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यूरोप पर पर्यावरण कुप्रबंधन की मार!

यूरोप की गर्मी चेतावनी है। अगर हम खराब पर्यावरण प्रबंधन और लापरवाही जारी रखेंगे, तो भविष्य में 50 डिग्री तापमान, विनाशकारी बाढ़ और अपरिवर्तनीय क्षति सामान्य हो जाएंगी। समय कम है। 1.5 डिग्री लक्ष्य बचाना संभव है, लेकिन इसके लिए तत्काल, सामूहिक और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है, अब अनदेखी करने का समय नहीं बचा।

आज पूरा विश्व मौसम की मार झेलता हुआ है। पिछले महीने से यूरोप एक अभूतपूर्व गर्मी की लहर (हीटवेव) से जूझ रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन समेत कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। स्पेन और फ्रांस में 45 डिग्री के पार रिकॉर्ड टूटे, जबकि रातें भी असामान्य रूप से गर्म रहीं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (WWA) के अध्ययनों के अनुसार, यह हीटवेव मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के बिना लगभग असंभव होती। 1976 में ऐसी स्थिति कल्पना से परे थी, लेकिन आज यह सामान्य होती जा रही है।

यूरोप, जो पहले ठंडे मौसम के लिए जाना जाता था, अब सबसे तेज गर्म हो रहा महाद्वीप बन गया है। 1980 के दशक से यहां तापमान वैश्विक औसत से दोगुना तेजी से बढ़ रहा है। 2024-2026 के वर्षों में रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, जंगल की आग और बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। जून 2026 की गर्मी में यूरोप में हजारों अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। इस सब का अनुमानित आर्थिक नुकसान अरबों यूरो का है। 1980-2024 के बीच यूरोप में जलवायु से संबंधित घटनाओं से 822 बिलियन यूरो का नुकसान हुआ, जिसमें हाल के वर्षों में तेज वृद्धि देखी गई।

यह सिर्फ यूरोप की समस्या नहीं है। एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में भी मौसम के स्वरूप बदल रहे हैं। पाकिस्तान, भारत, चीन में बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका में तूफान और जंगल की आग सामान्य हो गई हैं। ऑस्ट्रेलिया में लंबे सूखे और भारत में अनियमित मानसून ने कृषि और जल संसाधनों को प्रभावित किया। वैश्विक स्तर पर बेहद खराब मौसम की घटनाएं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। हीटवेव, भारी बारिश, सूखा, तूफान जैसी घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, 1.1-1.4 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक गर्मी ने इन घटनाओं को दसियों गुना अधिक संभावित बना दिया है।

देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन का मूल कारण मानवीय गतिविधियां हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का जलाना बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों में मुख्य जिम्मेदार है। यह कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, जो पृथ्वी की गर्मी को फंसाता है। तेज़ी से हो रही बेतरतीब वनों की कटाई इसका दूसरा बड़ा कारण है। एक अनुमान के तहत हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट होते हैं, जो न सिर्फ CO2 अवशोषित करने की क्षमता कम करते हैं बल्कि संग्रहीत कार्बन भी वायुमंडल में छोड़ते हैं। कृषि, पशुपालन, मिथेन गैस और भूमि उपयोग परिवर्तन कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई जिम्मेदार हैं। एक शोध के अनुसार पिछले तीन वर्षों में भारत सरकार के सलिप्तता से देश भर में एक अनुमान के अनुसार 28 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और ये क्रम अभी जारी है। ये आत्मघाती नीति वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जानलेवा सिद्ध होगी।

पर्यावरण प्रबंधन की कमी इन समस्याओं को और बढ़ाती है। उल्लेखनीय है कि कई विकसित देशों में भी, जहां तकनीक और नीतियां उपलब्ध हैं, क्रियान्वयन कमजोर है वाहन भी ऐसे कुप्रबंधन के कारण पर्यावरण और मौसम पर असर पड़ रहा है। यूरोप में नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ रही है, लेकिन कोयला और गैस पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। विकासशील देशों में वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और सतत विकास की उपेक्षा की जाती है। औद्योगिक प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण, प्लास्टिक और कचरे का गलत निपटान, नदियों का प्रदूषण, ये सभी कारक प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं।

