‘दिमागी नक्सल को आइसोलेट‘ करने और ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ — यह दोनों नारे एक ही बात के दो रूप हैं। दोनों में भिन्न मत नागरिकों की वैचारिक अधिकार ठुकराने की घोषणा है। आखिर, चुनाव में मतदाताओं द्वारा वोट देना एक वैधानिक कार्य है। पर पहला नारा नागरिकों द्वारा कांग्रेस को वोट देना बंद कराने का आहवान था।… यह सब संघ-परिवार की राजनीतिक मूल्यांकन के लिए बेहद नकारात्मक तथ्य है। क्योंकि यह दिखाता है कि उन में बेहतर विकल्प होने की योग्यता नहीं थी। वे केवल दलीय हित जानते हैं। उन की देश हित की समझ माशाअल्लाह है।
‘दिमागी नक्सल’ को दूर हटाने (‘आइसोलेट’ करने) का नारा उसी स्त्रोत से आया है, जिस से ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ आया था। अर्थात् संघ परिवार के एक सब से सफल नेता के दिमाग से। अतः दोनों नारे एक ही मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह मानसिकता है — एकाधिकार, तथा इस के लिए दूसरों के राजनीतिक विश्वास और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को खत्म करने की।
अभी ‘दिमागी नक्सल’ किन्हें कहा गया? इसे जैसे भी परिभाषित करें, पर यह केवल वैचारिक मामला है। कुछ लोगों की वैचारिकता को हटाने का शासकीय पद से ऐसा आहवान वैचारिक दमन का आहवान हो जाता है। जबकि भारतीय संविधान में नागरिकों को अपने विश्वास और अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मूल अधिकार है। क्या शासक नेता यह भूल गये, या इस की परवाह नहीं?
संविधान के अनुसार एक नागरिक द्वारा किसी भी वाद — समाजवाद, इस्लामवाद, नक्सलवाद, हिन्दूवाद, चर्चवाद, आरक्षणवाद, दलितवाद, आदि — का समर्थन और उस का प्रचार करना अपराध नहीं है। फिर वामपंथी तो दल के रूप में आज वैसे भी नगण्य हैं। इस प्रकार, यह आह्वान भिन्न विचार वाले नागरिकों के विरुद्ध है। अतः न केवल अनुचित बल्कि असंवैधानिक भी है।
इस की परख इस से भी होती है कि ‘दिमागी नक्सल को आइसोलेट’ करने और ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ — यह दोनों नारे एक ही बात के दो रूप हैं। दोनों में भिन्न मत नागरिकों की वैचारिक अधिकार ठुकराने की घोषणा है। आखिर, चुनाव में मतदाताओं द्वारा वोट देना एक वैधानिक कार्य है। पर पहला नारा नागरिकों द्वारा कांग्रेस को वोट देना बंद कराने का आहवान था। वरना, ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ कैसे बनेगा? यदि लोग कांग्रेस को वोट देते रहेंगे तब तो भारत कांग्रेस से मुक्त नहीं हो सकता।
यदि उस नारे की यह व्याख्या गलत लगे, तो किसी कांग्रेसी उम्मीदवार या उन के समर्थक मतदाताओं की नजर से देखें। तब उस नारे की धृष्टता एवं असंवैधानिकता साफ दिखेगी। खास तौर से और भी, जब ध्यान दें कि किस पद से वैसा आहवान किया गया। जब शासक किसी को ‘हटाने’ (दिमागी नक्सल) या खत्म करने (कांग्रेस) का आहवान करे, तो उस के मातहत अफसर, रक्षा बल, आदि को क्या संदेश मिलेगा?
