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अमेरिकाः पीछे नाकामियां हैं, और आगे बीहड़

ईरान पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन का केंद्र बनेगा।…इस युद्ध पहले तक दुनिया में तीन बड़ी ताकतें (अमेरिका, चीन और रूस) थीं, जबकि यह युद्ध ईरान को चौथी बड़ी ताकत के रूप में स्थापित कर रहा है।   हकीकत तो यह है कि सात अप्रैल की रात अमेरिका जिन शर्तों को शांति वार्ता का आधार बनाने को राजी हुआ, उससे दुनिया के बदले शक्ति संतुलन की एक झलक दुनिया को मिल चुकी है।

इन पंक्तियों के लिखे जाने (10 अप्रैल की सुबह) तक ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता की संभावना पर अंदेशों के घने बादल छाये हुए हैं। आठ अप्रैल से लागू हुआ युद्धविराम बेहद पतली डोर से लटका हुआ है। शांति वार्ता के लिए जिन आधार बिंदुओं पर सहमति बनी, उनमें से कुछ पर से डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के मुकरने के कारण यह आशंका गहराई है कि दोनों तरफ से हमले फिर शुरू हो सकते हैं। इजराइल के हमले जारी रखने के कारण लेबनान में वैसे भी लड़ाई नहीं थमी है, जो युद्धविराम के लिए सबसे प्रमुख चुनौती है। वैसे, होरमुज जलडमरूमध्य से परिवहन की शर्त और ईरान यूरेनियम संवर्धन कर पाएगा या नहीं, इन दो मुद्दों पर भी ट्रंप प्रशासन ने ईरान की मांग से सहमत होने के बाद अपना रुख पलट लिया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी खास रिपोर्टों से ईरान के इस दावे की पुष्टि की है कि युद्धविराम के लिए बेताब अमेरिका था। पाकिस्तान को मध्यस्थ राष्ट्रपति ट्रंप ने इसलिए बनाया, क्योंकि युद्धविराम के लिए सिर्फ वही ईरान के नेतृत्व से सीधे संवाद बना सकने की स्थिति में था। न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया है कि पाकिस्तान ने जिन शर्तों पर युद्धविराम का एलान किया, उसकी पूरी जानकारी ह्वाइट हाउस को थी। (https://archive।is/2026।04।08-221624/https://www.nytimes.com/2026/04/08/world/middleeast/trump-pakistan-tweet-iran.html)

इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन तीन बिंदुओं- लेबनान, होरमुज और यूरेनियम संवर्धन- पर मुकरा, तो उसकी वजह संभवतः यह धारणा है कि अमेरिका ने ईरान के आगे “समर्पण” कर दिया। ऐसी चर्चाओं से ट्रंप इतना भड़के कि उन्होंने सीएनएन सहित ऐसी बात कहने वाले अमेरिकी मीडियाकर्मियों को जेल भेजने की धमकी दे दी! उधर चेहरा बचाने की कोशिश में ह्वाइट हाउस की प्रवक्ता केरोलिन लेविट ने मीडिया के सामने आकर कहा कि राष्ट्रपति ने ईरान के प्रस्तावों को कूड़ेदान में फेंक दिया है!

नतीजा हुआ कि ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने शांति वार्ता के लिए नौ अप्रैल की रात इस्लामाबाद जाने की अपनी योजना स्थगित कर दी। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह वार्ता में तभी भाग लेगा, जब बातचीत के लिए उसकी दस सूत्री योजना को आधार बनाने की घोषणा अमेरिका फिर करेगा। इस तरह फिलहाल सूरत यह नजर आती है कि या तो अमेरिका ऐसा करेगा या फिर युद्धविराम का अंत हो जाएगा। बहरहाल, पहले सहमत होने, और फिर उसके तीन बिंदुओं से मुकरने के बाद अमेरिका अगर फिर से उन बिंदुओं को वार्ता का आधार बनाने को तैयार होता है, जो जाहिर है, उसके “समर्पण” की धारणा और गहरी होगी। जबकि वह ऐसा नहीं करता, तो उसे उस युद्ध में फिर से उतरना होगा, जिसमें रणनीतिक पराजय की बनती धारणा के कारण लड़ाई से निकलने की बेताबी उसने दिखाई थी।

