Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

आखिरकार नक्सलवाद हुआ खत्म

Chhattisgarh 9 Naxalites Surrender In Bijapur

पिछले कुछ माह से सुरक्षाबल जिस तरह शीर्ष नक्सलियों को निपटा रहे है, उसे देखते हुए यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि मोदी सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए सुरक्षाबलों को हर तरह के संसाधन उपलब्ध कराए और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दशकों बाद तरक्करी का रास्ता साफ किया है।

इस 18 नवंबर को एक करोड़ रुपये का ईनामी और कुख्यात नक्सली माड़वी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने एक मुठभेड़ में ढेर कर दिया। हिड़मा के अंत से वह नक्सलवाद विरोधी अभियान अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है, जिसका मकसद बकौल केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह— मार्च 2026 तक देश से माओवाद का समूल सफाया करना है। ऐसा होना संभव भी लग रहा है, जो मोदी सरकार की अन्य कई बड़ी उपलब्धियों में से एक होगी।

यह दुर्भाग्य है कि वैचारिक कारणों से देश के एक वर्ग— विशेषकर वामपंथियों द्वारा हिड़मा जैसे उन दुर्दांत नक्सलियों का समर्थन किया जा रहा है, जिन्होंने ‘क्रांति’ के नाम पर सैंकड़ों निरपराधों को मौत के घाट दिया। अकेले हिड़मा 150 से अधिक निरपराधों की जान लील चुका था। क्या नक्सलवाद के खिलाफ ऐसी कार्रवाई पहले नहीं हो सकती थी? आखिर इसे ताबूत तक पहुंचाने में इतना विलंब क्यों हुआ? इसका उत्तर उस वामपंथी राजनीतिक-वैचारिक चिंतन में मिलता है, जिससे इस अमानवीय नक्सली व्यवस्था को दशकों से बौद्धिक खुराक मिल रही है।

वर्ष 2004-14 के बीच देश के प्रधानमंत्री रहे डॉ.मनमोहन सिंह 1967 से स्थापित नक्सलवाद को देश की आंतरिक के लिए गंभीर चुनौती मानते थे। इस दिशा में उन्होंने जून 2010 में नक्सलवाद के खिलाफ सख्त नीति अपनाने पर बल दिया था। परंतु कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्षा सोनिया गांधी द्वारा संचालित असंवैधानिक संस्था ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद’ (एनएसी) के कुछ सदस्यों ने माओवाद के खिलाफ किसी भी प्रस्तावित सख्त कार्रवाई पर आपत्ति जता दी। यह सुधी पाठकों से छिपा नहीं है कि उस दौर में मनमोहन सरकार एनएसी, जिसके अधिकांश सदस्यों का झुकाव वामपंथ की ओर था— उसके इशारों पर काम करती थी।

उस समय प्रकाशित प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचारपत्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तब एनएसी सदस्य राम दयाल मुंडा ने माओवाद मामले को लेकर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से कहा था— “आप जंग हार रहे हैं।” ज्यादातर एनएसी सदस्य इस बात पर जोर दे रहे थे कि नक्सलवाद को सैन्यबल के बजाय विकास से पराजित किया जा सकता है। यह विडंबना ही है कि जिस विकास— अर्थात् सड़क-स्कूल निर्माण आदि की बात की जा रही थी, उसे नक्सली प्रारंभ से अपने मंसूबों में रोड़े के रूप देखते थे और संबंधित विकास परियोजनाओं-नीतियों को पिछड़े-वंचित क्षेत्रों में पहुंचने ही नहीं देते थे।

शहरी नक्सलियों द्वारा बार-बार नैरेटिव बनाया जाता है कि माओवादी आदिवासियों-गरीबों के हमदर्द हैं और वे उनपर हुए तथाकथित ‘जुल्मों’ के खिलाफ लड़ रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ब्रिटिश दौर की उपेक्षा और आजादी के बाद शुरुआती सरकारों की नाकामी के बाद, नक्सलियों ने बंदूक के दम पर इन इलाकों को मुख्यधारा से काटा, सरकारी दफ्तर और स्कूल जलाए, सड़कें–पुल उड़ाए, और आम लोगों से जबरन वसूली की। इस माहौल के कारण आदिवासी क्षेत्रों में उद्योग और रोजगार पनप ही नहीं सके, और विकास लगभग रुक गया।

