अब भारत में एक भी बौद्धिक, साहित्यिक मंच, पत्रिका नहीं जो देश में भी जानी जाती हो। यह शिक्षा को दलबंदी के हवाले करने से हुआ। अंग्रेज शासक शिक्षा संस्थानों के लिए भारत या बाहर से भी केवल विद्वानों को ही खोज कर लाते थे। जबकि देसी शासक अकादमिक कुर्सियाँ भी प्रायः दलीय कारकूनों, मुंशियों, और वोटार्थ आरक्षितों को थमाते हैं।.. आज शिक्षण संस्थाओं में विद्वानों के बदले भाईसाहबों का बोलबाला उसी की परिणति है। इस बुनियादी हानि की भरपाई कोई आर्थिक आँकड़े नहीं कर सकते, सावधान!
राष्ट्रवाद और हिन्दू अज्ञान परंपरा -3
इस परिदृश्य की तुलना उस शिक्षा से करें जो ब्रिटिश शासकों ने सौ साल तक चलाई। तब की उपलब्धियों, अन्वेषणों, संस्थानों, आदि की तुलना उस मध्ययुगीन दुर्गति से भी करें जो अंग्रेजों से पहले यहाँ सदियों होती रही। तब अंग्रेजी राज की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक देन का सही रूप मिलेगा। अंग्रेजी राज में बने भारतीय लेखकों, कवियों, वैज्ञानिकों, विचारकों, तथा साहित्य, पत्र-पत्रिकाएं, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय, संग्रहालय, संस्थानों, कानूनों, आदि की ठोस आमद से भी वह तुलना करें।
ब्रिटिश जमाने में भी कष्टप्रद बातें थीं, जिन की भारतीय और ब्रिटिश, दोनों तरफ के लेखकों ने आलोचनाएं की थी। पर एक तो हम यह कर ही तब सके जब हम में कुछ जान आई, हमें बोलने की छूट और मंच मिले। दूसरे, ब्रिटिश व्यवस्था की गुणवत्ता, कथनी-करनी सामंजस्य और उन की निष्ठा में किसी को संदेह न था। जबकि उन के बाद, अपने देसी दस्तावेज, घोषणाएं, नियुक्तियाँ, आकलन, अवार्ड — कहीं भी कथनी-करनी या मूल्यवत्ता का तालमेल बिठाना क्रमशः बेढब होता गया।
आज गये-गुजरे व्यक्ति भी ‘राष्ट्रीय’ सम्मान पा सकते हैं। प्रवेश परीक्षा में जीरो नंबर लाने वाले भी उसी तरह के माशाअल्लाह डॉक्टरेट बनकर, प्रोफेसर, वाइस-चांसलर, और उस से भी ऊपर बैठ सकते हैं! सिलेबस, डिग्री, या किसी नये प्रोजेक्ट का कोई ठोस उद्देश्य लिखना भी अब जरूरी नहीं समझा जाता। ‘नीति’ दस्तावेज तक छापे नहीं जाते! तब उन की उपलब्धि-परीक्षण क्या?
ऐसा कुछ भी ब्रिटिश काल में न था। तब केवल गुण और योग्यता को प्रोत्साहन था। हर खर्चे का हिसाब और कैफियत रहती थी। हर निर्माण का उद्देश्य स्पष्ट लिखा होता था। सर्वोच्च स्तर तक किसी भी गलती/विफलता की जिम्मेदारी और दंड मिलना निश्चित था। अब? बड़ी-बड़ी भूल और पॉलिसी डिसास्टर तक पर पर्दा डाल दिया जाता है। बड़े-बड़े अपराधी दलीय वाशिंग मशीन में धुल जाते हैं। क्या 1947 से पहले ऐसा कुछ भी था?