अतः किसी आम भाजपा कार्यकर्ता या नेता द्वारा जो बात उस का विश्वास और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता है — वही किसी संवैधानिक पदधारी द्वारा कहना अनुचित है! क्योंकि सरकार की कार्यपालिका के मंत्री ‘बिना भेदभाव के सभी नागरिकों के प्रति’ शासकीय कर्तव्य से बँधे हैं।
इसलिए, किसी शासकीय पद से उन दोनों आहवानों का चरित्र असंवैधानिक है। चाहे कोई कैसी भी सफाई दे। इस का एक प्रमाण यह भी है कि वह पहला आहवान गत छ: वर्षों से गुम हो गया है। वह नारा देने वाले शासक नेता अब उसे नहीं दुहराते। क्या भारत ‘कांग्रेस-मुक्त’ हो गया? यदि नहीं, तो उस नारे का लोप क्यों हुआ?
यदि नारा उपयुक्त था, तो इसे उसी मनोबल और विश्वास से तब तक दुहराना था, जब तक लक्ष्य पूरा न हो। यदि बिना लक्ष्य पूरा हुए नारा छोड़ दिया गया — तब या तो नारा गलत था, अथवा वह नारा देने वाले को भी अनुचित प्रतीत हुआ। दोनों हाल में वैसा आहवान-कर्ता की कोई जिम्मेवारी बनती है। पर चूँकि जिम्मेदारी का वह हिसाब नहीं लिया गया — न संसद, न न्यायपालिका ने उस असंवैधानिक वक्तव्य का नोटिस लिया — सो वही नेता उसी मिजाज में, अब ‘दिमागी नक्सल’ को दूर हटाने का आहवान कर रहे हैं। भावना वही है: जो हमारी पार्टी का समर्थन न करे, उसे समाज से दूर करो!
एक अर्थ में, ‘दिमागी नक्सल’ को दूर हटाने का आहवान और साफ दिखाता है कि संघ-भाजपा नेता को वैचारिक भिन्नता भी असह्य है। शासक पद से यह आहवान नागरिकों के एक वर्ग की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर चोट है। चूँकि यह शब्द अपरिभाषित रूप में दिया गया, अतः व्यवहार में जिस किसी को ‘दिमागी नक्सल’ कह कर उसे ‘आइसोलेट’ करने का काम किया जाएगा!
यद्यपि वह काम — आलोचकों को ‘आइसोलेट’ करना — एक तरह से अनेक वर्षों से चल ही रहा है! आखिर जिस किसी को ‘राष्ट्र-द्रोही’, ‘मिशनरी एजेंट’, ‘आइसिस एजेंट’, इटली की ‘जर्सी गाय’, ‘वर्णसंकर बछड़ा’, ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’ वाला, किन्हीं राज्य के लोगों के ‘डीएनए में खराबी’, आदि आदि कहना और क्या था? यह सब कटु शब्द संबंधित लोगों को हीन कह कर ‘आइसोलेट’ करना ही था। अनेक लोग आइसोलेट हुए भी!
उन आइसोलेटेड लोगों में वैसे समर्थक भी थे, जो सत्ताधारियों के किसी विशेष काम के आलोचक थे। पर वे भी नामंजूर, दंडनीय। आखिर किसी को ‘बिका हुआ’ या ‘लोभी’ बताकर चरित्र-हनन करना भी उसे दंड देना ही है! वह भी नाहक। पर असहमति बर्दाश्त न करने की मानसिकता में अपने समर्थकों को भी प्रताड़ित किया गया। इस मामले में संघ-परिवार अन्य दलों की तुलना में अधिक संकीर्ण साबित हुआ है। शासकीय जिम्मेदारी सँभालने के बाद यह मानसिकता और बढ़ी दिखी है।
