स्थूल नज़र से तो यही दिखाई देता है कि विधेयक की अगवानी के लिए कोई मखमली कालीन तो बिछा हुआ है नहीं। द्रमुक के 22, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के 8, वायएसआर कांग्रेस के 4 और सत्तापक्ष-विपक्ष से असंबद्ध 12-14 सांसदों पर विधेयक की नैया पार लगाने का दारोमदार होगा। वे या तो विधेयक के पक्ष में मतदान को राज़ी हो जाएं या मतदान में शिरक़त न करें, तभी लोकसभा में कोई बात बन पाएगी।
सरकार ने 66 दिन पहले अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए संसद के मॉनसून सत्र के सत्रावसान का ऐलान अब तक नहीं किया है, इस का मतलब साफ़ है कि वह लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन करने के लिए अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में विधेयक पारित कराने वाली है। मैं ‘विधेयक ले कर आने वाली है’ के बजाय ‘विधेयक पारित कराने वाली है’ इसलिए कह रहा हूं कि इस बार नरेंद्र भाई मोदी और उन के हुक़्मबरदार अमित भाई शाह छह महीने पहले जैसा ऐसा कच्चा खेल नहीं खेलेंगे कि गच्चा खा जाएं।
बजट सत्र के दौरान 17 अप्रैल को इस संविधान संशोधन विधेयक पर हुए मतदान में 54 मतों से पिछड़ जाने के बाद से ‘मोशा’-जोड़ी दिन-रात इसी खाई को पाटने की जुगत में लगी हुई है। सो, इस बार अगर सरकार यह विधेयक दोबारा ले कर आ रही है और इस चक्कर में उस ने सवा दो महीने से लोकसभा और राज्यसभा का औपचारिक सत्रावसान घोषित करने की तकनीकी ज़रूरत को पूरा नहीं किया है तो कोई मूढ़ ही यह मान कर चलेगा कि विधेयक इस बार भी लोकसभा में ओंधे मुंह गिर जाएगा।
संसद के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के आद आमतौर पर दो-चार दिनों के भीतर राष्ट्रपति सत्रावसान का ऐलान कर दिया करते हैं। ऐसा बहुत कम बार हुआ है कि इस घोषणा में असामान्य समय लगा हो। 1987 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री-काल में सत्रावसान का ऐलान 76 दिनों बाद हुआ था। इसलिए आप यह नहीं कह सकते हैं कि नरेंद्र भाई के ज़माने में कोई अनोखी बात हो रही है। मगर राजीव के वक़्त इसलिए सत्रावसान की औपचारिक घोषणा में इतनी देरी हुई थी कि तब बोफोर्स का विवाद अपने चरम पर था और संसद ठप्प सरीखी थी। फिर 1989 में राजीव के समय ही लोकसभा का सत्रावसान 61 दिनों बाद और राज्यसभा का 53 दिनों बाद हुआ था।
तब यह देरी इसलिए हुई थी कि विपक्ष के सांसदों ने नियंत्रक और महालेखापरीक्षक की रपट को ले कर अपने इस्तीफ़े दे दिए थे। इन दो मौक़ों के बाद सब से ज़्यादा देरी से सत्रावसान घोषित करने का काम नरेंद्र भाई ने ही 2015 में किया। तब यह औपचारिक ऐलान 28 दिनों बाद हुआ। उस समय सरकार वस्तु एवं सेवा कर का क़ानून संसद में पारित कराना चाहती थी। नरेंद्र भाई के ही कार्यकाल में यह दूसरा मौक़ा है, जब 11 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए संसद के दोनों सदनों का सत्रावसान अब तक नहीं हुआ है।
वैसे अगर बिना ख़ुर्दबीन के देखा जाए तो परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार के पास इस बार भी न तो लोकसभा में ज़रूरी बहुमत है और न राज्यसभा में। विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान में हिस्सा लेने वाले सांसदों में से दो तिहाई का वोट हासिल करना ज़रूरी होता है। पिछली बार अप्रैल में जब लोकसभा में विधेयक पर मतदान में 54 मतों का टोटा पड़ गया था तो सदन में 528 सांसद मौजूद थे। सरकार को 352 सांसदों का साथ चाहिए था। मगर विधेयक के पक्ष में 298 वोट ही पड़े और 230 सांसदों ने विरोध में वोट दिए थे। अगर अक्टूबर के आख़िरी दिनों में सरकार दोबारा यह विधेयक ले कर आती है तो बिना सियासी तिकड़म के उसे पारित कराना मुमक़िन नहीं होगा।
