भारत में अब किशोर ऐसे वर्षों से गुजरते हैं जिन्हें जीवन का सबसे जिज्ञासु और सबसे कल्पनाशील समय होना चाहिए। यही वह उम्र होती है जब मनुष्य खेलता है, पढ़ता है, संगीत सुनता है, बहस करता है, असफल होकर फिर उठता है और धीरे-धीरे स्वयं को पहचानता है। लेकिन प्रतियोगी परीक्षा की दुनिया इस पूरे कालखंड को एक ही लक्ष्य में समेट देती है—और वह है रैंक।… केंद्रीकृत परीक्षाएं अब प्रतिभा की निष्पक्ष कसौटी नहीं रह गई है। वह ऐसे जुए में बदलती जा रही है जिसमें प्रश्नपत्र भी खरीद-बिक्री की वस्तु बन चुके हैं।
जून 2026 में राजस्थान का कोटा फिर राष्ट्रीय समाचारों का केंद्र था। इस बार वजह किसी छात्र की सफलता नहीं थी। दशहरा मैदान में हजारों छात्र जमा हुए थे, लेकिन यह किसी विजय का उत्सव नहीं था। यह टूटे हुए विश्वास का सार्वजनिक शोक था। वर्षों तक एक ही परीक्षा के भरोसे अपना वर्तमान टाल देने वाली पीढ़ी पहली बार खुलकर पूछ रही थी कि क्या उसके साथ छल हुआ है।
नीट परीक्षा, जो लाखों युवाओं के लिए डॉक्टर बनने का सबसे बड़ा द्वार बन चुकी है, लगातार पेपर लीक की घटनाओं के बाद अपनी विश्वसनीयता लगभग खो चुकी थी। परीक्षा रद्द हुई तो केवल एक प्रश्नपत्र नहीं टूटा। उस भरोसे की अंतिम डोर भी टूट गई जिस पर भारत की पूरी प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था खड़ी थी। इसी पृष्ठभूमि में आयोजित “छात्रों की गूंज” रैली में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने वह बात कही जिसे देश के लाखों परिवार पहले ही अपने अनुभव से समझ चुके थे। भारत की केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था अब प्रतिभा की निष्पक्ष कसौटी नहीं रह गई है। वह ऐसे जुए में बदलती जा रही है जिसमें प्रश्नपत्र भी खरीद-बिक्री की वस्तु बन चुके हैं।
लेकिन यदि इस संकट को केवल पेपर लीक, भ्रष्टाचार या आपराधिक गिरोहों की कहानी माना जाए तो हम बीमारी नहीं, उसके लक्षण देख रहे होंगे। असली बीमारी कहीं अधिक गहरी है। भारत ने धीरे-धीरे अपनी शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एक समानांतर उद्योग के हवाले कर दिया है। पेपर लीक केवल उस दरार का दिखाई देने वाला हिस्सा है। दरार का नाम है—कोचिंग उद्योग।
भारत में किशोरावस्था का बड़ा हिस्सा अब कुछ अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द कैद हो चुका है। उच्च शिक्षा की सीटें सीमित हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं। अवसर सीमित हैं। प्रतियोगी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कोचिंग उद्योग इस कमी को दूर नहीं करता। वह उसी कमी पर खड़ा है और उसी से अपनी शक्ति प्राप्त करता है।
अकेले नीट में हर वर्ष बीस लाख से अधिक विद्यार्थी बैठते हैं, जबकि मेडिकल सीटें लगभग एक लाख हैं। सरकारी नौकरियों की परीक्षाएँ इस दौड़ में करोड़ों युवाओं को और जोड़ देती हैं। परिणाम यह है कि भारत ने एक विशाल छाया अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली है, जो परिवारों से हजारों करोड़ रुपये लेकर उन्हें केवल संभावना बेचती है। यह उद्योग शिक्षा व्यवस्था का पूरक नहीं है। यह उसकी विफलता का सबसे बड़ा लाभार्थी है।
सबसे बड़ा नुकसान आर्थिक भी नहीं है। वह बौद्धिक है।
एक स्वस्थ शिक्षा व्यवस्था मनुष्य को भाषा, विज्ञान, इतिहास, गणित, साहित्य, कला, खेल, तर्क, नैतिक विवेक और जिज्ञासा—इन सबका संतुलन देती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, मनुष्य का निर्माण भी होता है। लेकिन जब एक ही परीक्षा जीवन का भविष्य तय करने लगती है, तब पूरी शिक्षा उसी परीक्षा की तैयारी में बदल जाती है। पाठ्यक्रम कागज पर रहता है। वास्तविक पाठ्यक्रम प्रश्नपत्र बन जाता है।
