समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच।
यूरोपीय राजनीति की खिसक रही भू-गर्भीय परतों (Tectonic Plates) से उठते भूकंपीय झटकों का सितंबर में जर्मनी शिकार बना। पहले हफ्ते में सैक्सनी-अनहाल्ट पहला जर्मन प्रांत बना, जहां नव-नाजीवादी ऑल्टरनेटिव्स फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) पार्टी प्रादेशिक चुनाव जीतने में कामयाब रही (वहां वह लगभग 44 फीसदी वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी)। यह किसी आम स्थिति में अचानक पैदा हुई विसंगति नहीं थी। बल्कि यह एक दशक से अधिक समय से उभरते रूझान का ठोस रूप ग्रहण कर लेना भर था। इस बात की पुष्टि 20 सितंबर को जर्मनी के मेक्लेनबर्ग– वेस्टर्न पोमेरेनिया प्रांत में एएफडी की जीत से हुई। वहां वह 38 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ पहले स्थान पर रही।
उसी रोज जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक दूसरे किस्म का सियासी भूकंप आया। वहां डाई लिंके (द लेफ्ट) पार्टी सबसे आगे रही, जिसे पश्चिमी मीडिया धुर-वामपंथी बताता है। इन तीन नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि जर्मनी की राजनीति तेजी से दक्षिण एवं वाम की ‘चरम’ (extreme) धुरियों के बीच बंटती जा रही है। इस तरह सेंटर राइट- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू) और सेंटर लेफ्ट- सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के बीच सत्ता की अदला-बदली का जारी लगभग आठ दशक से जारी खेल अब खत्म हो रहा है। उचित ही इसे जर्मन राजनीति में मध्य मार्ग के विलोप के रूप में देखा गया है।
और यह सिर्फ जर्मनी का रुझान नहीं है। वैसे तो यह ट्रेंड चुनावी लोकतंत्र वाले तमाम देशों में उभरा है, लेकिन पश्चिमी देशों में इस नई राजनीतिक परिघटना की खास झलक देखी जा सकती है। कुछ महीनों के बाद इस रुझान की पुष्टि संभवतः फ्रांस में भी होगी, जहां अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य गोलबंदी “धुर वामपंथी” नेता ज्यां ल्यूक मेलेन्शॉ और धुर दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन के बीच हो रही है।
यह घटनाक्रम आने वाले वक्त में संभावित राजनीतिक टकराव का संकेत है। डाई लिंके की जीत और मेलेन्शॉ को मिल रही लोकप्रियता दुनिया में नए तेवर वाले वामपंथ के उदय की मिसाल हैं। और ऐसे संकेत सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं हैं। डाई लिंके की जीत के सिलसिले में यह बात सामने आई कि इस पार्टी ने बर्लिन में अपने चुनावी अभियान को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से सीख लेते हुए डिजाइन किया। बर्लिन में डाई लिंके का चेहरा तुर्किश मूल की सोशलिस्ट एलीफ एराल्प हैं। उनकी टीम ममदानी के प्रचार अभियान का अध्ययन करने न्यूयॉर्क गई। वहां से वह ये सबक लेकर लौटी कि बिखरे हुए अनगिनत मुद्दों को उठाने के बजाय दो या तीन ऐसे मुद्दे लिए जाएं, जिनकी वजह ‘लोगों की रात की नींद उड़ी रहती है’।
न्यूयॉर्क की तरह ही बर्लिन में भी नवोदित लेफ्ट ने मकान किराये को अपना केंद्रीय मुद्दा बनाया। साथ में रोजमर्रा की चीजों की महंगाई और परिवहन पर ध्यान केंद्रित किया गया। उसके साथ हज़ारों स्वयंसेवकों को संगठित किया गया, ताकि वे घर घर जाकर चर्चा कर सकें। और उसका असर हुआ- ठीक न्यूयॉर्क की तरह। अब एराल्प बर्लिन की मेयर कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी हैं।
