Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

अतीत से आकर्षित, वर्तमान से सम्मोहित!

New Delhi, Jul 25 (ANI): Protesters celebrate at Jantar Mantar after Union Education Minister Dharmendra Pradhan resigns from his post, in New Delhi on Saturday. (ANI Photo/Sumit)

राजनीति में ‘श्रमिक वर्ग’ की वापसी एक तथ्य है, जिसे फर्जी बहसों से कुछ समय तक ही रोका जा सकता है। समझने की बात है कि सोवियत मोह या चाइना-मैक्सिंग अपने-आप में कोई स्वतंत्र परिघटना नहीं हैं। ये युवाओं की बदलती प्राथमिकता और राजनीति के मूड में आ रहे बदलावों का संकेत भर हैं। 

यह चर्चा तो पहले भी रही है, लेकिन पश्चिम के दक्षिणपंथी हलकों को यह परेशान करने की हद तक पहुंच गई है, इसका अंदाजा ब्रिटेन की कंजरवेटिव पत्रिका द स्पेक्टेटर में प्रकाशित एक लेख को पढ़ते हुए हुआ। लेख का शीर्षक है- Gen Z is falling for the Soviet Union यानी ज़ेन-जी सोवियत संघ के मोहपाश में फंस रहा है।

गौरतलब हैः सोवियत संघ के विघटन को लगभग चार दशक होने को आ रहे हैं। इस दौर में पश्चिम के दक्षिणपंथी और लिबरल बुद्धिजीवी घोषणा करते रहे हैं कि सोवियत संघ जिस वैचारिक युग का प्रतीक था, वह इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है। अक्सर, इस सिलसिले में लिबरल राजनीति-शास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा की “इतिहास का अंत” होने की उद्घोषणा को याद किया जाता है, जिसके जरिए उन्होंने दावा किया था कि लिबरल-पूंजीवादी लोकतंत्र की अंतिम विजय हो गई है और अब यही मानवता का भविष्य है।

लेकिन अब, जैसाकि द स्पेक्टेटर में जिक्र हुआ है, पश्चिमी देशों की युवा पीढ़ी (Gen Z) फिर से सोवियत इतिहास, संस्कृति और प्रतीकों को लेकर एक “अजीब और अप्रत्याशित” आकर्षण दिखा रही है। ‘द स्पेक्टेटर’ के लेख में इस पर गहराई से चर्चा की गई है कि आधुनिक युवा सोवियत संघ के प्रति क्यों आकर्षित हो रहे हैं? हालांकि अपने दक्षिणपंथी रुझानों के कारण इस आलेख के लेखक इवो डेलिंगपोल ने अपनी इस धारणा पर भी बार-बार जोर दिया है कि यह आकर्षण मुख्य रूप से किसी गहरी वैचारिक या राजनीतिक प्रतिबद्धता का परिणाम नहीं है। यह बस एक सांस्कृतिक और सौंदर्यशास्त्रीय (aesthetic) घटना है।

बहरहाल, वे स्वीकार करते हैं कि सोवियत संघ के राष्ट्रगान की धुन पर वीडियो बनाना, पुरानी स्लाविक शैलियों के परिधानों को पहनना, और सोवियत काल की ‘ब्रूटलिस्ट’ (Brutalist) वास्तुकला पर भव्य बनी इमारतों के वीडियो को रील्स के रूप में साझा करना आज के युवाओं के बीच एक बड़ा ट्रेंड बना हुआ है। डेलिंगपोल ने स्वीकार किया है कि जेन-जेड पीढ़ी के लिए सोवियत इतिहास “शीत युद्ध के खौफ, वैचारिक दमन, या कम्युनिस्ट तानाशाही की दर्दनाक वास्तविकताओं” से कोसों दूर है। उनके लिए यह सिर्फ एक ‘कूल’, रहस्यमयी और विजुअल रूप से आकर्षक शैली बना हुआ है, जिसे वे अपनी ऑनलाइन पहचान का हिस्सा बना रहे हैं।

लेकिन हकीकत यह है कि इस प्रवृत्ति के पीछे केवल फैशन ही कारण नहीं है।  बल्कि सामाजिक-आर्थिक पहलू भी इसके पीछे छिपे हैं। मसलन, अनेक युवा आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था की खामियों, बढ़ती महंगाई, आवास संकट और आर्थिक अस्थिरता से निराश हैं और वे व्यवस्था के विकल्प के रूप में समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव महसूस करने लगे हैं। मुमकिन है कि कुछ युवाओं के लिए (जैसाकि डेविंगपोल ने कहा है) यह केवल इतिहास के प्रति एक सतही जिज्ञासा भर हो, लेकिन इससे इस प्रश्न का जवाब नहीं मिलता कि आखिर यह जिज्ञासा सोवियत संघ के प्रति ही क्यों पैदा हुई है? उन्होंने कहा है कि इन प्रतीकों को केवल एक स्टाइलिश काउंटर-कल्चर के रूप में पेश किया जा रहा है, तो फिर सवाल वही है- आखिर काउंटर कल्चर के स्रोतों की तलाश उस व्यवस्था में युवा क्यों कर रहे हैं, जिसे बदनाम करने में पश्चिमी पूंजीवाद ने अपनी पूरी ताकत झोंके रखी है?