कोटा, दिल्ली, जनकपुरी, हैदराबाद, पटना और देश के अनेक शहरों में फैली कोचिंग फैक्टरियाँ इसी नए पाठ्यक्रम का उत्पादन करती हैं। ज्ञान को समझने योग्य संसार नहीं, बल्कि हल करने योग्य पैटर्न बना दिया जाता है। अवधारणाएँ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होतीं कि वे दुनिया को समझाती हैं। वे इसलिए महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि उनके प्रश्न आने की संभावना अधिक होती है। विद्यार्थी यह नहीं सीखता कि विज्ञान कैसे सोचता है। वह सीखता है कि परीक्षक कैसे सोचता है।
इसीलिए आज डमी स्कूलों का पूरा संसार खड़ा हो गया है। विद्यार्थी का नाम विद्यालय में दर्ज रहता है, लेकिन उसका वास्तविक जीवन कोचिंग सेंटर में बीतता है। विद्यालय औपचारिकता बन जाता है। शिक्षा कहीं और चली जाती है। धीरे-धीरे समाज ने भी इसे सामान्य मान लिया है।
यहीं से सबसे बड़ा ज्ञानात्मक संकट जन्म लेता है। वास्तविक शिक्षा केवल जानकारी नहीं देती। वह जिज्ञासा पैदा करती है। वह ऐसे प्रश्न पूछने का साहस देती है जिनका उत्तर पाठ्यक्रम में नहीं होता। वह गलती करने देती है, भटकने देती है, नई रुचियाँ खोजने देती है और विस्मय को जीवित रखती है। कोचिंग मॉडल के लिए यह सब समय की बर्बादी है। यदि कोई विचार कुछ सेकंड में हल होने वाले प्रश्न में नहीं बदल सकता, तो वह उपयोगी नहीं माना जाता। धीरे-धीरे विद्यार्थी की मानसिक दुनिया परीक्षा के आकार की हो जाती है। उसकी कल्पना नहीं बढ़ती, केवल उसकी रणनीति तेज होती जाती है।
यही भारत का सबसे बड़ा ज्ञानात्मक संकट है। हम अपने युवाओं को शिक्षित नहीं कर रहे। हम उन्हें परीक्षाओं के लिए अनुकूलित कर रहे हैं।
यहीं से प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं रह जाता। वह राज्य की प्रकृति का प्रश्न बन जाता है।
इक्कीसवीं सदी में किसी राष्ट्र की शक्ति केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि वह अपने सबसे मेधावी विद्यार्थियों का चयन कितनी दक्षता से करता है। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होगा कि वह अपने पूरे समाज की सीखने की क्षमता कितनी विकसित करता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के युग में वही राष्ट्र आगे बढ़ेंगे जो अपने नागरिकों को जीवन भर सीखना, भूलना और फिर से सीखना सिखाएँगे।
यहीं एक शिक्षण राज्य और परीक्षण राज्य के बीच का अंतर स्पष्ट होता है।
शिक्षण राज्य अपने विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और सार्वजनिक संस्थानों को इस प्रकार संगठित करता है कि वे जिज्ञासा, प्रयोग, नवाचार और ज्ञान निर्माण को लगातार बढ़ाते रहें। परीक्षा उसके लिए शिक्षा का अंतिम उद्देश्य नहीं होती। वह सीखने की प्रक्रिया का केवल एक साधन होती है।
इसके विपरीत, परीक्षण राज्य का सबसे बड़ा उद्देश्य प्रतिभा का विकास नहीं, उसकी छनाई होता है। वह नागरिकों से यह नहीं पूछता कि वे क्या समझते हैं। वह यह पूछता है कि वे कितनों को पीछे छोड़ सकते हैं। वह जिज्ञासा से अधिक रैंकिंग को महत्व देता है, समझ से अधिक अंक को और सीखने से अधिक चयन को।
दुर्भाग्य से भारत धीरे-धीरे इसी दूसरी दिशा में बढ़ता दिखाई देता है। मेडिकल कॉलेज में प्रवेश चाहिए तो परीक्षा। इंजीनियरिंग चाहिए तो परीक्षा। विश्वविद्यालय चाहिए तो परीक्षा। सरकारी नौकरी चाहिए तो परीक्षा। छात्रवृत्ति चाहिए तो परीक्षा। मानो पूरा समाज इस निष्कर्ष पर पहुँच चुका हो कि मनुष्य की योग्यता का सबसे विश्वसनीय प्रमाण वही है जो कुछ घंटों की परीक्षा में अंक के रूप में दर्ज हो सके।
