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हिन्दू नेता का भोलापन

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हर महत्वपूर्ण देश भारत से केवल ट्रेड डीलकी बात करता है। क्यों कि वह जानता है कि और हमारे पास कुछ है नहीं! बाकी हमारे पास क्या है? हम देश के अंदर भी धंधे, गद्दी, तथा वैध लूट-पाट के सिवा और क्या कर रहे हैं? दिल्ली में बैठे राजदूत सालो भर तमाशा देखकर जो हमारा मूल्यांकन करते हैं, वह उन के देशों के शासकों की नीतियों में झलकता है। मगर बेचारा हिन्दू नेता! अपनी गद्दी और अपनी भंगिमाओं पर खुद मुग्ध रहने की लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हैं।

हाल में किसी अमेरिकी अकादमी में एक बड़े भाजपा नेता ने  बोलते हुए दु:ख व्यक्त किया कि भारत द्वारा अमेरिका के विविध आग्रहों या निर्णयों को चुपचाप मान लेने के बाद भी अमेरिकी प्रशासन हम से नाखुश क्यों है! उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। फिर रूस से भी तेल खरीदना बंद कर दिया, जब कि उस पर यहाँ विपक्षी दलों से भारी आलोचना सुननी पड़ी। आगे अमेरिका ने भारत पर भारी टैरिफ लगाया, तो उसे भी स्वीकार कर लिया। तब आखिर वह कौन सी कमी है जिस से यह‌ लगे कि भारत ‘अमेरिका के साथ सहयोग करने के लिए पर्याप्त काम नहीं कर रहा है?’

उन का प्रश्न बड़ा अनोखा था। समाचारों में यह नहीं आया कि इस प्रश्न पर उस अकादमिक विमर्श में उपस्थित अमेरिकी विशेषज्ञों ने क्या उत्तर दिया। या इस प्रश्न को ही उपेक्षित कर दिया। किन्तु यहाँ, देश में, भारतीय लोगों को जरूर इस पर सोचना चाहिए कि कहाँ गड़बड़ी है? यह भी कि क्या ऐसा पहली बार, या एक ही जगह हुआ, कि किसी भारतीय नीति या नेता को शाबासी या सम्मान नहीं मिला? इस पर विहंगम दृष्टि से देखने पर लगता है कि यह हिन्दू कमजोरी है।

भारत के मुस्लिम नेता इस से मुक्त रहे हैं। ऐसी उपेक्षा से भी, ऐसी आकांक्षा या लालसा से भी, और ऐसे दु:खी होने से भी। हमारे मुस्लिम नेता न तो ऐसा दु:ख प्रकट करते हैं कि देश या विदेश में उन्हें पर्याप्त बड़ाई नहीं मिल रही। न यह लालसा दिखाते हैं कि उन्हें माला पहनायी जाए, उन्हें तमगा मिले, उन की फोटो इस उस बड़े आदमी के साथ छपे, और न अपनी उपेक्षा का नोटिस लेते हैं। मतलब सार्वजनिक रूप से।

मनुष्य होने के कारण ऐसी इच्छाएं, भावनाएं मुस्लिम नेताओं में भी होनी स्वाभाविक हैं। किन्तु वे इन का प्रदर्शन नहीं करते। जो राजनीति में आवश्यक गुण जैसा है। क्योंकि आप की लालसा, या क्लेश को प्रतिद्वंदी राजनीतिक जान ले तो उसे आप को पीटने या इस्तेमाल करने, दोनों का एक रास्ता दिख जाता है।

सो, इस बिन्दु पर अनेक बड़े हिन्दू नेता भोले बच्चे जैसे रहे हैं।‌ आज से नहीं, गाँधीजी के समय से। डॉ. अम्बेडकर या सरदार पटेल की तरह राष्ट्रीय हिन्दू नेता बहुत कम हुए, जिन्हें इस बात की परवाह नहीं दिखी कि उन्हें अपने राजनीतिक कदमों पर क्या मिला या न मिला, किस ने उस की बड़ाई की, या मुँह बिचकाया।

जबकि गाँधी ने कई बार यह दुर्बलता साफ-साफ दिखायी थी। बल्कि यह भी कि वे खास तरह के बड़े या महत्वपूर्ण व्यक्ति के प्रति अपना व्यवहार भी उन्हें प्रसन्न करने के लिए उत्कंठित जैसा दिखा देते थे। एक तरह से यह स्वयं अपने को हीन कर लेने जैसा था, परन्तु गाँधीजी अपनी ओर से इसे कुछ और समझते थे। पर यह नहीं ध्यान दे पाए कि दूसरे लोग ऐसे व्यवहार को क्या समझ रहे हैं?

