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चेतना संचार और पतितपावनी गंगा

Patna, Oct 25 (ANI): Devotees perform rituals on the banks of the Ganga River on the occasion of 'Nahay Khay', the first day of Chhath Puja festival, in Patna on Saturday. (ANI Photo)

वैशाख शुक्ल सप्तमी, जिसे गंगा सप्तमी या जह्नु सप्तमी कहा जाता है, गंगा के दूसरे जन्म का प्रतीक पर्व है। कथा के अनुसार जब गंगा ने ऋषि जह्नु के यज्ञ स्थल को जलमग्न कर दिया, तो उन्होंने क्रोध में गंगा को पी लिया और बाद में अपने कान से उन्हें पुनः बाहर निकाला। यह प्रसंग प्रकृति और ज्ञान, यानी विज्ञान और परंपरा के बीच संतुलन का प्रतीक है।

23 अप्रैल – गंगा सप्तमी

भारतीय चिंतन में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि चेतना का सजीव रूप और सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाने वाली धारा है। ऋग्वेद के नदी सूक्त से लेकर पुराणों की भावपूर्ण कथाओं तक गंगा का अस्तित्व केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर स्थापित है। गंगा शब्द का अर्थ है—जो निरंतर बहती रहती है और जो जड़ता को समाप्त कर चेतना का संचार करती है। गंगा के उद्भव को तीन स्तरों पर समझा गया है—भौतिक, दैवी और आध्यात्मिक।

पौराणिक कथाओं में गंगा को विष्णु के चरणों से निकली हुई कहा गया है। वामन अवतार के समय जब भगवान का चरण ब्रह्मांड को भेदता है, तब जो दिव्य जल प्रवाहित हुआ, वही गंगा बनी। पृथ्वी पर गंगा का अवतरण केवल एक घटना नहीं था, बल्कि सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म अवशेषों को मोक्ष देने का एक महान कार्य था। भगीरथ का तप केवल व्यक्तिगत प्रयास नहीं था, बल्कि लोककल्याण के लिए किया गया वह महान प्रयास था, जिसने आकाश और पृथ्वी के बीच एक सेतु बना दिया। शिव की जटाओं में गंगा का समाना यह बताता है कि उसकी अपार ऊर्जा को केवल शिव जैसा संतुलित और कल्याणकारी स्वरूप ही नियंत्रित कर सकता है।

वैशाख शुक्ल सप्तमी, जिसे गंगा सप्तमी या जह्नु सप्तमी कहा जाता है, गंगा के दूसरे जन्म का प्रतीक पर्व है। कथा के अनुसार जब गंगा ने ऋषि जह्नु के यज्ञ स्थल को जलमग्न कर दिया, तो उन्होंने क्रोध में गंगा को पी लिया और बाद में अपने कान से उन्हें पुनः बाहर निकाला। यह प्रसंग प्रकृति और ज्ञान, यानी विज्ञान और परंपरा के बीच संतुलन का प्रतीक है। गंगा की प्राचीनता ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र से सिद्ध होती है—

इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या।

असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जीकीये शृणुह्या सुषोमया।।- ऋग्वेद 10/75/5

अर्थात—हे गंगा, यमुना, सरस्वती और अन्य नदियों, मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करें और मेरी बात सुनें। यहां गंगा को सबसे पहले स्थान दिया गया है। यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी गंगा को पवित्रता का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। उपनिषदों में हरिद्वार को ज्ञान प्राप्ति का केंद्र बताया गया है और गंगा को उस ज्ञानधारा के रूप में स्वीकार किया गया है, जो अज्ञान को दूर करती है। भागवत, ब्रह्मवैवर्त और स्कन्द पुराण में गंगा को केवल जल नहीं, बल्कि ब्रह्म का रूप कहा गया है।

महाभारत में भीष्म पितामह कहते हैं कि जो पुण्य तप और यज्ञ से नहीं मिलता, वह गंगा के दर्शन मात्र से प्राप्त हो सकता है। गंगा का जल अमृत समान है, क्योंकि इसमें सातों नदियों का सार समाहित है। इतिहास बताता है कि भारत की प्रमुख सभ्यताएं गंगा के किनारे विकसित हुईं। पाटलिपुत्र, काशी और कन्नौज जैसे नगरों ने गंगा के कारण आर्थिक और सामरिक महत्व प्राप्त किया। वैज्ञानिक दृष्टि से भी गंगा का जल विशेष है, क्योंकि इसमें बैक्टीरियोफेज नामक सूक्ष्म जीव होते हैं, जो हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करते हैं।

इसकी स्वशुद्धि क्षमता इसे अन्य नदियों से अलग बनाती है। गंगा का प्रदूषण केवल बाहरी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक भूल का परिणाम है। अनेक विद्वान गंगा गीता और गंगा स्तोत्र को गंगा का पांचवां वेद मानते हैं। गंगा की हर लहर एक मंत्र की तरह है और उसका सतत प्रवाह सामवेद के गान जैसा है। यह ऐसा वेद है, जिसे पढ़ने से अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। गंगा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की आधारशिला है।

उसका संरक्षण केवल पर्यावरण का कार्य नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का एक साधन है। गंगा का अस्तित्व इस देश की सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करता है। गंगा का अवतरण ऊपर से नीचे की ओर इसलिए हुआ, ताकि गिरते हुए मानव समाज को फिर से ऊंचाई की ओर ले जाया जा सके। इसलिए गंगा केवल सिंचाई या परिवहन का साधन नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक उन्नति का मार्ग है, जिसके सहारे भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है।

