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ट्रंप के आगे आखिर क्यों ऐसा समर्पण?

बात सिर्फ व्यापार समझौते भर की नहीं है। मुद्दा उससे कहीं बड़ा है। मार्क कार्नी ने दावोस में कहा था कि दुनिया में इस वक्त जो हो रहा है, वह साधारण संक्रमण (transition) नहीं, बल्कि नियम आधारितदुनिया में rupture है। यानी अमेरिका केंद्रित एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था टूट-फूट गई है। तो अब चुनौती नई विश्व व्यवस्था को निर्मित करने और इसके लिए हो रहे प्रयासों के अनुरूप खुद को तैयार करने की है।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सार्वजनिक आरोप लगाया कि व्यापार वार्ता में ट्रंप प्रशासन की शर्तों के आगे भारत सरकार इसलिए झुक गई, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी compromised हैं। यहां compromised शब्द का अर्थ यही समझा जाएगा कि मोदी ने कुछ ऐसा अनुचित किया हो, जिसके साक्ष्य अमेरिका के पास हैं और जिसके आधार पर वह प्रधानमंत्री को ब्लैकमेल करने की स्थिति में हो। राहुल गांधी ने दो बातों का जिक्र किया। कहा कि अडानी पर अमेरिका में चल रहा केस भाजपा के वित्तीय ढांचे पर हमला है। और एप्सस्टीन फाइलों में मोदी का उससे अधिक जिक्र है, जितना अभी सामने आया है। (https://x.com/priyankagandhi/status/2018625654946717894?s=20)

ये विपक्ष के नेता के इल्जाम हैं। इस बारे में सारी जवाबदेही उनकी ही बनती है। मगर इस लेख की शुरुआत इसके उल्लेख से इसलिए की गई है, क्योंकि इससे अमेरिका से हुए (या हो रहे) व्यापार समझौते के बारे में भारतीय जनमत के एक बड़े हिस्से में बनी राय और उससे संबंधित रहस्य का अंदाजा लगता है। डॉनल्ड ट्रंप ने अचानक जिस तरह मोदी से बात करने के बाद समझौते का एलान किया, वह अपने-आप में चौंकाने वाला था। समझौते में शामिल जिन शर्तों का उन्होंने जिक्र किया, उससे और अधिक बेचैनी फैली। अगर समझौते में सचमुच वो शर्तें शामिल हैं, तो यह बहुत से लोग राहुल गांधी के इस आरोप से सहमत होंगे कि मोदी सरकार ने इसके जरिए देश को ‘बेच’ दिया है।

क्यों- इसे समझने के लिए इन बिंदुओं पर गौर कीजिएः

पूछा जा सकता है कि भारत के सामने इसके अलावा चारा क्या है? क्या अपने श्रम-केंद्रित उद्योगों के हाथ से अमेरिका का महत्त्वपूर्ण बाजार निकल जाने दिया जाए? और इस तरह देश में बड़ी संख्या में उद्योग धंधों को बंद होने और कर्मचारियों को बेरोजगार होने के लिए छोड़ दिया जाए? ये महत्त्वपूर्ण सवाल हैं।

मगर इनके बरक्स ये सवाल भी उतने ही अहम हैं- क्या निर्यात का अमेरिकी बाजार बचाने के चक्कर में कृषि आधारित जन-समुदायों की तबाही को आमंत्रित किया जाए? क्या अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ शून्य कर राजकोषीय घाटा एवं सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ाए जाए, जिसकी मार अंततः सभी तबकों पर- और साथ-साथ भावी पीढ़ी पर भी- पड़ेगी? बाजार के तर्क के बजाय अमेरिका से समझौते की शर्त पर अमेरिकी उत्पादों की खरीदारी का भी यही परिणाम होगा, अतः उपरोक्त प्रश्न इससे भी जुड़ा हुआ है। और फिर प्रश्न यह भी है कि अमेरिकी बाजार की चिंता में क्या भारत को अपने संप्रभु निर्णय से जुड़े पहलुओं पर भी घुटने टेक देने चाहिए?

इतिहास में ऐसे मुकाम आते हैं, जब देशों को इस तरह के कठिन अंतर्विरोधी प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। उसी समय नेतत्व क्षमता, अंतर्दृष्टि, एवं विश्व-दृष्टि की परीक्षा होती है। हम ऐसे समय में हैं, जब वैश्विक परिस्थितियां मूलभूत रूप से बदल रही हैं। जब अमेरिका केंद्रित एक-ध्रुवीय व्यवस्था चरमरा रही है। यह बात अब सिर्फ अकादमिक या बौद्धिक विमर्श का हिस्सा नहीं रही। राजनेता खुले मंचों पर यह बात दो टूक कह रहे हैं। पिछले महीने इस बदलाव की सु-स्पष्ट व्याख्या कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम के दौरान की। कार्नी ने कहा,

“दूसरे विश्व युद्ध के बाद की नियम आधारित व्यवस्था खत्म हो चुकी है। मध्यम दर्जे की शक्ति माने जाने वाले देशों को बड़ी ताकतों की जोर-जबरदस्ती से बचने के लिए एकजुट होना चाहिए।” (Canada PM Mark Carney’s Davos speech goes viral, draws global attention and praise। See reactions)

