू कर रहे हैं। पहली बार बंगाल के लोगों को यह लग रहा है कि चुनाव में किए गए वादे सिर्फ वोट लेने के लिए नहीं होते हैं, बल्कि उन पर अमल भी किया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा और लोक सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण निर्णय पिछले डेढ़ महीने में किए जा चुके हैं।

सीमा पर बाड़ेबंदी और घुसपैठियों को पहचान कर बाहर निकालने का अभियान शुरू हो गया है। ऐसे ही शिक्षण संस्थानों में वंदे मातरम अनिवार्य कर दिया गया है। हालांकि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि अनेक शिक्षण संस्थानों में वंदे मातरम गाते समय लोगों के होंठ नहीं हिलते हैं। उन्होंने इसे भी ठीक करने का वादा किया है। ऐसा लग रहा है कि अगला लक्ष्य शिक्षण संस्थानों खास कर मदरसों को नियंत्रित करने, उन्हें डिजिटल बनाने और विज्ञान व तकनीक की शिक्षा से जोड़ने का हो सकता है।

बहरहाल, सुवेंदु अधिकारी की सरकार अब सभी नागरिकों के लिए समान कानून का विधेयक विधानसभा में पेश करने जा रही है, जिसके सदन से पारित में होने कोई अड़चन नहीं है। भाजपा के पास अपने 202 विधायक हैं और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के करीब 60 विधायक भी सरकार का समर्थन कर सकते हैं। इस विधेयक के साथ ही सरकार लोक सुरक्षा का भी एक कानून पेश करेगी। सुवेंदु सरकार इसे वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026 के नाम से पेश कर रही है।

यह जो लोक सुरक्षा का विधेयक है इसके प्रावधान बेहद सख्त हैं। इसमें पुलिस को यह अधिकार दिया जा रहा है कि वह किसी भी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को एक साल तक ऐहतियातन हिरासत में रख सकती है। इसके अलावा जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को यह अधिकार दिया जा रहा है कि वे किसी असामाजिक व्यक्ति को या किसी आरोपी को राज्य से बाहर निकालने का आदेश जारी कर सकते हैं। यह विधेयक कुछ हद तक गुजरात प्रिवेंशन ऑफ एंटी सोशल एक्टिविटीज एक्ट, 1985 से प्रेरित लग रहा है। इस प्रस्तावित कानून में असामाजिक गतिविधियों में शामिल होने वालों को ‘गुंडा’ के तौर पर परिभाषित किया गया है और कहा गया है कि किसी ग्रुप, गैंग या सिंडिकेट का सदस्य, जो आदतन असामाजिक गतिविधियों को अंजाम देता है, अंजाम देने का प्रयास करता है, उकसाता है और वित्तीय या किसी अन्य प्रकार की सहायता करता है वह ‘गुंडा’ है।

इसमें और भी कई चीजें जुड़ी हैं। लेकिन पहली नजर में यह स्पष्ट दिख रहा है कि पहले वामपंथी और फिर तृणमूल कांग्रेस के पिछले 15 साल के शासन में दादागिरी, भ्रष्टाचार, लूट, तुष्टिकरण और अराजकता की संस्कृति विकसित हुई, जिसमें व्यवस्थित तरीके से जनता का शोषण करने का एक इकोसिस्टम तैयार किया गया। उस इकोसिस्टम को सुवेंदु सरकार समाप्त करना चाहती है। नागरिकों को उस इकोसिस्टम के शोषण से मुक्त कराना चाहती है। हालांकि प्रस्तावित कानून के प्रावधानों को लेकर विपक्ष विरोध करेगा और कुछ प्रावधानों पर विवाद भी होगा। परंतु यह कानून पश्चिम बंगाल की के लिए बेहद जरूरी है और इससे आम जनता को बड़ी राहत मिलेगी।

जहां तक समान कानून की बात है तो इसकी आवश्यकता भारत के संविधान में ही बताई गई है। संविधान के भाग चार में नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में इसका जिक्र किया गया है। संविधान बनाने वाले महान लोगों ने लिखा है कि भारत को सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाने का प्रयास करना चाहिए। जाहिर है कि भारत के नीति नियंता चाहते थे कि देश में एक समान कानून बने। परंतु विविधता के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति के चलते पहले की सरकारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। भाजपा की पहले की सरकारों के पास पूर्ण बहुमत नहीं रहा, जिसकी वजह से पार्टी के एजेंडे में होने के बावजूद इस पर अमल नहीं हो सका। लेकिन केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद ही भाजपा ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया।