युद्ध विशेषज्ञों ने कहा है कि हवाई हमलों से ईरान को हराने की रणनीति नाकाम हो चुकी है। अमेरिका के लिए सफलता की कोई संभावना है, तो वह जमीनी युद्ध के साथ होगी, जिसमें विजयी होने पर वह ईरान में तख्ता पलट कर सकेगा। मगर यह बेहद जोखिम भरा दांव होगा, जिसकी परिणति अफगानिस्तान या इराक जैसी भी हो सकती है। वैसे भी अमेरिका के लिहाज से जमीनी हमले की परिस्थितियां हर रोज कठिन होती जा रही हैं। जैसे कहा जाता है कि ठंड में रूस पर हमला हार के मुंह में घुसना होता है, वैसा ही हाल पश्चिम एशिया में गरमी के सीज़न में हो सकता है। विशेषज्ञों ने कहा है कि जल्द ही उस इलाके में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचेगा, जिसके बीच ईरान के बीहड़, पहाड़ी इलाकों में अमेरिकी सैनिकों को भेजना उन्हें मौत के मुंह में धकेलना होगा।

युद्ध विशेषज्ञ राजनीति शास्त्री रॉबर्ट ए. पेप के मुताबिक आगे क्या होगा, इसका अनुमान हम तीन संकेतों से लगा सकते हैः

–     ईरान के आसपास के क्षेत्र में थल सेना की गतिविधियां

–     होरमुज पर ईरान के नियंत्रण की स्थिति

–     और, परमाणु मुद्दे पर ईरान का रुख

समस्या यह है कि ईरान इन बिंदुओं पर नरम पड़ता नजर नहीं आ रहा है। जमीनी जंग के लिए अमेरिका को ललकार रहा है, होरमुज जल मार्ग वह सिर्फ अपनी शर्तों पर खोलने को तैयार है, और अब वह यह दो टूक कह रहा है कि यूरेनियम संवर्धन के अपने अधिकार पर वह कोई समझौता नहीं करेगा। इन तीन बिंदुओं पर अमेरिका उसे नहीं झुका पाया, तो ना सिर्फ पश्चिम एशिया, बल्कि पूरी दुनिया में हम एक शक्ति संतुलन का उदय देखेंगे।

रॉबर्ट ए. पेप ने कहा है कि पश्चिम एशिया में उस शक्ति संतुलन का केंद्र ईरान बनेगा। पेप ने तो यहां तक कहा है कि इस युद्ध पहले तक दुनिया में तीन बड़ी ताकतें (अमेरिका, चीन और रूस) थीं, जबकि यह युद्ध ईरान को चौथी बड़ी ताकत के रूप में स्थापित कर रहा है।

हकीकत तो यह है कि सात अप्रैल की रात अमेरिका जिन शर्तों को शांति वार्ता का आधार बनाने को राजी हुआ, उससे दुनिया के बदले शक्ति संतुलन की एक झलक दुनिया को मिल चुकी है। शिकागो विश्वविद्यालय में Project on Security and Threat के निदेशक रॉबर्ट ए। पेप ने युद्धविराम के एलान के बाद कहा थाः ‘इस युद्ध शक्ति मापने का पैमाना (देश का) आकार नहीं बना। बल्कि ताकत अपनी प्रभाव-शक्ति से दूसरे की कमजोरी का लाभ उठाने (leverage over vulnerability) की क्षमता से तय हुई। ईरान अमेरिका को हराये, इसकी जरूरत उसे नहीं पड़ी। उसे सिर्फ यह दिखाना पड़ा कि वह क्या कर सकता हैः ऊर्जा प्रवाह को बाधित करना- जिससे दुनिया की लागत बढ़ी- और दूसरों को इस पर मजबूर करना कि युद्ध जारी रहने में निहित जोखिम को वे समझें। इस रूप में प्रभाव-शक्ति असल ताकत बन गई।’

