अगर ‘विचाराधीन श्रेणी’ के सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो जाती है तो क्या चुनाव कराना उचित होगा? ऐसे जिन विचाराधीन मतदाताओं के नाम पूरक मतदाता सूची में नहीं शामिल किए जाते हैं उनका पक्ष सुने बगैर क्या मतदान कराना उचित होगा? ये गंभीर सवाल हैं। इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि किस पार्टी को इसका लाभ मिलता है और किसको हानि होती है।
यह बहुत महत्वपूर्ण और गंभीर सवाल है कि किसी संवैधानिक व्यवस्था वाले देश में संविधान बड़ा होता है, उसके प्रावधान अहम होते हैं या एक निश्चित तारीख तक चुनाव कराने की मजबूरी बड़ी होती है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखों और नागरिकों के मतदान के अधिकार के बीच टकराव होता दिख रहा है। हो सकता है कि अंत में ऐसे टकराव की स्थिति नहीं बने क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय और कलकत्ता उच्च न्यायालय की देख रेख में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के अगले चरण का काम चल रहा है और विचाराधीन रखे गए मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच तेज गति से चल रही है। परंतु विचाराधीन श्रेणी में रखे गए नामों की संख्या इतनी ज्यादा है और समय इतना कम है कि यह अंदेशा पैदा होता है कि अगर निश्चित समय तक सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो पाई तो क्या होगा?
ध्यान रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के पहले चरण के बाद चुनाव आयोग ने जो मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की उसमें 58 लाख से कुछ ज्यादा नाम कटे थे। इसके बाद आयोग की ओर से करीब सवा करोड़ मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगतियों’ के आधार पर नोटिस भेजे गए। कई बार समय सीमा बढ़ाने के बाद 28 फरवरी को जो अंतिम मतदाता सूची जारी की गई उसमें करीब पांच लाख नाम और कट गए। इस तरह कुल 63 लाख नाम कटे।
लेकिन इसके अलावा 60 लाख से कुछ ज्यादा मतदाताओं के नाम ‘विचाराधीन श्रेणी’ में डाल दिए गए। इनमें कई तरह की तार्किक विसंगति थी, जिसे ठीक करने की आवश्यकता थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने 15 मार्च को मतदान की तारीखों का ऐलान किया तो उसमें बताया गया कि पश्चिम बंगाल में छह करोड़ 44 लाख मतदाता हैं। एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले पश्चिम बंगाल में सात करोड़ 66 लाख मतदाता थे। इसका अर्थ है कि मतदान की घोषणा के दिन चुनाव आयोग ने जो संख्या बताई उसमें विचाराधीन रखे गए 60 लाख नामों को शामिल नहीं किया। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि इन 60 लाख लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा।
अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद यानी 28 फरवरी के बाद से इन 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की जा रही है ताकि ‘तार्किक विसंगतियों’ को दूर किया जा सके। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर इसमें पश्चिम बंगाल के अलावा कई पड़ोसी राज्यों के सात सौ न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि ‘विचाराधीन श्रेणी’ के मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच कर पूरक मतदाता सूची प्रकाशित की जाए। दस्तावेजों की व्यापक जांच के बाद ‘विचाराधीन श्रेणी’ के जिन लोगों के नाम काटे जा रहे हैं उनकी अपील सुनने की भी व्यवस्था की गई है।
इसके लिए 19 अपीलीय निकायों का गठन किया गया है। एक निकाय में एक जिले की आपत्तियों को सुना जाएगा। सेवानिवृत्त वरिष्ठ जज और न्यायिक अधिकारी इन निकायों के अध्यक्ष बनाए गए हैं। अभी तक लगभग 27 लाख विचाराधीन मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हुई है, जिनमें से लगभग 40 फीसदी के दस्तावेज संतोषजनक नहीं पाए गए हैं और उनके नाम काट दिए गए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वंय दावा किया कि पहली पूरक सूची में 10 लाख नाम काटे गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सीमावर्ती जिलों के मतदाताओं के नाम ज्यादा काटे गए हैं। सबको पता है कि सीमावर्ती जिलों का अर्थ है मुस्लिम बहुल जिले, जहां के नाम ज्यादा कटे हैं। वैसे भी जो 60 लाख नाम ‘विचाराधीन श्रेणी’ में रखे गए थे उनमें से 19 लाख नाम सिर्फ दो जिलों मालदा और मुर्शिदाबाद के थे। करीब दो तिहाई यानी 40 लाख नाम सात या आठ जिले के थे।
बहरहाल, अगर चुनावी राजनीति को किनारे रख दें तो यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कि किस जाति या समुदाय या जिले के लोगों के नाम ज्यादा कटे हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए और किसी भी अपात्र का नाम सूची में नहीं होना चाहिए। इसके लिए ही इतनी बारीकी से मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की जा रही है। एक मार्च से विचाराधीन मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच शुरू हुई और पहले 10 दिन में तो सिर्फ आठ लाख नामों की जांच हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय को 11 मार्च को बताया गया था कि 52 लाख नाम बाकी है। उसके बाद न्यायिक अधिकारियों की संख्या बढ़ी और उनके लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं तो इसमें तेजी आई। इसके बावजूद पिछले 20 दिन में 27 लाख के करीब मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो पाई है। पहले चरण के मतदान के लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख चार अप्रैल है। अगर मतदाता सूची को उस दिन फ्रीज किया जाता है तब भी अब 15 दिन का समय बचा है। क्या 15 दिन में बचे हुए 33 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो जाएगी? आमतौर पर नामांकन शुरू होने के दिन मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया जाता है। इस बार विशेष परिस्थितियों को देखते हुए विशेष प्रावधान किए जाते हैं कि नामांकन के आखिरी दिन तक नाम जोड़े जाएंगे तब भी अगले 15 दिन में हर दिन दो लाख से ज्यादा मतदाताओं के दस्तावेज जांचने होंगे।