एक जर्मन विश्लेषक ने लिखा है- यह तथ्य कि पूंजीवादी विरोधी वामपंथ ने बर्लिन में जीत हासिल की है, पुष्टि करता है कि उदारवादी (लिबरल) और मध्यमार्गी (सेंटरिस्ट) विकल्पों का पतन और “बाज़ार लोकतंत्र” का ढहना जारी है। वह पार्टी सिस्टम ढह रहा है, जो नव-उदारवाद के दौरान एक ही केंद्र- पूंजी से नियंत्रित रहा, भले दिखावटी तौर पर कई पार्टियों के रूप में उसके अनेक चेहरे सामने रहे हों।
गुजरे डेढ़ दशक में दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में धुर-दक्षिणपंथ का बढ़ना सबसे मजबूत राजनीतिक परिघटना रही है। ऐसा उन विशाल निराश समूहों की प्रतिक्रिया से संभव हुआ, जिन्होंने नव-उदारवादी भूमंडलीकरण के विनाशकारी परिणामों को झेला और एक मुकाम आकर उसे ठुकराना शुरू किया। अर्थव्यवस्था का उत्तरोत्तर वित्तीयकरण, वेतन की अस्थिरता, बेरोजगारी, आवास का दुर्लभ होना, स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्षय- आदि के कारणों से उपजे जन असंतोष का लाभ धुर दक्षिणपंथी दलों ने उठाया। किसी ‘आंतरिक शत्रु’ के खिलाफ नफरत भरे अभियान चलाना, काल्पनिक प्रभु वर्ग (मोटे तौर पर पहले सत्ता से लाभान्वित रहे समूहों) को तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराना, अयथार्थ समाधान पेश करना- आदि ऐसा तरीका रहा है, जिसे लगभग हर देश में उन दलों ने अपनाया है। इनकी बदौलत धुर-दक्षिणपंथियों को कामयाबी मिली है।
उन्हें यह सफलता इसलिए भी मिली, क्योंकि पारंपरिक वामपंथ ने नव-उदारवाद के हाथों अपनी हार को स्वीकार कर लिया। वे दल बाजार, बड़ी कंपनियों, और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के समन्वित हमलों के आगे झुक गए। उन्होंने बिना आलोचनात्मक रुख अपनाए उस एजेंडे को स्वीकार कर लिया, जो शासक वर्ग उनके लिए तैयार किया था। मसलन, पहचान आधारित मुद्दों और woke culture के समर्थन में उन्होंने अपना सारा जोर लगाया, जबकि आम जन के रोजमर्रा के सवालों से उन्होंने नेता तोड़ लिया।
ट्रेड यूनियनों का बदलाव के बड़े सपनों को छोड़ देना, वर्ग-आधारित पार्टियों का विघटन और वर्ग चेतना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी से उनका मुंह मोड़ लेना- ये सब इसी दौर की कहानियां हैं। इस दौर में पूंजी बनाम श्रम की बहस को हाशिये में चले जाने दिया गया और यह शिक्षा नजरअंदाज दी गई कि पूंजी का बेलगाम संकेंद्रण धन उत्पन्न करने के अन्य दो स्रोतों- प्रकृति और श्रम- को नष्ट कर देता है।
इसी दौर में धुर-दक्षिणपंथ “समाधान” बनकर उभरा। उसने मुसीबत के असली स्रोतों से ध्यान हटा कर अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, या कम्युनिस्ट प्रतीकों को निशाने पर लिया। पश्चिमी देशों में पारंपरिक वामपंथ और मध्यमार्गी दलों ने इनमें से कुछ सवालों पर धुर-दक्षिणपंथ को अपनी मौन सहमति दी, जबकि कुछ मुद्दों पर उसे सीधे चुनौती देने से वे बचते रहे। उसी का नतीजा अब उनका खुद हाशिये पर चले जाना और उससे पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए नए तेवर वाले वामपंथ का उभरना है।
इस प्रक्रिया को फिलहाल अमेरिका भी साफ देखा जा सकता है। वहां नए वामपंथी तेवर की नुमाइंदगी Democratic Socialists of America (डीएसए) कर रहा है। हालांकि यह स्वायत्त राजनीतिक समूह है, लेकिन चुनावी सिस्टम की मजबूरियों के कारण वह डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर अपने को संगठित किए हुए है। इस समय जोहरान ममदानी डीएसए का सबसे प्रखर चेहरा हैं। लेकिन उसके अनेक चेहरे इस वर्ष डेमोक्रेटिक प्राइमरी (उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया) में कामयाब रहे, और तीन नवंबर को होने वाले मध्य-अवधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। उनके नतीजों पर सबका ध्यान टिका हुआ है।