गंगावतरण केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक संकेत भी है। प्राचीन ग्रंथों में गंगा को आकाशगंगा से जोड़ा गया है। भगीरथ का तप उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा को पृथ्वी पर लाने का प्रतीक माना जा सकता है। शिव की जटाओं में गंगा को धारण करने का अर्थ है कि हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं ने उस तीव्र ऊर्जा को नियंत्रित कर संतुलित प्रवाह में बदला। यदि यह ऊर्जा सीधे पृथ्वी पर आती, तो संतुलन बिगड़ सकता था। गंगा के जल की विशेषता उसके अक्षय गुण में है।

1869 में ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैनकिन ने पाया कि गंगा के जल में हैजा के जीवाणु जीवित नहीं रह पाते। आधुनिक विज्ञान इसे बैक्टीरियोफेज कहता है, जो जल को सड़ने से बचाते हैं। यह तत्व गंगा में हिमालय की औषधीय वनस्पतियों और मिट्टी से छनकर आता है, जिससे इसमें विशेष गुण विकसित होते हैं। यह शुद्धता केवल बाहरी नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर भी है।

उपनिषदों में गंगा को सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक माना गया है। जैसे शरीर में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम होता है, वैसे ही प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है। ऋग्वेद में गंगा का प्रारंभिक उल्लेख यह बताता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता का विस्तार गंगा के मैदानों तक था। इतिहास में गंगा आर्यावर्त की जीवनरेखा रही है। मौर्य और गुप्त काल में यह व्यापार का प्रमुख मार्ग थी।

इसके किनारे स्थित आश्रम केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शिक्षा के केंद्र भी थे, जहां विज्ञान और कृषि की शिक्षा दी जाती थी। गंगा ने भारत को दूर देशों से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जह्नु ऋषि द्वारा गंगा को रोककर पुनः प्रवाहित करना संभवतः किसी प्राचीन इंजीनियरिंग कार्य का संकेत है, जिसमें नदी का मार्ग बदला गया होगा।

आज गंगा केवल प्रदूषण की समस्या नहीं झेल रही, बल्कि अस्तित्व के संकट में है। बांधों के कारण उसकी निरंतर धारा बाधित हो गई है। जब तक गंगा स्वच्छ और अविरल नहीं होगी, तब तक भारत की आध्यात्मिक चेतना पूरी तरह जागृत नहीं हो सकती। गंगा केवल धार्मिक आचरण तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश की पारिस्थितिकी का आधार है।

यह भारतीय मन की वह शाश्वत धारा है, जो समय के उतार-चढ़ाव के बावजूद बनी हुई है। गंगा का जल एक जीवंत इकाई है। इसकी रक्षा करना अपनी परंपरा, विज्ञान और भविष्य की रक्षा करना है। भारत का भूगर्भीय इतिहास नदियों के परिवर्तन और सभ्यताओं के विकास की कहानी है। गंगा का वर्तमान स्वरूप और सरस्वती का लोप हिमालय की भौगोलिक गतिविधियों का परिणाम है।

प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि एक समय यमुना, गंगा की नहीं बल्कि सरस्वती की सहायक नदी थी। हरियाणा और राजस्थान में मिले भूगर्भीय प्रमाण बताते हैं कि किसी बड़े भूगर्भीय परिवर्तन के कारण यमुना का मार्ग बदल गया और वह गंगा में मिल गई। इसी के साथ सरस्वती लुप्त हो गई और गंगा प्रमुख बन गई। गंगा ने सरस्वती की परंपरा को अपने में समाहित कर लिया, जिसे हम त्रिवेणी संगम के रूप में जानते हैं। गंगा का उद्भव प्लाइस्टोसीन युग के अंत में हुआ माना जाता है। पुराणों में गंगा के स्वर्ग से उतरने का वर्णन वास्तव में हिमनदों के पिघलने और उनके वेग से मैदानों में आने का प्रतीक है।

भूविज्ञान के अनुसार गंगा ने अपना मार्ग स्वयं बनाया। वेदों में पहले सरस्वती को श्रेष्ठ कहा गया, बाद में गंगा को, जो सांस्कृतिक परिवर्तन को दर्शाता है। जब सरस्वती सूखने लगी, तो समाज पूर्व की ओर बढ़ा और गंगा के किनारे बस गया। गंगा का मैदान उसी परिवर्तन का परिणाम है।

इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि परिवर्तन को स्वीकार करने की प्रक्रिया है। गंगा ने सरस्वती की सांस्कृतिक विरासत को अपनाया। जहां सरस्वती ज्ञान की देवी थी, वहीं गंगा जीवन और मुक्ति की धारा बनी। गंगा का हर कुंभ उस पुराने संगम की याद दिलाता है, जो पहले भौतिक था और अब आध्यात्मिक है। गंगा और सरस्वती का संबंध त्याग और स्वीकार का है। सरस्वती ने अपने अस्तित्व का त्याग कर गंगा को विस्तार दिया, जिससे भारत को हजारों वर्षों तक जीवन और ज्ञान मिला। आज का विज्ञान भी इस पौराणिक कथा की पुष्टि करता है।

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