Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

एक चेहरा, अंतहीन प्रचार अंतहीन

अभी मोदी ही सबसे बड़ी कहानी हैं। लेकिन कहानियां बदलती हैं। और इस कहानी के पाठक अब देख रहे हैं कि यह आगे बढ़ना बंद कर चुकी है। भारत का अगला अध्याय अतीत को दोहराकर नहीं बनेगा। वह तब बनेगा जब कोई दोनों भ्रमों को तोड़ने का साहस करेगापहचान की राजनीति और असफल आर्थिक ढांचे को। भारत इंतजार कर रहा है। शायद जितना उसे खुद पता है, उससे ज्यादा समय से।

वाराणसी में, जहाँ प्राचीन पत्थर के घाटों ने हजारों वर्षों की प्रार्थना और राख को सोखा हुआ है, अब हवा में वहा कुछ नया तैरता है—हवाई अड्डे से लेकर गंगा किनारे तक हर होर्डिंग पर एक जीवित आदमी का चेहरा। नरेंद्र नीचे देखते हैं, उस देवता जैसी शांति के साथ जिसने मानो जीत पहले ही हासिल कर ली हो। वैश्विक दर्शक के लिए यह लोकतंत्र के क्षरण की प्रतीक-छवि है। उन करोड़ों लोगों के लिए जिन्होंने उन्हें वहां तक पहुँचाया, यह कुछ पुराना और अलग है—अपने ही स्वरूप की वह छवि, जिसे अंततः पहचान मिल गई है।

उनके कार्यकाल के बारह वर्षों में एक पैटर्न साफ है। मोदी चुनावों के बीच शासन नहीं करते। वे लगातार चुनाव अभियान चलाते हैं, प्रधानमंत्री की कुर्सी से। संसद का हर संबोधन एक रैली है। हर नीति घोषणा एक हथियार है। हर विरोधी कोई आलोचक नहीं जिसे जवाब दिया जाए, बल्कि एक दुश्मन है जिसे नाम दिया जाए—राष्ट्रविरोधी, अर्बन नक्सल, भारत का दुश्मन—वह असली भारत जो अदालतों, संविधान और अंग्रेज़ी अखबारों वाले भारत से अलग बताया जाता है। उनकी पार्टी के लोग देशभर में मंचों से खुलकर कहते रहे हैं—जो मोदी के साथ नहीं है, वह भारत के खिलाफ है।

विपक्ष यह जानता है। फिर भी वह अपने तथ्यों, अपने ढाँचों और उन मानकों पर भरोसे के साथ सामने आता रहता है जिन्हें मोदी बहुत पहले छोड़ चुके हैं। वे सही तरीके से यह बताते हैं कि उनके शासन में क्या हुआ। भारत वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (World Press Freedom Index) में 161वें स्थान पर गिर गया, उन लोकतंत्रों से नीचे जिनसे वह कभी समानता का दावा करता था। वी-डेम इंस्टीट्यूट (V-Dem Institute) ने भारत को चुनावी निरंकुशता के रूप में वर्गीकृत किया है और 2024 में इसे दुनिया के सबसे तेज निरंकुश बनने वाले देशों में गिना। केंद्रीय जांच एजेंसियों का विपक्षी नेताओं के खिलाफ ऐसा इस्तेमाल हुआ कि यह पैटर्न वर्षों पहले ही स्पष्ट हो गया। सत्ता के करीब खड़े उद्योगपतियों ने धीरे-धीरे उन टीवी नेटवर्क्स को अपने नियंत्रण में ले लिया जो कभी स्वतंत्र माने जाते थे।

और फिर अरुंधति रॉय हैं—बुकर्स पुरस्कार विजेता लेखिका, जिन पर पंद्रह साल पुराने एक भाषण के लिए आतंकवाद विरोधी कानून के तहत मुकदमा चल रहा है। आरोप 2023 में प्रस्तावित हुआ और मोदी के दोबारा चुने जाने के बाद शांत तरीके से आगे बढ़ाया गया। संदेश स्पष्ट था।

विपक्ष यह सब उठाता है। लेकिन असर बहुत कम पड़ता है। इसे समझने के लिए मतदाताओं को भ्रमित मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। वे भ्रमित नहीं हैं। उन्होंने एक तार्किक फैसला लिया है—लेकिन उनके समीकरण के तत्व वे नहीं हैं जिन्हें विपक्ष समझता है। इन तत्वों को समझने के लिए हमें 2014 से नहीं, बल्कि 1947 से शुरुआत करनी होगी।

स्वतंत्र भारत एक नेहरूवादी समझौते पर बना था—कि अत्यधिक विविधता वाला समाज तभी एक आधुनिक राष्ट्र बन सकता है, जब वह अपनी गहरी पहचान—धार्मिक, जातीय, सभ्यतागत—को कुछ समय के लिए अलग रखे। सो सार्वजनिक जीवन धर्मनिरपेक्ष, तर्कसंगत और नियम आधारित होगा। हिंदू, मुस्लिम, दलित, आदिवासी—राज्य की नजर में सभी केवल नागरिक होंगे। यह एक महान सपना था। लेकिन करोड़ों भारतीयों के लिए यह एक प्रकार का निर्वासन भी था।