बदनाम करने की वैसी ही मुहिम अतीत में कम्युनिस्ट चीन के खिलाफ भी चली, जो थोड़े समय तक मद्धम पड़ने के बाद अब फिर से बड़े प्रोपेगैंडा कैंपन का रूप लिए हुए है। मगर इस कहानी का दूसरा पहलू यह है कि इस प्रचार अभियान के बावजूद चीन के प्रति पश्चिमी युवाओं में आकर्षण बढ़ता चला गया है- इस हद तक कि इस परिघटना को चिह्नित करने के लिए चाइना-मैक्सिंग (Chinamaxxing) शब्द का इज़ाद किया गया है।

चाइना-मैक्सिंग सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हुआ नया ट्रेंड है, जिसमें खासकर पश्चिमी देशों के युवा चीन की संस्कृति, जीवन शैली, खान-पान, तकनीक और सामाजिक तौर-तरीकों को अपनाने तथा उनकी प्रशंसा करने लगे हैं। जाहिरा तौर पर इस शब्द के दो हिस्से हैं: China और Maxxing। Maxxing का अर्थ है इंटरनेट की भाषा में किसी चीज को अधिकतम स्तर तक अपनाना या उसमें खुद को पूरी तरह ढालना। इसके कारणों को समझने की कोशिश में विश्लेषकों ने कहा है कि यह चीन की आर्थिक और तकनीकी उपलब्धियों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी और पश्चिमी समाज की मौजूदा जीवन शैली से उपजे असंतोष का मिला-जुला संकेत देते है।

चाइना-मैक्सिंग को समझने के प्रयास में अमेरिकी समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने एक खास स्टोरी प्रसारित की थी। उसके मुताबिक चाइना-मैक्सिंग से प्रभावित युवा सुबह गर्म पानी पीने लगे हैं, नाश्ते में चावल और कॉजी (Congee) जैसे चीनी भोजन अपना रहे हैं, घर में चप्पल पहनने और पारंपरिक चीनी स्वास्थ्य पद्धतियों को अपनाने लगे हैं, ताई ची और चीन के पारंपरिक व्यायाम में दिलचस्पी ले रहे हैं, चीनी फैशन, संगीत, फिल्म, तकनीक और उत्पादों की प्रशंसा कर रहे हैं, और चीन की हाई-स्पीड रेल, आधुनिक शहरों, और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की सराहना कर रहे हैं। इसका एक लोकप्रिय सोशल मीडिया वाक्य है: You met me at a very Chinese time in my life (यानी आप मुझसे जिंदगी के उस दौर में मिले, जो चीन का युग है।)

यह ट्रेंड 2025 में उभरना शुरू हुआ। जनवरी-फरवरी 2026 में टिकटॉक तथा इंस्टाग्राम पर यह तेजी से लोकप्रिय हुआ। तब इसको लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया में चर्चा शुरू हुई। एपी की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ महत्त्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं को इसका कारण समझा गया है। इनके मुताबिक पश्चिमी युवा चीन को अब केवल सस्ते सामान बनाने वाले देश के रूप में नहीं देखते। बल्कि इलेक्ट्रिक कारों, हाई-स्पीड रेल, डिजिटल तकनीक, रॉबोटिक्स, आधुनिक शहरों, और औद्योगिक क्षमता में चीन की उपलब्धियां उनके आकर्षण के बड़े कारण बन गए हैं। चीनी उत्पादों और मनोरंजन की वैश्विक लोकप्रियता भी इस प्रवृत्ति को बढ़ा रही है।