यहाँ 1920 के लगभग वह राष्ट्रवाद आरंभ हुआ जिस ने ज्ञान और विवेक पर ही तेजाब डालना शुरू कर दिया। नीरद सी. चौधरी के शब्दों में हमारे नेताओं ने इतिहास-ज्ञान की देवी (‘क्लियो’) को बाजारू बना दिया, जो राष्ट्रवादी आंदोलन के ‘हरम’ से निकली थी। धीरे-धीरे इतिहास देवी को राष्ट्रवादी नेताओं ने रखैल (‘अदालिस्क’) का रूप दे दिया।
इन कठोर शब्दों से वह तीव्र अनुभूति समझें जो नीरद बाबू को हुई थी! यानी, राष्ट्रवादी नेताओं ने इतिहास झुठलाया और मनगढ़ंत फैलाया। गाँधीजी ने इस की शुरुआत की, जब मुसलमानों को पटाने के लोभ में पूरे मुस्लिम शासन-काल के भयंकर इतिहास पर गुलाबी पर्दा डाल दिया! यह इतिहास-ज्ञान की देवी को ‘रखैल’ बनाने का ही उदाहरण था।
यही राष्ट्रवादी बौद्धिकता थी। जिस के बढ़ने से सत्य से दूरी, यानी अज्ञान बढ़ा। मिथ्याडंबर, द्वेष, पार्टी-बंदी, अवसरवाद और कुर्सीलोभ फैला। विवेक-विचार की चेतना, जिम्मेदार भावना, सच्चे अन्वेषण की प्रवृत्ति कमजोर होते-होते अब लुप्तप्राय हो चुकी है। आज स्कूलों, विश्वविद्यालयों से लेकर अकादमी, यूजीसी, आदि हर कहीं वही मिथ्याचार, द्वेष, लोभ, दलबंदी भरी जा रही है।
शिक्षा, शोध, चिंतन, रचनात्मता, तथा नीतियों की दयनीय दशा उसी का फल है। इसीलिए स्वतंत्र भारत में कोई जदुनाथ सरकार, जगदीश चन्द्र बोस, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, या ‘अपना’ मैकॉले भी नहीं हुआ। जबकि शिक्षितों की संख्या, विश्वविद्यालय तथा संसाधन और सुविधाएं बेहिसाब बढ़ गई हैं।
बल्कि, पहले उतने बंगाली व पंजाबी चिंतक, वैज्ञानिक, लेखक-कवि, कलाकार हुए — उस में भी अंग्रेजी राज के केंद्रों से निकटता है: कलकत्ता, लाहौर। आज किस देसी सत्ता केंद्र के निकट कैसे लोग बन रहे हैं? स्वयं हमारे नेता, ब्रिटिश राज के पढ़े हुए, अधिकांश लोग इन्टेलेक्चुअल, एडीटर, राइटर भी होते थे। संविधान सभा के नेताओं की तुलना आज संसद के नेताओं से कर लें।
यही राष्ट्रवादी विकास है। अर्थ-व्यापार में उन्नति हुई, क्योंकि उस की चिन्ता की गई। परन्तु शिक्षा-संस्कृति का ह्रास हुआ, क्योंकि उसे दलबंदी व प्रोपेगंडा के हवाले कर दिया गया। फलत: अब नारेबाजी ही सामाजिक शिक्षा का आदि-अंत है। आज जैसे असंख्य अबोध प्रवाचक, या शैक्षिक-संचालक भारतीय संस्थानों में पूरे ब्रिटिश राज के दौरान अपवादस्वरूप ही मिलें!
सो, यह ‘आई.के.’ भी राष्ट्रवादी हरम से निकली वैसी ही बंधुआ दासी, और रंगी-पुती पोस्टर से अधिक कुछ साबित न हो (जैसे पीछे ‘सोशलिज्म’ और ‘सेक्यूलरिज्म’ दासियाँ थीं), और दस वर्ष बाद इसे फेंक कर कोई नया नारा आए, तो आश्चर्य नहीं। स्वतंत्र भारत की वैचारिकी, सोशल साइंसेज और ह्यूमैनिटीज, एक प्रोपेगंडा से दूसरे प्रोपेगंडा का हल्ला रहा है। जब जिस शासक-नेता की जो झक हो, वह शिक्षा का ध्रुवतारा हो जाती है। सच्चे ज्ञान से हमारा रिश्ता दूर से दूरतर होता गया है।
ब्रिटिश राज में ठीक उल्टा था! तब ज्ञान और योग्यता की कद्र थी। सारा ‘रिजर्वेशन’ उसी का था। फौज, प्रशासन, निर्माण से लेकर विद्वता तक, केवल योग्यता की पूछ थी। फलत: उन्नति का मार्ग सब के लिए खुला था। कोई बाधित न था। यह ब्रिटिश राज के पहले की छ: सदी, और उस के बाद के आठ दशक से तुलना करके देख सकते हैं। ठोस पैमानों पर तुलना — न कि ‘उपनिवेशवाद’, ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ और ‘भारत माता’ वाली लफ्फाजी से!
फिर देखें — कौन भारतीय जन-गण का सच्चा हितैषी साबित हुआ? किस ने हमारे गुणों को, हमारे चरित्र, हमारी क्षमताओं को उभारने, बनाने, सँवारने में सहायता दी?