यह घटनाक्रम अमेरिका में आए एक बड़े बदलाव को जाहिर करता है। इस सिलसिले में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन रॉस की यह टिप्पणी काबिल-ए-गौर हैः
“पिछली बार जब किसी सोशलिस्ट उम्मीदवार को अमेरिकी चुनाव में गंभीरता से लिया गया, तो वह 1912 में था, जब यूजीन डेब्स को राष्ट्रपति पद के लिए 6 फीसदी वोट मिले। यह बहुत कम था, लेकिन नगण्य नहीं था। उसके बाद पहली बार हो रहा है, जब डीएसए चुनाव जीत रहा है। उनके सदस्य कांग्रेस में हैं। उन्होंने दो सीटें जीतीं। उन्होंने सीनेट के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी हासिल की है। न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी डीएसए के सदस्य हैं। यह पहली बार है कि जब उम्मीदवार खुले तौर पर समाजवादी के रूप में खड़े हो रहे हैं। इसका अपवाद सिर्फ बर्नी सैंडर्स हैं, जो डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे निर्दलीय के रूप में ही चुनाव लड़ते रहे।।।।।
अमेरिकी अखबार पढ़ें, तो मुझे लगता है वॉल स्ट्रीट जर्नल लगभग हर दिन डीएसए की निंदा करने वाला लेख छापता है, और न्यूयॉर्क टाइम्स आदि भी। और यह चौंकाने वाला है। यह तो शायद संवैधानिक भी न हो कि अमेरिकी कांग्रेस किसी विशिष्ट संगठन की निंदा करने के लिए मतदान करे, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि यह अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन के खिलाफ है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि अब मामला गंभीर है।।।।
इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका समाजवादी बनने जा रहा है। दुर्भाग्य से मेरे जीवन काल में ऐसा नहीं होगा। यहां मेरा मतलब वास्तविक समाजवाद से है- यानी उस अर्थ में, जिसमें अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा राजकीय स्वामित्व में आ जाता है, आपके सामने औपचारिक समाजवादी समाज होता है, और श्रमिक वर्ग समाज में अग्रणी शक्ति होता है।”
यहां जॉन रॉस ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के जिस प्रस्ताव का जिक्र किया, वह निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने पिछले एक सितंबर को पारित किया। 192 के मुकाबले 220 मतों के बहुत से पारित इस प्रस्ताव में “समाजवाद” की निंदा की गई। डीएसए का इसमें नाम लेकर जिक्र किया गया। इसके अलावा हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के नेता बार बार कम्युनिस्ट खतरे का जिक्र करते रहे हैं। उन्होंने डीएसए उम्मीदवारों का उल्लेख कर कहा है कि “कम्युनिज़्म हमारा दुश्मन है”। बीते चार जुलाई को अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह के मौके पर राष्ट्र के नाम संबोधन में ट्रंप ने एक चौथाई से ज्यादा समय कम्युनिस्ट खतरे के उल्लेख और कम्युनिज्म के कथित अत्याचारों की चर्चा में लगाया।
इसके बावजूद हकीकत यह है कि समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच। और अब बात चर्चा से आगे निकल कर यहां पहुंच गई है कि खुद को सोशलिस्ट बताने वाले उम्मीदवार चुनाव जीतने लगे हैं।