इस कथा का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू है- पश्चिमी देशों के बहुत से युवाओं में बाजार आधारित उपभोक्तावादी जीवन शैली, व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अलगाव को लेकर असंतोष। वे चीन में कुछ ऐसी चीजें देखते हैं, जो उनके अपने समाज में कमजोर पड़ती दिखाई देती हैं। मसलन, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, आधुनिक शहरी सुविधाएं, तकनीकी विकास की तेज गति, सामूहिक जीवन, और पारिवारिक संस्कृति, तथा दीर्घकालिक विकास की योजनाएं। इस घटना का अर्थ है चीन का सॉफ्ट पॉवर तेजी से बढ़ा है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाओयू युवान ने एपी से कहा कि चीन का सांस्कृतिक प्रभाव अब रोजमर्रा के उपभोग, मनोरंजन और उपयोगिता के माध्यम से फैल रहा है।

सवाल है कि क्या चीन की सफलताओं को वहां की शासक कम्युनिस्ट पार्टी के सोशलिस्ट विचारों और नीतियों से अलग करके समझा जा सकता है? वैसे, वर्तमान सिर्फ नौजवानों के चीन के सॉफ्ट पॉवर से प्रभावित होने तक सीमित नहीं है। अमेरिका और यूरोप में युवा पीढ़ी में सोशलिज्म के प्रति बढ़ता आकर्षण पिछले कुछ वर्षों का एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम है। इसके पीछे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के परिणामस्वरूप पैदा हुई गैर-बराबरी, महंगी होती आवास व्यवस्था, रोजगार की अनिश्चितता, स्वास्थ्य और शिक्षा का बढ़ा खर्च तथा भविष्य को लेकर बढ़ती निराशा जैसे कारण अहम हैं। इसका भी अर्थ यही है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद भले सोशलिज्म को लगभग अप्रासंगिक मान लिया गया था, लेकिन सिर्फ तीन-साढ़े तीन दशक बाद नई पीढ़ी के एक हिस्से में उस विचारधारा के प्रति दिलचस्पी बढ़ने लगी है, सोवियत संघ जिसका संदेशवाहक और प्रतीक था।

पश्चिम इसके आरंभिक संकेत दशक भर पहले मिलने शुरू हुए। सर्वे एजेंसी गैलप के 2018 के एक सर्वेक्षण में 18-29 वर्ष के अमेरिकी युवाओं में 51 प्रतिशत ने सोशलिज्म के प्रति सकारात्मक तब राय जताई की थी, जबकि पूंजीवाद के प्रति सकारात्मक राय रखने वालों का प्रतिशत 45 ही था। पियू रिसर्च सेंटर के 2019 के अध्ययन में भी उम्र के आधार पर बड़ा अंतर दिखाई पड़ा। उसके मुताबिक युवा अमेरिकी सोशलिज्म को बुजुर्गों की तुलना में अधिक सकारात्मक नजरिये से देखने लगे थे। यह दीगर है कि सोशलिज्म के अर्थ को लेकर अलग-अलग लोगों की समझ में काफी अंतर सामने आता रहा है।

बहरहाल, अमेरिका में अब इस रुझान की अभिव्यक्ति ठोस राजनीतिक नतीजों में होने लगी है। बीते तीन नवंबर को हुए मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट्स ऑफ़ अमेरिका (डीएसए) से जुड़े और समर्थित उम्मीदवारों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। ऐसे आठ उम्मीदवार अब हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का सदस्य हैं। राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तरों तक के लिए हुए चुनाव में डीएसए के 50 से ज्यादा सदस्य इस बार विजयी हुए हैं।

और जो रुझान अमेरिका में है, वह ब्रिटेन सहित यूरोप के भी कई हिस्सों में उभर रहा है। खासकर कोरोना काल के बाद यह प्रवृत्ति तेजी से आगे बढ़ी है। इंस्टीट्यूट ऑफ इकॉनोमिक अफेयर्स (IEA) की 2021 की एक सर्वे रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष था कि 67 प्रतिशत युवा एक सोशलिस्ट आर्थिक व्यवस्था में रहना चाहते हैं। उनमें से 72 प्रतिशत युवा ऊर्जा, जल और रेलवे जैसे उद्योगों के फिर राष्ट्रीयकरण के पक्ष में थे। 78 प्रतिशत नौजवानों ने ब्रिटेन के आवास संकट के लिए पूंजीवाद को जिम्मेदार माना और 75 प्रतिशत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की समस्या पूंजीवादी व्यवस्था से जुड़ी हुई है।

ये आंकड़े विशेष रूप से दिलचस्प हैं, क्योंकि IEA मुक्त बाजार और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थक संस्थान है। हालिया सर्वेक्षण बताते हैं कि 2021 में जाहिर हुआ ट्रेंड अनवरत आगे बढ़ा है। इस वर्ष फ्रेजर इंस्टीट्यूट के “Realities of Socialism” प्रोजेक्ट के लिए कराए एक सर्वे के निष्कर्षों पर गौर करेः 18-34 वर्ष आयु वर्ग के 53 प्रतिशत ब्रिटिश युवाओं ने समाजवाद को आदर्श आर्थिक व्यवस्था माना।