हमारी हालिया स्थिति कवि अज्ञेय ने नोट की थी। उन्होंने पाया था कि हमारे नेता वे हैं, “जिन को हमारे कहीं पहुँचने में, या हमारे चलने में या हमारी टाँगें होने या हमारे जीने में कोई दिलचस्पी नहीं है।” यह भी, कि जब देश एक था तब ‘राष्ट्रीय एकता’ की बातें नहीं होती थी। जब एकता नहीं रही, खुद तरह-तरह की फूट डाली जाने लगी, तब उस का नारा लगता है।
उसी तरह, जब ब्रिटिश राज में सचमुच ज्ञान का आदर था तब ‘नॉलेज सिस्टम’ की लनतरानी नहीं होती थी। अब चूँकि ज्ञान का आदर नहीं, केवल नारों का बोलबाला है, तब यह ‘नॉलेज’ की विरुदावली दलबंदी विशेषज्ञों ने चलाई है। जो एक को दूसरे से लड़ा, डरा, द्वेष फैला कर केवल वोट की फसल पकाते रहते हैं।
अतः ज्ञान की प्रेरणा, उस की व्यवस्था, बच्चों व युवाओं को महान साहित्य से जोड़ने के लिए सुंदर उपाय करने के बदले ‘आई.के.’ प्रोपेगंडा उसी चलन का अंग लगता है। यह प्रचार कि अब तक दूसरों ने तो ‘मैकॉले की चाकरी की, अब हम विश्वगुरू बन रहे हैं।’ जबकि गत वर्षों में पूरी शिक्षा तो क्या, किसी विशिष्ट अकादमिक संस्था को भी ज्ञानियों को चलाने नहीं दिया गया। हर कहीं दलीय भाईसाहब बगल से, यानी गैर-जिम्मेदार तरीके से, उसे रपेट रहे हैं। दलीय और निजी लाभ के लिए पदों, संसाधनों की बंदरबाँट हो रही है। युवा प्रतिभाएं जाने-अनजाने बर्बाद की जा रही हैं। विवेकी मनुष्य के बदले मानव-तोते बन रहे हैं।
इस क्रमशः दुर्गति का ही फल कि अब भारत में एक भी बौद्धिक, साहित्यिक मंच, पत्रिका नहीं जो देश में भी जानी जाती हो। यह शिक्षा को दलबंदी के हवाले करने से हुआ। अंग्रेज शासक शिक्षा संस्थानों के लिए भारत या बाहर से भी केवल विद्वानों को ही खोज कर लाते थे। जबकि देसी शासक अकादमिक कुर्सियाँ भी प्रायः दलीय कारकूनों, मुंशियों, और वोटार्थ आरक्षितों को थमाते हैं।
सो, जब भारत में सच्चे अध्ययन, तथा सांस्कृतिक, रचनात्मक चेतना व प्रतिभा को ग्रहण लगना आरंभ हुआ — तब से तरह-तरह के नारे सर्वोपरि होने लगे। उसी से धौंस जमाने की भी कोशिश की जाती है — मानो, ‘शान्ति’, ‘अहिंसा’, ‘पंचशील’, ‘समरसता’, ‘विश्वगुरू’, ‘विकसित भारत’, आदि शब्दों से ही सब प्रभावित हो जाएंगे!
यही है अपने ही नारे से अपना माथा चकरा लेना। जो गत सौ साल से चल रहा है। यह राजनीतिक, शैक्षिक क्षेत्र में अधिक प्रभावी है। नारे भीड़-राजनीति के लिए मुफीद रहे हैं। जैसा सौ साल पहले, वैसे आज। पंडाल में लफ्फाजी कर के, भोली भीड़ से ताली बजवा कर, तथ्य-विवेक पर बल देने वाले लोगों को किनारे कर देना। फिर अपनी ऊटपटाँग चलाना।
तभी से, इतिहास ही नहीं सामाजिक, मानविकी शिक्षा के हर विषय पर लफ्फाज ‘राष्ट्रवाद’ और दलवाद का ग्रहण लगता गया। अब वह गिर कर गुटवाद, भाईसाहबवाद तक आ गया है। यदि सारे संसाधन, संस्थान, आदि के सूत्र अपने हाथ ले चुके नेता सदैव दूसरे नेताओं, दलों को नीचा दिखाने, मिटाने — और इस के लिए कुछ भी करने की जुगत में लगे दिखते हैं तो उन्हें संस्कृति की चिन्ता के लिए समय क्या, मनोभावना भी कितनी बचेगी? उन की कथनी, करनी, भंगिमा, प्रस्ताव, फैसले, परिणाम, आदि से कुछ संकेत नहीं मिलता।
शोधार्थियों को 1915 से पहले की भारतीय मनीषा की भाषा, मनोभाव का सही आकलन करना चाहिए। वह बाद वाले राष्ट्रवादी दौर की भावना से भिन्न थी। पहले हमारे लोगों में यूरोपीय ज्ञान, उस की देन, आदि से विवेक पूर्वक सीखने, और तदनुरूप ऊपर उठने का प्रयत्न करने की भावना थी। उस विवेकशील और रचनात्मक भावना को ठोकर मार कर राष्ट्रवादी-पार्टीवादी मनोवृत्ति ने उलटा कर दिया! आज शिक्षण संस्थाओं में विद्वानों के बदले भाईसाहबों का बोलबाला उसी की परिणति है। इस बुनियादी हानि की भरपाई कोई आर्थिक आँकड़े नहीं कर सकते, सावधान! (समाप्त)