आज एक एक करके तीन राज्यों में समान नागरिक कानून लागू हो चुका है और पश्चिम बंगाल चौथा राज्य बनने जा रहा है। उत्तराखंड में सुप्रीम कोर्ट की रिटायर जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कमेटी की सिफारिशों के आधार पर बना समान नागरिक कानून लागू किया। उसके बाद इसे गुजरात और असम ने अपनी अपनी आवश्यकता के हिसाब से थोड़े बहुत बदलाव के साथ इसे लागू किया। अब पश्चिम बंगाल में यह कानून लागू होगा, जिसमें विवाह, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार और लिव इन रिलेशन जैसे तमाम मुद्दों पर एक समान कानून बनेगा। भाजपा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जनजातीय समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा। पहले से जिन तीन राज्यों में यह कानून लागू है वहां भी एसटी समुदाय इस कानून के दायरे से बाहर है।

अनुसूचित जनजातीय समुदायों को छोड़ कर बाकी सभी समुदायों पर समान कानून लागू होगा। वैसे समान कानून को लेकर जिन मुद्दों पर मुख्य रूप से आपत्ति थी उनमें से एक मुद्दा तीन तलाक का था। इसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले ही सुलझा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक बोलने की प्रथा को अवैध करार दिया और केंद्र सरकार ने कानून बना कर इसे आपराधिक बना दिया। यह मुस्लिम समुदाय की करोड़ों महिलाओं के गरिमा बहाल करने और उन्हें आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का बहुत बड़ा फैसला था। इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया। इसके बाद, जो दूसरा विवादित मुद्दा है वह बहुविवाह और बाल विवाह का है।

बहुविवाह मुस्लिम समाज में बहुत प्रचलित है। अभी पिछले दिनों तो एक मुस्लिम सेलिब्रिटी महिला ने इसे व्यवस्थित रूप से अपनाने की वकालत कर दी थी। बहुविवाह की प्रथा भी मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक रूप से असुरक्षित बनाता है और उनकी गरिमा को कम करता है। समान कानून के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई विवाहित व्यक्ति कानूनी रूप से तलाक लिए बगैर दूसरा विवाह नहीं कर सके। ऐसे ही अगर बाल विवाह रूक जाता है तो युवा महिलाओं की पढ़ाई और उनकी बेहतरी सुनिश्चित करना आसान हो जाएगा। उन्हें अपने जीवन का रास्ता चुनने की आजादी मिलेगी।

समान नागरिक कानून में संपत्ति और उत्तराधिकार के नियम भी सभी समुदायों के लिए एक जैसे बनाए जाएंगे। हालांकि इसमें भी उच्च न्यायपालिका के फैसलों के आधार पर कई चीजें पहले से लागू हो रही हैं। जैसे पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर ही बेटियों को अधिकार देने का फैसला हो चुका है। लेकिन सामाजिक स्तर पर अभी इसकी पूरी स्वीकार्यता नहीं बनी है। समान नागरिक कानून लागू होने के बाद सामाजिक जागरुकता भी आएगी और लड़के व लड़कियों के अंदर कम से कम सामाजिक स्तर पर समानता का भाव बनेगा। अभी सिद्धांत रूप में कहा जाता है कि बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं है। लेकिन संपत्ति में समान अधिकार मिलने से यह फर्क मिटाने में आसानी होगी।

ऐसे ही आधुनिकता की होड़ में पिछले कुछ वर्षों से लिव इन रिलेशन का चलन बहुत बढ़ा है। कानून के जरिए इसे विनियमित करना एक जरूरी कदम है। कानून नहीं होने की वजह से लिव इन रिलेशनशिप के दुरुपयोग, महिलाओं के शोषण और यौन अपराध की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही थी। नए कानून के तहत लिव इन रिलेशन को रजिस्टर्ड कराने की व्यवस्था होगी। इससे ऐसे रिश्तों में भी स्त्रियों के अधिकार सुनिश्चित होंगे। कुल मिला कर समान नागरिक कानून सभी नागरिकों को एक तरह के कानून के दायरे में लाने वाला तो है ही लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ आधी आबादी को मिलेगा। उनको बराबरी का अधिकार मिलेगा। उनकी आर्थिक आजादी सुनिश्चित होगी। उनको सामान्य इंसानी गरिमा बहाल होगी। उनकी सामाजिक व पारिवारिक स्थिति में सुधार होगा। महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध में कमी आएगी। इसी तरह बाल विवाह और बहुविवाह पर रोक लगने से आबादी पर नियंत्रण का बहु प्रतीक्षित सुधार भी लागू हो जाएगा। इससे आबादी पर नियंत्रण करना आसान होगा। जिन समाजों में बहुविवाह की प्रथा है वहां आबादी बढ़ने का अनुपात बाकी समाजों के मुकाबले ज्यादा है, जिससे समाज में एक किस्म का असंतुलन बनता है। इस कानून के जरिए उसे भी दूर किया जा सकेगा। इसलिए पश्चिम बंगाल में समान कानून के स्वागत की तैयारी होनी चाहिए। कल सोमवार, 29 जून को इसका विधेयक पेश होगा और सदन से पारित होते ही यह कानून बन जाएगा।    (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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