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‘वेरिटी’: सच से ज़्यादा ख़तरनाक अफ़साना

कुछ कहानियां हमें डराती नहीं हैं। वे हमारे भीतर एक शक छोड़ जाती हैं। ऐसा शक, जो सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी हमारे साथ चलता है। क्या जो हमने देखा, वही सच था? क्या जिस आदमी पर हमें भरोसा हुआ, वह भरोसे के लायक था? क्या जिस औरत को हम पीड़ित समझ रहे थे, वह वास्तव में पीड़ित थी?

सिने-सोहबत

सबसे बड़ा सवाल कि अगर किसी लेखक ने अपनी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे हिस्से को कहानी की शक्ल में लिख दिया हो, तो हम कैसे तय करेंगे कि उसमें कितना सच है और कितना कल्पना?

माइकल शोवाल्टर की हालिया हॉलीवुड फ़िल्म ‘वेरिटी’, कोलीन हूवर के लोकप्रिय मनोवैज्ञानिक रोमांचक उपन्यास पर आधारित है। फ़िल्म में ऐन हैथवे, डकोटा जॉनसन और जोश हार्टनेट मुख्य भूमिकाओं में हैं। और सच कहूं तो ‘वेरिटी’ को सिर्फ़ एक रोमांचक फ़िल्म कहना उसके साथ थोड़ी नाइंसाफी होगी। यह कहानी दरअसल है लेखन की, इच्छा की, विवाह की, अपराध की, महत्वाकांक्षा की और सबसे बढ़ कर सच को अपनी सुविधा के हिसाब से गढ़ लेने की इंसानी फ़ितरत की।

डकोटा जॉनसन की लोवेन ऐशली एक संघर्षरत लेखिका है। किताबें लिखती है, लेकिन सफलता उससे अभी दूर है। तभी उसे एक ऐसा प्रस्ताव मिलता है, जिसे वह शायद ठुकरा नहीं सकती। प्रसिद्ध लेखिका वेरिटी क्रॉफ़र्ड एक भयानक दुर्घटना के बाद लगभग निष्क्रिय अवस्था में है। वह बोल नहीं सकती, लिख नहीं सकती और अपने बेहद लोकप्रिय उपन्यासों की शृंखला पूरी नहीं कर सकती।

लोवेन को उसके घर बुलाया जाता है ताकि वह वेरिटी के अधूरे काम को पूरा कर सके और यहीं से खेल शुरू होता है। क्योंकि किसी लेखक के घर में रखी चीज़ें महज़  चीज़ें नहीं होतीं। कागज, नोटबुक, अधूरे पन्ने, किताबें, तस्वीरें सब कुछ किसी न किसी कहानी की तरफ इशारा करते हैं। लोवेन को एक पांडुलिपि मिलती है। और यह पांडुलिपि वेरिटी की ज़िंदगी के ऐसे हिस्सों को सामने लाती है, जिन्हें पढ़ने के बाद उसके लिए वेरिटी को उसी नज़र से देख पाना संभव नहीं रह जाता।

अब सवाल यह नहीं है कि वेरिटी ने क्या किया। सवाल यह है कि क्या वेरिटी ने सच में वह सब किया? कहानी लिखने वाले के पास सबसे ख़तरनाक ताकत क्या होती है? किसी किरदार को मार देने की? नहीं। उसे परिभाषित करने की। लेखक तय करता है कि उसका नायक कौन है, खलनायक कौन है, कौन निर्दोष है और कौन दोषी।

लेकिन ‘वेरिटी’ इस विचार को एक कदम आगे ले जाती है। अगर कोई लेखक अपनी ज़िंदगी को ही एक कहानी की तरह लिखने लगे तो? अगर वह अपने अपराध को साहित्य बना दे? अगर वह अपनी सच्चाई को कल्पना बताकर बच निकलने की कोशिश करे? और अगर कल्पना को सच बताकर किसी और को दोषी बना दे? यही वह जगह है जहां ‘वेरिटी’ दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि फ़िल्म हमें लगातार याद दिलाती है कि हर कहानी का लेखक सिर्फ़ वही नहीं होता, जो कलम पकड़कर बैठा है। कभी-कभी पाठक भी कहानी लिखता है।

लोवेन वेरिटी की पांडुलिपि पढ़ती है और अपने मन में वेरिटी की एक तस्वीर बनाती है। लेकिन वह तस्वीर सच है या वेरिटी की बनाई हुई है, यह तय करना दर्शक का काम है।