तो असल सवाल यह नहीं है कि कौन “जीता”? असल मुद्दा यह है कि क्या कोई नया नियम तय हुआ? ठोस संकेत हैं कि ऐसा हुआ है। नया नियम यह है कि वैश्विक ऊर्जा प्रवाह में स्थिरता बनाए रखने के लिए ईरान को साथ लेना अनिवार्य हो गया है। युद्धविराम के लिए ईरान जो दस शर्तें अमेरिका ने स्वीकार कीं, उनमें से एक में कहा गया- युद्धविराम के दौरान होरमुज जलडमरूमध्य नौवहन के लिए खुला रहेगा, जहां से ईरानी की सेना से तालमेल कायम करते हुए जहाज गुजर सकेंगे। मतलब यह कि होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को अमेरिका ने स्वीकार कर लिया।

अपनी रिपोर्ट में समाचार एजेंसी एपी ने कहाः ‘दो हफ्तों के युद्धविराम की योजना में यह शामिल है कि इस दौरान होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से ईरान और ओमान परिवहन शुल्क वसूल सकेंगे। यह बात एक क्षेत्रीय अधिकारी ने अपना नाम ना छापने की शर्त पर बताई। जलडमरूमध्य ओमान और ईरान दोनों की समुद्री सीमा के अंदर आता है। लेकिन युद्ध के पहले तक दुनिया इसे अंतरराष्ट्रीय जल मार्ग मानती थी, जहां कभी टॉल टैक्स देने की जरूरत नहीं पड़ी।’ (https://apnews.com/live/iran-war-israel-trump-04-07-2026#0000019d-6a85-d1f7-a9bf-6adf0b450000)

वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Quincy Institute for Responsible Statecraft के सह-संस्थापक और कार्यकारी उपाध्यक्ष ट्रिटा पारसी ने लिखा- ‘इस्लामाबाद में जब ईरान की 10 सूत्री योजना पर बातचीत करने के लिए अमेरिका और ईरान मिलेंगे, तो एक नया गतिशास्त्र वहां नजर आएगा। ट्रंप के नाकाम युद्ध ने अमेरिका एवं ईरान के बीच कूटनीति में सैन्य धमकी देने की अमेरिकी ताकत को खत्म कर दिया है। अमेरिका धमकी अभी भी दे सकता है, लेकिन सबको मालूम है कि उसका अब कोई वजन नहीं है। हकीकत यह है कि ईरान के साथ युद्ध को आजमाया गया और उसमें नाकामी हाथ लगी। अतः वार्ता अब एक पक्ष की जोर-जबरदस्ती के बजाय दोनों पक्षों की तरफ से वास्तविक रियायत देने के नजरिए पर आधारित होगी।’

इस्लामाबाद में वार्ता हो या नहीं, अथवा वार्ता का जो भी नतीजा हो, उपरोक्त स्थितियां अब बदलने वाली नहीं हैं। यह हकीकत दुनिया के सामने है कि 28 फरवरी से सात अप्रैल तक की अवधि दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व के पराभव को उजागर करने वाला कालखंड बनी है। और इस घटनाक्रम का नायक बन कर ईरान उभरा है। उसके पीछे सहयोगी भूमिका में कौन-से पात्र थे, यह महत्त्वपूर्ण, लेकिन फिलहाल अप्रसांगिक प्रश्न है। मूल कथा यह है कि अमेरिका ईरान की शर्तों पर बातचीत करने के लिए राजी हुआ।

यहां यह उल्लेख अवश्य होना चाहिए कि जब ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाया, तो उसने लड़ाई रोकने की अपनी शर्तें उसे बताई थीं। हफ्तों तक सार्वजनिक तौर पर यही बताया जाता रहा कि लड़ाई रुकवानी है, तो ईरान को क्या- क्या करना होगा। लेकिन, जब युद्धविराम का एलान हुआ, तो इसके विपरीत शर्तें सामने आईं।