यही वह मोड़ है जहाँ भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न खड़ा होता है। क्या हम एक सीखने वाला राष्ट्र बना रहे हैं या केवल एक परीक्षा देने वाला राष्ट्र? यदि शिक्षा का पूरा उद्देश्य केवल चयन रह जाएगा, तो हम प्रतिभा को विकसित नहीं करेंगे। हम केवल उसे छाँटेंगे। और जो राष्ट्र केवल प्रतिभा की छनाई करते हैं, वे अंततः उन राष्ट्रों से पीछे रह जाते हैं जो प्रतिभा का निर्माण करते हैं।
उम्मीद का सबसे महँगा बाज़ार
इस परीक्षा आधारित व्यवस्था ने केवल शिक्षा को नहीं बदला। इसने भारत की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को बदल दिया है।
आज कोचिंग उद्योग देश की सबसे बड़ी समानांतर अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हर वर्ष लाखों परिवार अपनी बचत, जमीन, आभूषण, भविष्य निधि और कभी-कभी पूरा भविष्य इस विश्वास पर दाँव पर लगा देते हैं कि कोचिंग उनके बच्चे को उस संकरी खिड़की तक पहुँचा देगी जिसके दूसरी ओर सुरक्षित जीवन दिखाई देता है। यह केवल फीस का भुगतान नहीं है। यह भारतीय परिवारों द्वारा भय के विरुद्ध किया गया निवेश है।
किसी भी बड़े कोचिंग नगर में सुबह निकल जाइए। सड़कें स्कूल की घंटियों से नहीं, बैचों के समय से चलती दिखाई देंगी। हॉस्टलों के बाहर माता-पिता बच्चों को छोड़ते हैं। किराये के कमरों में चार-चार विद्यार्थी रहते हैं। दीवारों पर रैंक और चयन की सूची चिपकी रहती है। चाय की दुकानों पर अगली परीक्षा की चर्चा होती है। पुस्तक विक्रेताओं की अलमारियों में साहित्य या इतिहास नहीं, टेस्ट सीरीज़ और प्रश्न बैंक सबसे आगे रखे दिखाई देते हैं। पूरा शहर शिक्षा का नहीं, चयन का उद्योग बन जाता है।
इस उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी समृद्धि सफलता पर नहीं, असफलता की आशंका पर टिकी है। जितना अधिक परिवारों को यह विश्वास होता है कि सामान्य विद्यालय पर्याप्त नहीं हैं, उतना अधिक कोचिंग उद्योग बढ़ता है। जितनी कठिन प्रतियोगिता दिखाई देती है, उतनी अधिक फीस स्वीकार्य हो जाती है। प्रश्नपत्र लीक हों या भर्ती परीक्षाएँ वर्षों तक अटक जाएँ, अंततः भय ही इस उद्योग का सबसे बड़ा बाज़ार बन जाता है।
यहीं भारत का सबसे बड़ा आर्थिक विरोधाभास भी दिखाई देता है। एक ओर सरकारें विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और अनुसंधान संस्थानों में निवेश बढ़ाने की बात करती हैं। दूसरी ओर समाज का विशाल निजी निवेश समानांतर रूप से कोचिंग उद्योग में बहता रहता है। जिस धन से बेहतर विश्वविद्यालय, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, शोध छात्रवृत्तियाँ और कौशल संस्थान खड़े हो सकते थे, उसका बड़ा हिस्सा सीमित अवसरों की दौड़ में खर्च हो जाता है। समाज सीखने पर कम और चयन पर अधिक निवेश करने लगता है।
यहीं से मेरिट की अवधारणा भी बदलने लगती है। योग्यता अब केवल प्रतिभा और परिश्रम का परिणाम नहीं रह जाती। उसके साथ कोचिंग की गुणवत्ता, आर्थिक क्षमता, भौगोलिक पहुँच और कभी-कभी भ्रष्टाचार भी जुड़ जाता है। जब प्रश्नपत्र लीक हो जाएँ, भर्ती परीक्षाएँ रद्द हों या उत्तर कुंजियाँ पहले से घूमने लगें, तब सबसे बड़ी क्षति किसी एक परीक्षा की नहीं होती। सबसे बड़ी क्षति उस विश्वास की होती है कि ईमानदार मेहनत अंततः पर्याप्त होगी।
लेकिन इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत रुपये में नहीं चुकाई जाती। वह बचपन में चुकाई जाती है।