ऐन हैथवे के लिए वेरिटी एक असाधारण भूमिका है। इसलिए नहीं कि वह बहुत कुछ करती हैं, बल्कि इसलिए कि लंबे समय तक उन्हें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वेरिटी शारीरिक रूप से लगभग निष्क्रिय है। लेकिन स्क्रीन पर उसकी मौजूदगी लगातार सक्रिय रहती है। वह बोल नहीं रही। लेकिन दर्शक को लगता है कि वह सब कुछ सुन रही है। वह चल नहीं रही लेकिन लगता है कि वह पूरे घर को नियंत्रित कर रही है। वह अपनी सफ़ाई नहीं दे सकती। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति जवाब नहीं देता, तो हम उसके लिए अपने जवाब गढ़ने लगते हैं।

ऐन हैथवे इसी अस्पष्टता का खूबसूरती से इस्तेमाल करती हैं। उनके चेहरे पर मासूमियत और ख़तरे के बीच की दूरी इतनी कम है कि दर्शक लगातार अपना फ़ैसला बदलता रहता है। और यही एक अच्छी मनोवैज्ञानिक रोमांचक फ़िल्म की खूबी है। वह आपको बताती नहीं कि किससे डरना है। वह आपको डरने के लिए मजबूर करती है।

डकोटा जॉनसन की लोवेन इस फ़िल्म में सिर्फ़ मुख्य किरदार नहीं है। वह दर्शक की आंखें भी है। वह पहली बार उस घर में प्रवेश करती है, तो हमें भी उतना ही कम पता है जितना उसे। धीरे-धीरे उसे कुछ चीज़ें दिखाई देती हैं। फिर कुछ और। फिर कुछ ऐसा, जिसे देखने के बाद वह पहले देखी हुई चीज़ों पर भी शक करने लगती है। और दर्शक भी। यहीं डकोटा जॉनसन बहुत अच्छी लगती हैं।

लोवेन कोई परफेक्ट नायिका नहीं है। वह जिज्ञासु है, असुरक्षित है, भावनात्मक रूप से कमज़ोर पड़ती है और परिस्थितियों के साथ उसका नैतिक कम्पास भी कई बार हिलता है। यही उसकी खूबसूरती है। क्योंकि वह किसी सुपरहीरो की तरह इस घर में नहीं आती। वह एक लेखक की तरह आती है, कहानी खोजने। और धीरे-धीरे कहानी उसे खोजने लगती है।

जोश हार्टनेट का जेरेमी पहली नज़र में एक संवेदनशील और दुखी पति दिखाई देता है। लेकिन ‘वेरिटी’ जैसी फ़िल्म में अगर कोई व्यक्ति बहुत अच्छा दिखाई दे, तो दर्शक स्वाभाविक रूप से पूछता है कि लोवेन और जेरेमी के बीच आकर्षण कहानी को एक और परत देता है। यह सिर्फ़ प्रेम कहानी नहीं है। यह विश्वास की कहानी है। किसे देखकर आपको लगता है कि वह आपकी तरफ है? और अगर वह व्यक्ति आपको वही कहानी सुनाए, जो आप सुनना चाहते हैं, तो क्या आप उसकी बात पर विश्वास कर लेंगे? लोवेन, जेरेमी और वेरिटी के बीच यही दिलचस्प त्रिकोण बनता है। यहां तीन लोग हैं। तीन दृष्टिकोण हैं। और शायद तीन अलग-अलग सच भी।

‘वेरिटी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी कहानी से ज्यादा उसका माहौल है। वेरिटी का घर सिर्फ़ घर नहीं है। वह फ़िल्म का एक किरदार बन जाता है। बाहर खूबसूरती है। अंदर बेचैनी। बाहर परिवार है। अंदर रहस्य। बाहर खामोशी है। और उस खामोशी के भीतर बहुत सारी आवाज़ें।

फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी भी इसी विरोधाभास को पकड़ती है। सब कुछ चमकदार है, खूबसूरत है, सलीके से रखा हुआ है लेकिन उसी सुंदरता के नीचे कुछ ऐसा है जो लगातार असहज करता है। यह डर भूतों का डर नहीं है।

यह उस डर की फ़िल्म है जब आपको लगने लगे कि आप जिसे जानते हैं, शायद वह वह व्यक्ति है ही नहीं। और मेरे लिए यही ‘वेरिटी’ का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। लेकिन फ़िल्म की कमज़ोरी भी यहीं से शुरू होती है। पहला हिस्सा जिस आत्मविश्वास से रहस्य बनाता है, फ़िल्म का आखिरी हिस्सा उतने ही आत्मविश्वास से उस रहस्य को संभाल नहीं पाता।

कहानी में इतने मोड़ आते हैं कि एक समय के बाद रहस्य और उलझन के बीच की सीमा थोड़ी धुंधली हो जाती है। कुछ घटनाएं चौंकाती हैं। कुछ पर आप मुस्कुराते हैं। और कुछ पर आप सोचते हैं क्या सचमुच?