अतः यह भी चिन्तनीय है कि किसी अवांछित को ‘आइसोलेट’ करने के बाद अगला कदम क्या होता, या हो सकता है? उसे बंदी बनाना, झूठे मुकदमों से सताना, पागलखाने में डाल देना, या खत्म ही कर देना। इन सब विकल्पों का प्रयोग केवल सत्ताधारी की मति, शक्ति और संबंधित राजनीतिक व्यवस्था की कानूनी सीमाओं पर निर्भर है। खुली तानाशाही सत्ताओं में तो यह जमा हुआ तरीका है। सोवियत संघ में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जोरेस मेदवेदेव को मेंटल हॉस्पिटल में डाल दिया गया था। वह शासक द्वारा असुविधाजनक व्यक्तियों को आइसोलेट करने का ही एक उपाय था।
किन्तु लोकतंत्र में भी यदि शासक दल या नेता एकाधिकारी मानसिकता के हों, तो लोगों पर नाहक चोट के कई रास्ते रहते है। कागजी संविधान अंततः शासकों की मति अनुसार ही अर्थ रखते हैं। कागजी शब्दों में अपने-आप कोई शक्ति नहीं होती।
उपर्युक्त बातें इसलिए अधिक चिन्ताजनक हैं, क्योंकि संघ परिवार सदैव विवेक-विचार विरोधी रहा है। यह बात उस के अपने जानकार भी कहते हैं। अतः उस के शासक नेता द्वारा भी बार-बार ऐसे नारे आना उस परंपरा की भी देन है। यह संगठित विवेकहीनता है कि संघ-परिवार में किसी को ऐसे नारे आपत्तिजनक नहीं लगे — जो प्रथम दृष्टि में ही अनुचित और असंवैधानिक है। अनावश्यक और प्रतिकूल फलदायी तो है ही।
आखिर, प्रतिकूल फलदायी नहीं था तो ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा छोड़ क्यों दिया गया? उसी तरह, ‘दिमागी नक्सल को आइसोलेट’ करने के नारे पर फौरन किसी नेता को सफाई क्यों देनी पड़ी? यह सब उसी पुरानी ज्ञान-विवेक-विरोधी प्रवृत्ति की निष्पत्तियाँ हैं जो लगभग आरंभ से ही संघ-परिवार की ट्रेडमार्क पहचान है:– आत्मश्लाघा और परनिन्दा। संघ-प्रशिक्षित किसी भी नेता का कोई भाषण उठाकर देख लें — उस में यह दोनों विशेषता मिल जाएगी। इस के बिरले ही अपवाद मिलें तो मिलें।
यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि जिस तरह दूसरों को ‘हटा देने’ के नारे संघ नेता दे रहे हैं, उस की चोट पहले उन पर भी होती रही है। आरएसएस को दशकों तक पहले की प्रभावशाली राजनीतिक धाराओं ने अछूत-सा मान कर व्यवहार किया था। अतः उस अनुभव से संघ के नेताओं से अपेक्षा हो सकती थी कि वे स्वयं अपनी बारी में दूसरों के साथ वह अन्याय नहीं करेंगे।
परन्तु उन्होंने उल्टा रुख दिखाया है! मानो उन में बदले की भावना पनपती और मजबूत होती गई है। इसे गत बारह सालों से उन के अनेक छोटे नेता-कार्यकर्ता व्यक्त भी करते हैं। जब वे अपने शासक नेताओं के हर अनुचित, अशोभनीय, और गर्हित काम का बचाव यह कहकर करते हैं कि: ‘कांग्रेस ने क्या किया था?’
ऐसी दलील प्रकारांतर माननी है कि सत्ताधारी गलत कर रहे हैं, किन्तु इसे इसलिए स्वीकार करो क्योंकि कांग्रेस ने यही किया था! यह कैसा तर्क है? यह कैसी मति है? यह शासकों की कैसी योग्यता है जिन के अनुचित कामों का बचाव यह कहकर करना पड़े कि पहले के शासकों ने भी यही किया था!
निस्संदेह, यह सब संघ-परिवार की राजनीतिक मूल्यांकन के लिए बेहद नकारात्मक तथ्य है। क्योंकि यह दिखाता है कि उन में बेहतर विकल्प होने की योग्यता नहीं थी। वे केवल दलीय हित जानते हैं। उन की देश हित की समझ माशाअल्लाह है।