यह भी हिन्दू नेताओं की एक अन्य कमजोरी रही है, जो गाँधी जी से लेकर आज तक अनेक बड़े हिन्दू नेताओं में एक सी झलकती है। वह है: किसी स्थिति या अपने कदम को दूसरों की नजर से समझ सकने की अक्षमता। इस के प्रति निरी बेध्यानी। हिन्दू नेता हर चीज पर, अपनी भी हर अदा पर खुद फैसला देने, खुद मोहित होकर उत्फुल्ल होने या दुःखी होने की दुर्बलता दिखाता रहा है। यह आत्ममुग्धता राजनीति में भयंकर हानिकर है, क्योंकि नेता के कदम से लाखों करोड़ों जन प्रभावित हो सकते हैं। जबकि नेता अपने को ही सब कुछ माने बैठा है! मानो वह खुश, संतुष्ट हो गया, जीत गया तो उस की जनता भी जीत गई, खुश हो गई। या होनी ही चाहिए! यदि जनता का कोई हिस्सा, या नेता के सहयोगी, आदि खुश नहीं हुए तो जरूर उन में ही गड़बड़ी है। नेता तो उत्कृष्ट था और है।

ऐसी आत्मकेंद्रिकता यहाँ हिन्दू नेताओं में प्रायः देखी गई है। इसलिए भी वे देश-दुनिया, समाज, इतिहास या वर्तमान की अनेक महत्वपूर्ण बातों से भी चूक जाते रहे हैं, जिन से गंभीर परिणाम होते रहे हैं। जैसे, गाँधीजी के अनेक अभियान। विविध नेताओं के प्रति उन का व्यवहार। वह साफ-साफ गाँधीजी का भोलापन या दुर्बलता दर्शाता था। जिसे चतुर प्रतिद्वंद्वी मजे से देख लेते थे, पर खुद गाँधी भोली फूलो (यशपाल की कहानी ‘फूलो का कुर्ता’) की तरह अपनी स्थिति से अबोध रहते थे। यह बात बड़ी कठोर लग सकती है, परन्तु परीक्षणीय है। प्रमाणों से प्रमाणित या खंडित हो सकने योग्य है।

गाँधी जी तरह अनेक बड़े हिन्दू नेता अपनी कल्पना में ही अन्य नेता या संस्था की भावना, तथा देश, दुनिया, इतिहास आदि भी बैठे-बैठे तय किए रहे हैं। वरना, गाँधीजी का तेजतर्रार और वरिष्ठ जिन्ना जैसे नेता का सरपरस्त बनने की भंगिमा रखना; मौलाना मुहम्मद अली को ‘ईश्वर का सरल बालक’ कहना; या फासिस्ट हिटलर को प्रेमपूर्ण चिट्ठी लिखना; या ब्रिटिश प्रधानमंत्री को आत्मसमर्पण कर देने का उपदेश देना; बलात्कार से पीड़ित हो सकने वाली स्त्रियों को बलात्कार सहने की विधि बताना;  आदि असंख्य कामों और बयानों की कोई यथार्थ व्याख्या असंभव है! वैसे असंख्य ऊट-पटांग काम कोई हिन्दू नेता इसीलिए करता रहा क्योंकि वह उसे अपनी ही तरफ से पक्का सही माने बैठा था! उसे परवाह ही नहीं थी कि शेष नेता, जानकार लोग, प्रतिपक्षी, या पीड़ित उन सब को कैसे ले रहे हैं।

यह बचकानी भूल है। राजनीति में ऐसी भूल अक्षम्य है, क्यों कि इस से लाखों करोड़ों की गर्दन नप सकती है। भारत में नपी। पहले खलीफत आंदोलन, फिर देश विभाजन में, फिर एकतरफा सेक्यूलरिज्म में, फिर कश्मीर में आर्थिक पैकेज और ‘विकास’ से सब समस्याओं का समाधान कर लेने के ख्यालों में, आदि। यह सब शेखचिल्ली मंसूबे थे। पर हिन्दू नेता अपने अज्ञान और उदारता को सही नीति माने हुए जीने, और प्रतिकूल अनुभवों से कभी कुछ न सीखने के जिद्दी बने रहे हैं।