जोर देकर इस बात का जिक्र करने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि न तो मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच में कोताही की जा सकती है और न बिना सबकी जांच हुए मतदान कराया जा सकता है। यह ‘कैच 22 सिचुएशन’ जैसी स्थिति है। भारत का संविधान कहता है कि 18 साल से ऊपर की आयु के हर भारतीय नागरिक को मतदान का अधिकार है। किसी भी व्यस्क नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। अगर उसके दस्तावेज में कोई विसंगति है तो उसे ठीक करने का अवसर उसको जरूर मिलना चाहिए। बिना अवसर दिए किसी भी आधार पर उसको मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय और कलकत्ता उच्च न्यायालय ने न्यायिक अधिकारियों को शामिल करके मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की व्यवस्था बनवाई।
अब अगर ‘विचाराधीन श्रेणी’ के सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो जाती है तो क्या चुनाव कराना उचित होगा? ऐसे जिन विचाराधीन मतदाताओं के नाम पूरक मतदाता सूची में नहीं शामिल किए जाते हैं उनका पक्ष सुने बगैर क्या मतदान कराना उचित होगा? ये गंभीर सवाल हैं। इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि किस पार्टी को इसका लाभ मिलता है और किसको हानि होती है। यह पार्टियों या नेताओं के राजनीतिक नफा नुकसान का मामला नहीं है। यह नागरिकों के संवैधानिक अधिकार का मामला है। यह सही है कि चुनाव आयोग ने मतदान की तारीखों का ऐलान कर दिया है। लेकिन यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे बदला नहीं जा सकता है या आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। यह भी सही है कि सात मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है। अगर उस दिन तक चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं होती है और नई विधानसभा का गठन नहीं होता है तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ जाएगा। जो लोग चुनाव टलने पर संवैधानिक संकट की बात कर रहे हैं असल में उनको संविधान की जानकारी नहीं है। किसी भी राज्य में समय पर चुनाव नहीं होने या किसी और कारण से राष्ट्रपति शासन लगता है तो वह संवैधानिक संकट नहीं होता है। राष्ट्रपति शासन संविधान प्रदत्त एक वैकल्पिक शासन व्यवस्था है।
यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वंय कहती रही हैं कि एक भी पात्र मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के नेता भी यही कहते रहे हैं। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के नेताओं ने तो खुल कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। उन्होंने कहा कि जब तक सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो जाती है और शुद्ध मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती है तब तक चुनाव नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी भी नहीं चाहेगी कि लाखों लोगों के नाम बिना सुनवाई के मतदाता सूची से बाहर हो जाएं। तभी सबसे पहले सभी 60 लाख विचाराधीन मतदाताओं के दस्तावेजों की बारीकी से पड़ताल होनी चाहिए और योग्य पाए जाने वाले लोगों के नाम पूरक मतदाता सूची में शामिल होने चाहिए।
इसके बाद जिन लोगों के नाम पूरक मतदाता सूची में नहीं शामिल होते हैं उनको अपीलीय प्राधिकार के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराने का मौका मिलना चाहिए और अपीलीय प्राधिकार के अंतिम निर्णय के बाद ही मतदान के लिए मतदाता सूची जारी होनी चाहिए। अगर इसमें देरी होती है और चुनाव कुछ दिन के लिए आगे बढ़ाना पड़ता है तो वह भी किया जाना चाहिए। ध्यान रहे स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए पहले भी चुनाव की तारीखें आगे बढ़ाई गईं और समय पर चुनाव नहीं हो पाने की वजह से पहले भी राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है। इसमें कुछ भी अनहोनी नहीं है। हां, अगर बिना संपूर्ण जांच के लोगों के नाम कटते हैं या छूट जाते हैं तो वह अनहोनी होगी, जो स्वतंत्र भारत में कभी नहीं हुई है। वैसा नहीं होने देना चुनाव आयोग, सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों का भी पुनीत कर्तव्य है। क्योंकि आज अगर किसी भी आधार पर नागरिक को मत देने के अधिकार से वंचित किया जाता है तो आगे के लिए रास्ता खुलेगा। कल जीविका के अधिकार से वंचित किया जा सकता है, उसके आगे शिक्षा, चिकित्सा आदि के अधिकार भी बाधित हो सकते हैं।
(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