ऐसा लगा कि कार्नी के भाषण ने दावोस में मौजूद अनेक शख्सियतों के अंतर्मन को छू लिया है। इसलिए कि कार्नी ने उस हकीकत को बयान किया, जो हम सबकी आंखों के सामने आकार ले रही है। नई हकीकत के बीच देश क्या कर सकते हैं, इसकी एक मिसाल भी कार्नी ने पेश की, जब उन्होंने चीन से अपने देश के पुराने गहरे दुराव को भुलाते हुए बीजिंग यात्रा की। इसीलिए उनके भाषण और उनकी चीन यात्रा ने ट्रंप और उनके अधिकारियों को अति विचलित किया।

लेकिन उन्हें विचलित करने वाली यह अकेली घटना नहीं थी। दरअसल, इस वर्ष चीन यात्रा करने वाले पश्चिमी नेताओं की कतार लगी हुई है। (https://www.cnbc.com/2026/01/30/china-beijing-trade-tariffs-trump-starmer-carney।html) उनमें एक और अहम यात्रा ब्रिटिश प्रधानमंत्र कियर स्टार्मर की है। स्टार्मर ने बीजिंग पहुंचने के पहले लंदन में चीन के नए दूतावास निर्माण को हरी झंडी दे दी, जो लंबे समय विवाद का मुद्दा था। ऐसी तमाम यात्राओं को ट्रंप के लिए झटका समझा गया है।

पश्चिमी नेताओं की यात्राओं की वजह चीन के लिए सद्भाव या नया पैदा हुआ प्रशंसा भाव नहीं है। बल्कि इसके पीछे यह धारणा है कि दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है और उसके बीच जब पश्चिमी खेमे का नेता (अमेरिका) खुद आत्म-केंद्रित हो गया है, तो मध्यम या छोटी ताकतों के पास यही माकूल विकल्प है कि वे नए हालात के मुताबिक नए समीकरण एवं संबंध बनाएं।

(https://chinadailybrief.com/article/697eb14deab9f99c50e03d78)।

इसका ही एक परिणाम भारत के साथ यूरोपियन यूनियन (ईयू) का मुक्त व्यापार समझौता है। इस करार के लिए 2007 से शुरू हुई वार्ता अगर अब ईयू की प्राथमिकता बनी, तो उसका कारण दुनिया के बदले हालात ही हैं। यही बात कुछ समय पहले ब्रिटेन से हुए भारत के मुक्त व्यापार समझौते पर भी लागू होती है। इन समझौतों से भारत को नए अवसर मिले हैं। अपेक्षित यह था कि मोदी सरकार अमेरिका से व्यापार वार्ता में उसका इस्तेमाल बेहतर सौदेबाजी के लिए करती। लेकिन जो हुआ, उसे मौका गंवाना ही कहा जाएगा।

इस बीच तमाम दुनिया यह देख रही है कि आत्म-केंद्रित होने, अपने हित में बनाए अंतरराष्ट्रीय नियमों को खुद तिलांजलि देने, अपने सॉफ्ट पॉवर की बिल्कुल चिंता ना करने, और द्विपक्षीय रिश्तों में तमाम किस्म की जोर-जबरदस्ती करने के बावजूद ‘अमेरिका को फिर से महान’ बनाने की ट्रंप की नीतियां कामयाब नहीं हो रही हैं।

उपरोक्त स्थितियों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि इस वक्त पर कामयाबियां दिखाना ट्रंप की मजबूरी है। ऐसा करने का एक मौका उन्हें भारत से हुए ट्रेड डील से मिला।

बहरहाल, जब देश और विदेश दोनों मोर्चों पर उनकी नाकामियों की सूची लंबी होती जा रही है, तो अन्य देश उनके प्रशासन से बेहतर सौदेबाजी करने की स्थिति में हैं। अपेक्षित था कि भारत का राजनीतिक नेतृत्व से ऐसे कौशल और समझदारी का परिचय देता। मगर बात उसके विपरीत होती नजर आई है, तो यह स्वाभाविक है कि लोग उसकी वजहों पर सवाल उठाएंगे। लोग पूछेंगे कि भारतीय नेतृत्व ने अपने लिए अनुकूल स्थितियों का लाभ क्यों नहीं उठाया?

और फिर बात सिर्फ व्यापार समझौते भर की नहीं है। मुद्दा उससे कहीं बड़ा है। मार्क कार्नी ने दावोस में कहा था कि दुनिया में इस वक्त जो हो रहा है, वह साधारण संक्रमण (transition) नहीं, बल्कि ‘नियम आधारित’ दुनिया में rupture है। यानी अमेरिका केंद्रित एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था टूट-फूट गई है। तो अब चुनौती नई विश्व व्यवस्था को निर्मित करने और इसके लिए हो रहे प्रयासों के अनुरूप खुद को तैयार करने की है।

हमें नहीं मालूम कि मोदी सरकार के सिद्धांतकार और प्रमुख कर्ता-धर्ता इस आकलन से सहमत हैं या नहीं? मुमकिन है कि उन्हें अभी भी लगता हो कि अमेरिका सर्वोपरि है, जिसके गुड बुक में बने रहना भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। संभव है कि इसीलिए उन्होंने ट्रंप की शर्तों के मुताबिक व्यापार समझौता करने को तरजीह दी हो। मगर उस हाल में उनकी समझ को चुनौती देने की जरूरत होगी। यह कहा जाएगा कि सरकार की ये समझ भारत के लिए बेहद हानिकारक है। बहरहाल, ऐसी समझ ना होने के बावजूद अगर अमेरिका से ऐसा ट्रेड डील किया गया है, तो फिर उसे रहस्यमय ही माना जाएगा। जाहिर है, तब इसके कारणों को लेकर लोग कयास लगाएंगे।

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