चूंकि अभी भी विश्व सूचना तंत्र पर पश्चिम- खासकर अमेरिका का असर है, अतः युद्ध के दौरान ये तथ्य आम तौर पर दबा रहा कि ईरान अमेरिकी शर्तों पर बातचीत करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। बल्कि, वह अपनी शर्तें पाकिस्तान को बताता रहा। सात अप्रैल तक ईरान की शर्तों को पश्चिमी मीडिया ने तवज्जो नहीं दी। लेकिन आठ अप्रैल को आखिरकार उन्हीं शर्तों को बातचीत का आधार बनाने के लिए अमेरिका को मजबूर होना पड़ा।

क्यों? इसे समझने के लिए उन नाकामियों पर गौर करना उचित होगा, जो ईरान के खिलाफ युद्ध के दौरान अमेरिका को हाथ लगीं। मसलन,

दरअसल, नाकामियों की लिस्ट और भी लंबी है, मगर उपरोक्त तथ्य यह बताने के लिए काफी हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध का अमेरिकी दांव बुरी तरह बैकफायर कर गया। नतीजतन, पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति संतुलन उभर आया है। ये घटनाक्रम जाहिर कर गया है कि अमेरिका अब दुनिया की नंबर एक सैन्य शक्ति भी नहीं रहा। आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्र में वह पिछड़ चुका है, यह बात तो सबके सामने पहले से साफ थी। अब सैन्य शक्ति का उसका रुतबा भी जख्मी हाल में दुनिया के सामने मौजूद है।

उधर इजराइल के लिए ये झटका कितना जोरदार है, इसे वहां के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता यायर लापिड की इस टिप्पणी से समझा जा सकता है: “हमारे पूरे इतिहास में कभी भी ऐसी कूटनीतिक आपदा नहीं आई। इजराइल उस मेज पर मौजूद तक नहीं था, जहां हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियाद से जुड़े निर्णय लिए जा रहे थे।” लापिड ने कहा कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अहंकार और लापरवाही ने इजराइल के सबसे करीबी सहयोगी अमेरिका के साथ हमारे समन्वय को बिगाड़ दिया है।

समन्वय बिगाड़ने के आरोप का संदर्भ अमेरिका में इस युद्ध को लेकर भड़के जन विरोध से बना, जिसमें मागा मूवमेंट की कई बड़ी हस्तियां इस मामले खुलकर डॉनल्ड ट्रंप के खिलाफ खड़ी हो गईं। उधर जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक पहली बार ऐसा हुआ कि अमेरिका में फिलस्तीन से सहानुभूति रखने वाले लोगों की संख्या इजराइल के हमदर्दों से ज्यादा हो गई। इजराइल को लेकर बढ़े विरोध भाव की ही ये मिसाल है कि इस युद्ध में अमेरिका के शामिल होने के खिलाफ ट्रंप प्रशासन के राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के निदेशक जो केंट ने इस्तीफा दे दिया। युद्धविराम की घोषणा के बाद केंट ने कहा कि युद्धविराम की सफलता इस पर निर्भर करती है कि अमेरिका इजराइल को कितना बांध पाता है। उन्होंने कहा- “मध्य पूर्व में पूर्व हस्तक्षेपों की तरह इस बार भी हम पहले से बदतर स्थिति में पहुंचे हैं। मध्य पूर्व में युद्ध अमेरिका के लिए नुकसान का सौदा रहे हैं, ये बात हम जितनी जल्द समझ लें, बेहतर होगा।”

युद्धविराम ने ट्रंप प्रशासन और अमेरिका के पूरे सामरिक प्रतिष्ठान को यह समझने का मौका प्रदान किया है। 39 दिन का युद्ध पहले ही अमेरिका का स्वेज नहर क्षण (https://www.nayaindia.com/opinion/columnist/americas-suez-canal-moment/513684।html) साबित हो चुका है। अगर अमेरिका ने इस समझने का अवसर गंवाया और जमीनी जंग में उतरा, तो संभव है कि उसका अगला वाटरलू ((2) Saifedean Ammous on X: “Escalating from Suez to Waterloo ” / X) बन जाए! (1815 में वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन की हार के साथ फ्रांस प्रथम साम्राज्य का अंत हो गया था तथा यूरोप में शक्ति संतुलन, राजनीतिक संस्कृति एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नए दौर की शुरुआत हुई थी।)

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