लोकसभा में इस वक़्त 540 सांसद हैं। अगर वे सभी मतदान में हिस्सा लेते हैं तो सरकार को 360 सदस्यों के समर्थन की दरकार होगी। भारतीय जनता पार्टी और उस के सभी सहयोगी दलों को मिला कर तो सिर्फ़ 294 सांसद ही हैं, जिन का समर्थन विधेयक को मिलना सुनिश्चित है। यानी सरकार को 66 सांसदों का साथ और चाहिए होगा। लेकिन इस बीच तृणमूल कांग्रेस के 20 और उद्धव शिवसेना के 6 सांसद पाला बदल चुके हैं। इस तरह सरकार के पास 320 सांसद हैं। दो तिहाई बहुमत से 40 सांसद फिर भी कम हैं। सो, स्थूल नज़र से तो यही दिखाई देता है कि विधेयक की अगवानी के लिए कोई मखमली कालीन तो बिछा हुआ है नहीं। द्रमुक के 22, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के 8, वायएसआर कांग्रेस के 4 और सत्तापक्ष-विपक्ष से असंबद्ध 12-14 सांसदों पर विधेयक की नैया पार लगाने का दारोमदार होगा। वे या तो विधेयक के पक्ष में मतदान को राज़ी हो जाएं या मतदान में शिरक़त न करें, तभी लोकसभा में कोई बात बन पाएगी।
लोकसभा में पारित होने के बाद ही विधेयक को ज़ोर-आज़माइश के लिए राज्यसभा के अखाड़े में प्रवेश मिलेगा। वहां पारित होने के लिए उसे 164 वोट चाहिए होंगे। एनडीए के पास अभी 141 सांसद हैं। यानी दो तिहाई बहुमत से 23 कम। उसे उम्मीद है कि राज्यसभा के 31 असंबद्ध, स्वतंत्र और छुटुर-पुटुर राजनीतिक दलों के सांसद अंततः विधेयक के समर्थन में आ जाएंगे। सो, बहुत मुमक़िन है कि अपने राजनीतिक हित हर कीमत पर साधने में महारत रखने वाली ‘मोशा’-भाजपा इस बार संसद के दोनों सदनों की वैतरिणी पार कर ले।
लगता है कि कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष को भी यह अहसास हो गया है कि नरेंद्र भाई के फंदों ने दोनों सदनों में दो तिहाई सांसदों को विधेयक के पक्ष में उलझा लिया है। इसलिए कांग्रेस-अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इस चुनौतीपूर्ण मुद्रा में नहीं हैं कि सरकार विधेयक पारित करा कर दिखाए। वे सिर्फ़ विधेयक के मसौदे पर विचार के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने का आग्रह कर रहे हैं। सरकार अभी तक तो उन की मांग को अपने ठेंगे पर ही रखे हुए है। नरेंद्र भाई क्या इतना भी नहीं जानते हैं कि सर्वदलीय बैठक बुलाने का मतलब होगा विधेयक पारित होने का श्रेय प्रतिपक्ष को भी देना! वे क्यों चाहेंगे कि विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो? अगर उन्होंने इन छह महीनों में कुछ भी दंदफंद कर के लोकसभा और राज्यसभा का दो तिहाई बहुमत अपने पलड़े में जमा कर ही लिया है तो वे तो चाहेंगे कि विपक्ष परिसीमन विधेयक के ख़िलाफ़ वोट करे और वे उसे नारी शक्ति वंदन का विरोधी घोषित कर दें।
विपक्ष इस का जोख़िम समझ रहा है। संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का क़ानून भले ही 2023 में ही सर्वसम्मति से पारित हो चुका हो, मगर तकनीकी पेंचों की वज़ह से सरकार द्वारा उसे अब तक लागू नहीं करने और नए परिसीमन से नत्थी कर देने की चालों की काट में तर्कों की बौछार विपक्ष सलीके से कर नहीं पा रहा है। ऐसे में खड़गे और राहुल गांधी को मालूम है कि नरेंद्र भाई का गोयबल्सी तहखाना कांग्रेस को किस कदर महिला विरोधी घोषित करने पर पिल पड़ेगा। सो, परिसीमन विधेयक का सर्वसम्मति से पारित होना ही ‘तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय‘ करा सकता है। मगर सत्तापक्ष को क्या पड़ी है कि वह प्रतिपक्ष की भी जय-जय होने दे? जो ‘मोशा’-टोली चुनाव जीत कर राज करने के बजाय दलबदल करा कर और राजनीतिक दलों को तोड़ कर सत्ता में बने रहने के बीजमंत्र का अनवरत जाप करती हो, उस से यह उम्मीद करना कि दो तिहाई बहुमत का छल-प्रपंची इंतज़ाम कर लेने के बावजूद वह उदारमना बन कर ‘सब का साथ-सब का विश्वास’ का भजन गाने लगेगी, अहमक़पन का चरम होगा।