इस घटनाक्रम ने डीएसए की नीतियों और कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में लाया है। आम धारणा यही है कि डीएसए नॉर्डिक सोशल डेमोक्रेसी का अमेरिकी संस्करण है। नॉर्डिक मॉडल निजी स्वामित्व, प्रतिस्पर्धी बाज़ार, और बड़े निजी कॉरपोरेट्स को चुनौती नहीं देता। वह महज सामूहिक सौदेबाजी (यानी यूनियन अधिकारों) को मजबूत करने और उदार कल्याणकारी राज्य की धारणा पर आधारित है। नॉर्डिक मॉडल के तहत राज्य अधिक कर लगाता है, अधिक विनियमन करता है, और अधिक सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था का स्वामित्व और संचालन मुख्य रूप से निजी पूंजी ही करती है।
व्यवहार में डीएसए की राजनीति चाहे जो हो, अपने प्रोग्राम में वह इससे कहीं आगे गया है। उसका कार्यक्रम पूंजीवादी स्वामित्व को केंद्रीय समस्या मानता है। वह कंपनी संचालन, निवेश, संसाधन आवंटन आदि का दायित्व सार्वजनिक संस्थानों, श्रमिक संगठनों और लोकतांत्रिक निकायों की ओर ट्रांसफर करना चाहता है। संघीय स्तर पर रोजगार गारंटी, 32 घंटे का कार्य सप्ताह, पूर्ण वेतन के साथ पर्यटन अवकाश, व्यक्तिगत शुल्क के बिना सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, प्री-स्कूल से विश्वविद्यालय तक मुफ्त शिक्षा, छात्र ऋण की समाप्ति, किराया नियंत्रण, बड़े पैमाने पर सामाजिक आवास का निर्माण आदि उसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं। संसाधन जुटाने के लिए वह वेल्थ टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स की ऊंची दरों तथा उत्तराधिकार कर लगाने की मांग करता है।
डीएसए का राजनीतिक सुधार कार्यक्रम भी उतना ही व्यापक है। यह अमेरिकी सीनेट और इलेक्टॉरल कॉलेज को समाप्त करने, आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने, बहुदलीय लोकतंत्र लागू करने, राष्ट्रपति पद और सुप्रीम कोर्ट का ढांचा फिर से तय करने, और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को कहीं अधिक कड़े विधायी नियंत्रण के अधीन लाने आदि जैसी बात करता है।
अमेरिकी सिस्टम के भीतर से ऐसे सुधारों को लागू करवा पाना असंभव समझा जाता है। जबकि बाहरी जन हस्तक्षेप से सिस्टम को पलटना डीएसए की रणनीति का हिस्सा नहीं है। इसीलिए उसके कार्यक्रमों को अक्सर हवाई बताया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका कोई महत्त्व नहीं है। डीएसए को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि उसने अमेरिका में उन मुद्दों को लोकप्रियता दिलाई, जिनसे वहां का शासक वर्ग ना सिर्फ नफरत करता है, बल्कि भयभीत भी होता है।
बीसवीं सदी वयस्क मताधिकार आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए हुए आंदोलनों के कारण जनता के राजनीतिक अधिकारों का विस्तार हुआ था। बोल्शेविक क्रांति ने उसमें आर्थिक एवं सामाजिक पक्ष जोड़े। लेकिन एक मुकाम के बाद शासक वर्ग उस चेतना को भटकाने और सिस्टम पर फिर से अपना पूरा शिकंजा कसने में कामयाब हो गया। मौजूदा दौर में धुर-दक्षिणपंथ को उसने अपना राजनीतिक औजार बनाया है। उसके प्रतिवाद के रूप में अब नए तेवर वाला वामपंथ सामने आया है। हालांकि इसकी सीमाएं हर जगह स्पष्ट हैं, फिर भी इसका उदय स्वागतयोग्य है, क्योंकि इनसे नई संभावनाएं खुलती हैं।
भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अभी ऐसी किसी संभावना के संकेत नजर नहीं आते, तो उसकी वजह यहां शासक वर्ग के चलाए उस वैचारिक एजेंडे का अभी भी प्रभावशाली बने रहना है, जिसके जरिए आम जन की रोजमर्रा की समस्याओं को विमर्श से बाहर धकेला गया है। बहरहाल, यहां की नई पीढ़ी अगर सीखना चाहे, तो वह पश्चिम में उभरी संभावनाओं और उनकी सीमाओं का अध्ययन कर सकती है। हालांकि अपनी राजनीति विकसित करने के लिए शिक्षा का असल स्रोत तो अपनी वस्तुगत परिस्थितियां और आवाम हो ही सकते हैं। खैर, यह एक बिल्कुल अलग मुद्दा है।