इस परियोजना में एक दूसरा वादा भी था—कम बोला गया, लेकिन उतना ही टूटा हुआ। राज्य नागरिकों से पहचान रोकने के लिए कहेगा, और बदले में समृद्धि देगा। विकास धर्मनिरपेक्षता को सही ठहराएगा। आर्थिक प्रगति नागरिकता को अर्थ देगी। यह वादा सबने तोड़ा—सिर्फ मोदी ने नहीं, बल्कि हर सरकार ने। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों एक ही आर्थिक ढांचे में काम करती रहीं—बाजार आधारित विकास, वित्तीय अनुशासन, वैश्विक जुड़ाव। वामपंथ भी पूरी तरह अलग नहीं था।

नतीजा यह हुआ कि यह सहमति इतनी गहरी हो गई कि वह विचारधारा नहीं, वास्तविकता लगने लगी। आँकड़े एक तरफ प्रभावशाली हैं—भारत की जीडीपी तेजी से बढ़ी। दूसरी तरफ वे आरोप भी हैं—शीर्ष एक प्रतिशत के पास 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है। करोड़ों शिक्षित युवा बिना रोजगार के हैं। विकास हुआ, लेकिन उसका लाभ सीमित रहा।

यही वह दूरी है—आँकड़ों और वास्तविक जीवन के बीच—जिसमें मोदी की राजनीति को हवा मिली। विपक्ष इसे नहीं देख पाया क्योंकि उसने भी इसे बनाया। जब राज्य समृद्धि देने में असफल होता है और पहचान को दबाने को कहता है, तो समझौता टूट जाता है। तब पहचान बचती है—कच्ची, असंतुष्ट और उपलब्ध। मोदी ने उसे अपनाया।

उन्होंने नीति नहीं, अनुमति दी—बिना झिझक हिंदू होने की अनुमति, एक प्राचीन सभ्यता से जुड़ने की अनुमति, विदेशी आलोचना को एक पुराने खेल के रूप में देखने की अनुमति। जनवरी 2024 में जब उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया, तो वह सिर्फ मंदिर नहीं था—वह एक सभ्यतागत पुनर्गणना थी।

विपक्ष की समस्या यही है। जब वह आर्थिक असफलताओं की सूची पेश करता है, तो वह जवाबदेही की भाषा बोलता है। लेकिन जवाबदेही तब काम करती है जब मानक साझा हों। जब संस्थाओं पर ही भरोसा नहीं है, तो उनकी बात का वजन भी नहीं रहता।

मोदी ने एक बात समझ ली है—विदेश से हर आलोचना उन्हें घरेलू समर्थन देती है। पश्चिमी मीडिया उन्हें खतरा कहता है, तो समर्थक इसे अपने दुश्मनों के खिलाफ प्रमाण मानते हैं। विपक्ष का संकट रणनीति का नहीं, आत्म-समझ का है।

राहुल गांधी की यात्राएं और धार्मिक प्रतीकों की ओर झुकाव यह दिखाता है कि विपक्ष सांस्कृतिक बदलाव को समझ रहा है। लेकिन केवल संस्कृति से राजनीति नहीं बनती। आर्थिक विकल्प के बिना यह सिर्फ एक मुद्रा है।

भारत आज एक नई भाषा का इंतजार कर रहा है—ऐसी भाषा जो न सिर्फ अतीत पर गर्व या वर्तमान पर शर्म की बात करे, बल्कि यह बताए कि विकास से किसे लाभ हुआ और किसे नहीं।

यह नया भारत न सिर्फ पहचान चाहता है, बल्कि भविष्य चाहता है। बेरोजगार युवा, प्रदूषित हवा, सीमित बचत—यह सब मिलकर एक नया राजनीतिक दबाव बना रहे हैं। इतिहास बताता है—सम्मान देने वाला नेता, यदि विकास न दे सके, तो अंततः चुनौती का सामना करता है।

लेकिन भारत उस क्षण का इंतजार नहीं कर सकता। बिना दिशा के परिवर्तन अराजकता लाता है। सवाल सिर्फ नए नेता का नहीं, बल्कि उस नेता के साहस का है—जो सभ्यतागत गर्व और आर्थिक न्याय को साथ रख सके।

ऐसा नेता अभी नहीं दिखता। लेकिन जगह बन रही है। हर बार जब कोई युवा विदेश जाता है। हर बार जब किसान की आवाज अनसुनी होती है। हर बार जब वादा और वास्तविकता के बीच की दूरी दिखती है।

अभी मोदी ही सबसे बड़ी कहानी हैं। लेकिन कहानियां बदलती हैं। और इस कहानी के पाठक अब देख रहे हैं कि यह आगे बढ़ना बंद कर चुकी है। भारत का अगला अध्याय अतीत को दोहराकर नहीं बनेगा। वह तब बनेगा जब कोई दोनों भ्रमों को तोड़ने का साहस करेगा—पहचान की राजनीति और असफल आर्थिक ढांचे को।भारत इंतजार कर रहा है। शायद जितना उसे खुद पता है, उससे ज्यादा समय से।

Exit mobile version