वही आज भी दिखता है। अन्यथा भाजपा नेता वह दु:ख नहीं व्यक्त करते। राजनीति किसी ठोस लीवर से चलती है, एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले। यदि किसी के पास ऐसा लीवर नहीं, तो उसे शान्ति से बैठना चाहिए। बड़े खिलाड़ियों के समकक्ष दिखने की उतावली में नहीं पड़ना चाहिए। क्यों भड़कीले,या अनोखे दिखावों से या ठकुरसुहाती से बड़े खेल नहीं चलते। हिन्दू नेताओं द्वारा अपनी बौद्धिक, चारित्रक दुर्बलताओं को किसी खास वेशभूषा, उपदेश, अप्रासंगिक कामों, और दार्शनिक लगने वाली भंगिमाओं से छिपाने या संतुलित करने की कोशिशें निष्फल रही हैं। रहनी ही हैं। पर वे इसे स्वीकार नहीं करना चाहते।

नतीजन और बड़ी-बड़ी बातें, और बड़े विचित्र काम करने की तलाश करते रहते हैं। या दूसरे बड़े, समर्थ, ताकतवर से दोस्ती जैसी गाँठ उस से अपनी चाह पूरी कराने का मंसूबा पालते हैं। पर जो एक चीज नहीं समझते: वह है वास्तविक आकलन कर यथार्थपरक लक्ष्य बनाना, तथा उस के लिए योग्यता व साहस रखना। यदि अपने में न हो, तो दूसरे को आगे लाना। वे यह भी नहीं समझते कि वैसी बचकानी भंगिमाओं से सामने का बलवान यथार्थवादी और खिन्न हो सकता है! कि यह कौन शेखचिल्ली गले पड़ने की कोशिश कर रहा है। समय खराब कर रहा है।

यही कारण है कि उसी अमेरिका का रूस और चीन के प्रति, अथवा डेनमार्क या म्यान्मार के प्रति भी वैसा रवैया नहीं दिखा है, जो यहाँ बार-बार देखना पड़ रहा है। पर भारत अपने अपमान का कारण देख नहीं पाता, क्यों कि वह देखना ही नहीं चाहता! हिन्दू चरित्र की दुर्बलता इस में आड़े आती है। नेता की भी, पब्लिक की भी। दोनों अपने ख्याली पुलाव को ही सब का प्रिय भोज्य मान कर इतराने, और भिन्न समझ वाले को हीन या गड़बड़ समझने के आदी रहे हैं। इसीलिए नहीं देख पाते कि हर महत्वपूर्ण देश भारत से केवल ‘ट्रेड डील’ की बात करता है। क्यों कि वह जानता है कि और हमारे पास कुछ है नहीं! बड़ी संख्या में लोग हैं, और प्राकृतिक संपदा है। इसलिए लेन-देन का व्यापार भारी मात्रा में हो सकता है। इतना वे करते भी हैं।

बाकी हमारे पास क्या है? हम देश के अंदर भी धंधे, गद्दी, तथा वैध लूट-पाट के सिवा और क्या कर रहे हैं? दिल्ली में बैठे राजदूत सालो भर तमाशा देखकर जो हमारा मूल्यांकन करते हैं, वह उन के देशों के शासकों की नीतियों में झलकता है। मगर बेचारा हिन्दू नेता! अपनी गद्दी और अपनी भंगिमाओं पर खुद मुग्ध रहने की लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हैं। फलत: समझता है कि हिटलर, चर्चिल से लेकर शी जिनपिंग और ट्रंप तक, सब उस से प्रभावित हैं! इसलिए हर किसी महत्वपूर्ण हस्ती को बिन माँगी सलाहें देने, या चित्र-विचित्र अदाओं, झूला झुलाने और ताली बजाने को अपना ‘लीवर’ समझता है। इस पर यदि पूतिन जैसे नेता मुस्कुरा कर चुप रहें, तो यह उन की सहृदयता है। अमेरिकी लोग सदैव थोड़े गँवार मुँहफट जैसे रहे हैं। सो वे कभी कुछ बोल देते हैं। उस पर क्या दु:खी होना!

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