जानकर मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के अन्य कारक भी हैं, जैसे प्राकृतिक चक्र (El Niño), लेकिन वैज्ञानिक सहमति है कि मानवीय कारक मुख्य हैं। 50 वर्षों में गर्मी की घटनाएं सैकड़ों गुना अधिक संभावित हो गई हैं। ग़लत  प्रबंधन का मतलब है कि अनुकूलन और शमन दोनों में कमी। यूरोप जैसे महाद्वीप में भी एयर कंडीशनिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर गर्मी के लिए तैयार नहीं थे, जिस करण वहाँ पर मौतें बढ़ीं। कुछ विकासशील देशों में तो स्थिति और बदतर है। वहाँ बाढ़ से फसलें नष्ट हो रही हैं, सूखे से जल संकट पैदा हो रहा है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।

यूरोप और अमरीका में गर्मी से जंगल की आग, सूखा और फसल नुकसान हो रहा है। आर्कटिक क्षेत्र तक गर्मी पहुंच रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र स्तर बढ़ रहा है, तटीय क्षेत्र खतरे में हैं। स्वास्थ्य प्रभाव गंभीर हैं। हीट स्ट्रोक, श्वसन रोग, पानी से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार, 2022 में यूरोप में 60,000 से ज्यादा मौतें गर्मी से हुईं; अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती हैं।

अन्य देशों में भी यही कहानी है। भारत जैसे देशों में अनियमित बारिश से कृषि प्रभावित हो रही है, ऐसे में गरीब किसान सबसे ज्यादा पीड़ित होता है। अफ्रीका में सूखा भुखमरी बढ़ा रहा है। वैश्विक स्तर पर जलवायु शरणार्थी बढ़ रहे हैं। ऐसे में कई देशों में आर्थिक नुकसान वहाँ के GDP का प्रतिशत बिगाड़ रहे हैं।

पर्यावरण प्रबंधन की विफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, लॉबीइंग (फॉसिल फ्यूल कंपनियां) और अल्पकालिक लाभ की सोच से उपजी है। पेरिस समझौते के बावजूद उत्सर्जन कम नहीं हो रहा। ऐसे में विकसित देशों को पहल करनी चाहिए, लेकिन वे भी लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं।

जानकारों के अनुसार इस संकट का समाधान स्पष्ट हैं। जीवाश्म ईंधन से तेजी से संक्रमण नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) की ओर चला जाए। वनों की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिए REDD+ जैसे कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए। सतत कृषि, हरित परिवहन, अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए। अनुकूलन: मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, जल संरक्षण, स्वास्थ्य तैयारियां को सुचारू बनाया जाए। धनी देशों से विकासशील देशों को वित्त और तकनीक हस्तांतरण दिया जाए। भारत जैसे देशों को अपनी सांस्कृतिक विरासत (जैसे वृक्ष पूजा, संतुलित जीवन) को आधुनिक नीतियों से जोड़ना चाहिए।

यूरोप की गर्मी सिर्फ एक चेतावनी है। अगर हम खराब पर्यावरण प्रबंधन और लापरवाही जारी रखेंगे, तो भविष्य में 50 डिग्री तापमान, विनाशकारी बाढ़ और अपरिवर्तनीय क्षति सामान्य हो जाएंगी। समय कम है। 1.5 डिग्री लक्ष्य बचाना संभव है, लेकिन इसके लिए तत्काल, सामूहिक और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है। ऐसे में सरकारें, उद्योग, नागरिक सभी को जिम्मेदारी लेनी होगी। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है, अब अनदेखी करने का समय नहीं बचा। सतत विकास ही एकमात्र रास्ता है, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

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