भारत में आज लाखों किशोर ऐसे वर्षों से गुजरते हैं जिन्हें जीवन का सबसे जिज्ञासु और सबसे कल्पनाशील समय होना चाहिए। यही वह उम्र होती है जब मनुष्य खेलता है, पढ़ता है, संगीत सुनता है, बहस करता है, असफल होकर फिर उठता है और धीरे-धीरे स्वयं को पहचानता है। प्रतियोगी परीक्षा की दुनिया इस पूरे कालखंड को एक ही लक्ष्य में समेट देती है—रैंक।
धीरे-धीरे जीवन की हर गतिविधि उसी कसौटी पर मापी जाने लगती है। खेल समय की बर्बादी बन जाता है। मित्रता तैयारी के बाद की चीज़ बन जाती है। संगीत और साहित्य अपराधबोध पैदा करने लगते हैं। जिज्ञासा भी तभी उपयोगी मानी जाती है जब उसका उत्तर अगले टेस्ट में पूछा जा सके।
कोचिंग व्यवस्था का अनुशासन असाधारण है। विद्यार्थी कठिन परिश्रम करते हैं, त्याग करते हैं और अपने परिवारों की अपेक्षाओं का भार उठाते हैं। समस्या उनकी मेहनत नहीं है। समस्या यह है कि पूरी व्यवस्था उस मेहनत को लगभग एक ही दिशा में मोड़ देती है। यदि कोई विचार चार विकल्पों वाले प्रश्न में नहीं बदल सकता, तो वह धीरे-धीरे महत्वहीन हो जाता है। खोज की जगह पुनरावृत्ति ले लेती है। जिज्ञासा की जगह रणनीति।
यही कारण है कि कोटा केवल एक शहर नहीं रह गया। वह भारत की परीक्षा संस्कृति का प्रतीक बन गया है। वहाँ हर वर्ष हजारों विद्यार्थी अपने साथ केवल किताबें नहीं लाते। वे अपने परिवारों की आशाएँ, वर्षों की बचत और भविष्य का दबाव भी लेकर आते हैं। अधिकांश संघर्ष करते हैं। कुछ सफल होते हैं। बहुत बड़ी संख्या लौट जाती है। और कुछ लौट ही नहीं पाते।
जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाए, परीक्षा रद्द हो जाए या प्रशासनिक विफलता वर्षों की तैयारी को एक झटके में मिटा दे, तब विद्यार्थी केवल एक अवसर नहीं खोता। वह व्यवस्था पर अपना विश्वास भी खो देता है। यही सबसे बड़ी राष्ट्रीय क्षति है।
वास्तविक जीवन कभी चार विकल्पों में उत्तर नहीं देता। वह नैतिक निर्णय, कल्पनाशक्ति, सहयोग, संवाद और अनिश्चित परिस्थितियों में समाधान खोजने की क्षमता माँगता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में यही क्षमताएँ सबसे अधिक मूल्यवान होंगी। विडंबना यह है कि हमारी सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाएँ इन्हें लगभग मापती ही नहीं हैं।
यही कारण है कि कोटा की चेतावनी किसी एक शहर की चेतावनी नहीं है। वह भारत के भविष्य की चेतावनी है।
भारत के सामने आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि अगला प्रश्नपत्र कैसे सुरक्षित रखा जाए। मूल प्रश्न यह है कि क्या हम शिक्षा को फिर से सीखने की प्रक्रिया बनाएँगे या उसे हमेशा चयन की मशीन बनाए रखेंगे। क्या हम अवसरों का विस्तार करेंगे या केवल प्रतियोगिता को और कठोर बनाएँगे। क्या हम रैंक बढ़ाएँगे या जिज्ञासा।
हर सभ्यता अपनी सबसे बड़ी पूँजी अगली पीढ़ी के रूप में प्राप्त करती है। बच्चे केवल परिवारों की जिम्मेदारी नहीं होते। वे राष्ट्र की बौद्धिक पूँजी होते हैं। भारत आज उसी पूँजी का सबसे अधिक अपव्यय कर रहा है। वह जिज्ञासा के बदले रैंक, कल्पना के बदले ट्रिक्स, खोज के बदले मॉड्यूल और शिक्षा के बदले छनाई को महत्व दे रहा है।
राष्ट्र अनेक भूलों से उबर जाते हैं। वे आर्थिक संकटों, राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक विफलताओं से भी उबर सकते हैं। लेकिन कोई भी गणराज्य अपनी अगली पीढ़ी की कल्पनाशक्ति को लगातार सिकोड़कर बहुत दूर तक नहीं जा सकता।
यदि भारत ने अपने बच्चों को सीखने से अधिक गलती से डरना सिखा दिया, तो संभव है कि आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी परीक्षा किसी छात्र ने नहीं, स्वयं गणराज्य ने हार दी हो।