यानी फिल्म कभी-कभी अपनी ही बनाई हुई दुनिया पर ज़रुरत से ज्यादा भरोसा करने लगती है। यही वजह है कि ‘वेरिटी’ एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक रोमांचक फ़िल्म बनने से थोड़ा पीछे रह जाती है। लेकिन यह उसकी विफलता नहीं है। क्योंकि लोकप्रिय सिनेमा का अपना एक आनंद होता है। हर फ़िल्म को शोध-पत्र होने की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी हमें ऐसी कहानी भी चाहिए जो हमें पकड़कर बैठाए, हमें शक करवाए, हमें चौंकाए और बीच-बीच में हमें यह सोचने पर मजबूर करे कि भाई, आख़िर सच क्या है?

‘वेरिटी’ को कोलीन हूवर की लोकप्रियता से अलग करके देखना भी मुश्किल है। आज के समय में साहित्य और सिनेमा का रिश्ता बदल चुका है। अब किताब की लोकप्रियता सिर्फ़ किताबों की बिक्री तक सीमित नहीं रहती। वह एक तैयार दर्शक-वर्ग भी बनाती है। कोलीन हूवर इसी बदलाव की बड़ी प्रतिनिधि हैं। उनकी कहानियों में प्रेम है, लेकिन उसके साथ अपराध, जुनून, हिंसा, असुरक्षा और भावनात्मक उथल-पुथल भी है।

‘वेरिटी’ इस दुनिया का एक ज्यादा अंधेरा रूप है। और शायद इसलिए यह उन दर्शकों को भी आकर्षित कर सकती है जिन्हें पारंपरिक रोमांस से ज्यादा मनोवैज्ञानिक रोमांच पसंद है। शायद ‘वेरिटी’ का सबसे दिलचस्प सवाल यही है।

हम सच जानना क्यों चाहते हैं? क्या इसलिए कि सच ज़रूरी है? या इसलिए कि हमें किसी एक कहानी पर विश्वास करना ज़रूरी लगता है? हर रहस्य का जवाब मिल जाए, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी सवाल का बचा रह जाना ही कहानी को हमारे साथ घर तक लेकर आता है।

‘वेरिटी’ पूरी तरह सफल फ़िल्म नहीं है। लेकिन यह एक ऐसी फ़िल्म ज़रूर है, जिसके बारे में आप फ़िल्म खत्म होने के बाद किसी के साथ बात करना चाहेंगे।

और मेरे लिए सिनेमा की असली परीक्षा यही है। क्या फ़िल्म खत्म होने के बाद बातचीत शुरू होती है? क्योंकि अंततः यह फ़िल्म हत्या, विवाह या रहस्य से ज्यादा कहानी की ताकत के बारे में है।

एक लेखक कहानी लिखता है। पाठक उस पर विश्वास करता है। फिर एक दिन पाठक को शक होता है कि कहानी शायद सच नहीं थी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्योंकि उसने उस कहानी पर विश्वास कर लिया होता है। और शायद ‘वेरिटी’ की सबसे खतरनाक बात यही है कि सच हमेशा सबसे ताकतवर कहानी नहीं होता।
कई बार वह कहानी ज़्यादा ताकतवर होती है, जिस पर हम सच की तरह विश्वास कर लें। यही ‘वेरिटी’ का असली खेल है।

और सिनेमा हॉल से निकलते हुए मेरे मन में बस एक सवाल था कि अगर आपकी ज़िंदगी पर कोई कहानी लिख दे, तो क्या आप पहचान पाएंगे कि उसमें आपका सच कितना है?

अगर आपको रिश्तों के भीतर छिपे रहस्य, मनोवैज्ञानिक रोमांच, खूबसूरत लोकेशन और लगातार बदलते शक पसंद हैं तो ज़रूर देख लीजिएगा।(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)

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