पिछले ग्यारह वर्षों में मोदी सरकार ने बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को प्राथमिकता देकर नक्सलवाद पर विकास और सख्ती— दोनों तरह से चोट की है। दूरदराज क्षेत्रों में 14,600 किमी सड़कें, हजारों मोबाइल टावर, 5,700 से अधिक डाकघर और दो हजार से ज्यादा बैंक-एटीएम खुल चुके हैं।

आदिवासी इलाकों में चालू एकलव्य मॉडल स्कूलों की संख्या 119 से बढ़कर 479 हो गई है। युवाओं के लिए कौशल केंद्र खोले गए हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा आदि विशेष अवसंरचना योजना के लिए ₹3,480 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इन प्रयासों का परिणाम यह है कि 2010 की तुलना में घातक नक्सली घटनाओं में 80% से अधिक की गिरावट आई है।

दरअसल, नक्सलियों के प्रेरणास्रोत चीन के साम्यवादी नेता माओ त्से–तुंग है, जिनका पूरा दौर अपने विरोधियों और उनसे असहमति रखने वालों पर हुए भयावह अत्याचारों से भरा पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक, अकेले माओ की ‘सांस्कृतिक क्रांति’ में 20 लाख निर्दोष मारे गए थे। आज चीन भले ही माओ की कई आर्थिक नीतियों से पीछे हट चुका हो और रुग्ण पूंजीवाद के दम पर तरक्की के मार्ग पर अग्रसर हो, लेकिन उसका राजनीतिक-वैचारिक अधिष्ठान अभी भी कमोबेश वैसा ही है।

भारत के प्रति शत्रुता रखने की वजह से चीन, प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से माओवादियों (शहरी नक्सलियों सहित) को अपना हथियार बनाता रहा है। अभी दिल्ली में क्या हुआ? निसंदेह, वायु प्रदूषण एक गंभीर विषय है, जिसपर ईमानदार चर्चा होनी चाहिए। परंतु दिल्ली के इंडिया गेट पर 23 नवंबर को हुए विरोध-प्रदर्शन में वामपंथियों ने ‘माड़वी हिड़मा अमर रहे’, ‘हर घर से चारू निकलेगा’ जैसे नारे लगाए और इसे रोके जाने पर पुलिस पर पेपर स्प्रे भी छिड़क दिया।

नक्सलियों के तौर–तरीके उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन से मिलते-जुलते हैं। जिस तरह किम अपने विरोधियों को सरेआम मौत के घाट उतार देते हैं, उसी तरह यह वामपंथी उग्रवादी अपनी तथाकथित ‘जन-अदालतों’ में बेगुनाह लोगों को पुलिस का मुखबिर बताकर मौत के घाट उतार देते है। इल्जाम भी नक्सली लगाते हैं और सजा का फैसला भी वही करते हैं। माओवादी वैचारिक समानता के कारण जिस वामपंथी चिंतन को आगे बढ़ा रहे हैं, वह अपने हिंसक और मानवता-विरोधी स्वभाव की वजह से पिछले 74 साल में दुनिया में कहीं भी एक खुशहाल और मानवाधिकारों से युक्त समाज नहीं बना पाया है।

यह ठीक है कि लोकतंत्र कोई अपवाद नहीं है और उसमें भी कुछ कमियां हो सकती हैं, लेकिन दुनिया की तमाम व्यवस्थाओं (शरीअत सहित) में सबसे ज्यादा संतुलित, मानवीय और सफल व्यवस्था— लोकतंत्र ही साबित हुआ है। इसी प्रजातंत्र के प्रति नक्सलियों की नफरत इस बात से साफ होती है कि 25 मई 2013 को हिड़मा और उसके अन्य नक्सली साथियों ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के कई नेताओं-कार्यकर्ताओं और जवानों की हत्या कर दी थी।

सच तो यह है कि माओवाद का सबसे ज्यादा नुकसान आदिवासियों और वंचित लोगों को हुआ है। नक्सलियों ने इन्हीं लोगों को अपने स्वार्थ के लिए विकास और लोकतंत्र की मुख्यधारा से दूर दिया। पिछले कुछ माह से सुरक्षाबल जिस तरह शीर्ष नक्सलियों को निपटा रहे है, उसे देखते हुए यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि मोदी सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए सुरक्षाबलों को हर तरह के संसाधन उपलब्ध कराए और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दशकों बाद तरक्करी का रास्ता साफ किया है।

Exit mobile version