उसी अध्ययन यह भी पाया गया कि सर्वे में शामिल अंग्रेज़ी-भाषी देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड) के नौजवानों में समाजवाद के प्रति समर्थन बढ़ा है। बहरहाल, पूरे यूरोप के स्तर पर यह रुझान उतना साफ नहीं है। मसलन, एलायंज फाउंडेशन के 2025 के अध्ययन के अनुसार स्पेन में 16-39 वर्ष के युवाओं में सिर्फ 28 प्रतिशत स्वयं को वामपंथी विचारधारा के निकट मानते हैं। पांच बड़े यूरोपीय देशों में यह सबसे बड़ा अनुपात था। जर्मनी, फ्रांस, इटली और पोलैंड जैसे देशों में युवा राजनीतिक रूप से काफी विभाजित हैं। इनमें कहीं वामपंथी और कहीं धुर दक्षिणपंथी रुझान मजबूत हुए हैं।

इन रुझानों का परिणाम इन देशों की राजनीति पर देखने को मिल रहा है। अमेरिका में डीएसए के बढ़े प्रभाव का नतीजा है कि हाल में हुए मिडटर्म चुनावों के दौरान आर्थिक मुद्दों की धमाकेदार वापसी हुई। महंगाई, मुफ्त चिकित्सा, आर्थिक गैर-बराबरी पर लगाम और कल्याणकारी राज्य के दौर जैसी सार्वजनिक सुविधाओं के वादे उम्मीदवारों के भाषणों में झलके। ऐसा ‘सांस्कृतिक’ और पहचान आधारित विभाजक मुद्दों की कीमत पर हुआ, जो पिछले पांच दशक से राजनीति पर हावी रहे हैं। इन दशकों के बीच ऐसा पहली बार हो रहा है, जब पार्टियों और उम्मीदवारों की जुबान पर “श्रमिक वर्ग” शब्द लौटा है और वे उनके लिए नीतियों की बात कर रहे हैं!

पश्चिमी देशों में ट्रंप जैसे धुर-दक्षिणपंथी नेता या दलों के उदय की पृष्ठभूमि उद्योग-धंधों के पराभव और उससे बढ़ी अवसरहीनता से बनी। जिस दौर में कथित वामपंथ गर्भपात के अधिकार, सामुदायिक पहचान आधारित मुद्दों, महिला और एलजीबीटीक्यू के लिए उदार नीतियों की वकालत में खोया हुआ था, धुर दक्षिणपंथी ताकतों ने अवसरों से वंचित हुए श्रमिक वर्ग को गोलबंद कर पारंपरिक राजनीति का रूप बदल दिया। अब उसका प्रतिवाद ‘समाजवादी विमर्श’ के फिर उदय के रूप में हो रहा है। डीएसए जैसे संगठनों का उभार इसी परिघटना की पुष्टि करता है। और चूंकि यह विमर्श लौटा है, तो सोवियत संघ से जुड़ा अतीत-मोह भी जागा है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे वैचारिक बदलावों से भारतीय राजनीति अभी कमोबेश अछूती है। यहां आज भी श्रमिक वर्ग की बात करना जोखिम भरा है, जैसाकि नवोदित छात्र नेता (नेहा बोरा) के एक इंटरव्यू के संदर्भ में देखने को मिला। जातीय पहचान आधारित राजनीतिक शक्तियों के श्रमिक वर्ग से कटने और अभिजात्य चरित्र अपनाने का सीधा-सादा सच बोल कर उन्होंने अपने लिए तीखी आलोचनाओं को आमंत्रित कर लिया। लेकिन पुराने दौर में शासक वर्गों ने रोजी-रोटी के सवालों और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दों को ढकने के प्रयास में आईडेंटीटी पॉलिटिक्स को जो सुविधाएं दीं और उससे जो निहित स्वार्थ पैदा हुए, उनके लाभार्थियों के दिन अब लद रहे हैं। राजनीति में ‘श्रमिक वर्ग’ की वापसी एक तथ्य है, जिसे फर्जी बहसों से कुछ समय तक ही रोका जा सकता है। समझने की बात है कि सोवियत मोह या चाइना-मैक्सिंग अपने-आप में कोई स्वतंत्र परिघटना नहीं हैं। ये युवाओं की बदलती प्राथमिकता और राजनीति के मूड में आ रहे बदलावों का संकेत भर हैं।

Exit mobile version