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डिजिटल दुनिया में इंसानियत का पासवर्ड: ‘प्रीतम एंड पेड्रो’

जब ओटीटी पर अपराध आधारित कहानियां अक्सर हिंसा, अंधेरे और सनसनी का सहारा लेती हैं, तब प्रीतम एंड पेड्रोएक अलग रास्ता चुनती है। यह विश्वास करती है कि गंभीर बात भी मुस्कुराते हुए कही जा सकती है। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। इस सीरीज़ को देखते हुए बार-बार लगा कि डिजिटल युग में हमें केवल साइबर सुरक्षा की नहीं, भावनात्मक सुरक्षा की भी ज़रूरत है।

सिने -सोहबत

एक समय था जब घरों के दरवाज़ों पर मज़बूत कुंडियां लगाई जाती थीं। रात को सोने से पहले घर का सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति उठ कर एक बार ताला ज़रूर देखता था। चोरी का डर घर के बाहर था। चोर दिखाई देता था और उससे बचने के उपाय भी दिखाई देते थे।

आज समय बदल चुका है।

अब चोर दरवाज़ा नहीं तोड़ता। वह हमारी जेब में रखे मोबाइल फ़ोन के रास्ते हमारी ज़िंदगी में दाख़िल होता है। हमारी तस्वीरें, हमारी पहचान, हमारे बैंक खाते, हमारी निजी बातचीत, सब कुछ अब डिजिटल है। जितनी तेज़ी से तकनीक ने हमारी ज़िंदगी आसान की है, उतनी ही तेज़ी से उसने हमें असुरक्षित भी बनाया है। लेकिन इस पूरी डिजिटल हलचल के बीच एक प्रश्न कहीं छूट जाता है कि क्या केवल तकनीक बदली है, या इंसान भी?

यही वह सवाल है जहां राजकुमार हिरानी फ़िल्म्स की छह एपिसोड वाली वेब सीरीज़ ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ अपनी अलग पहचान बनाती है। निर्देशक अविनाश अरुण साइबर अपराध की कहानी कहते हैं, लेकिन उनका लक्ष्य अपराध नहीं, इंसान है। यह सीरीज़ हमें डरा कर नहीं, मुस्कुरा कर सावधान करती है। शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। आज के सिने-सोहबत में विमर्श का मुद्दा भी यही वेब शो है, ‘प्रीतम एंड पेड्रो’।

कहानी गोवा पुलिस के अनुभवी अधिकारी पेड्रो (अरशद वारसी) और तकनीक-प्रेमी युवा प्रीतम (वीर हिरानी) की है। दोनों एक रहस्यमय हैकर (विक्रांत मैसी) तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। रास्ते में साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ब्लैकमेल, डिजिटल प्राइवेसी और डेटा चोरी जैसे अनेक प्रश्न सामने आते हैं।

यह केवल अपराधी को पकड़ने की कहानी नहीं है। असल कहानी दो पीढ़ियों के बीच संवाद की है। एक पीढ़ी अनुभव पर भरोसा करती है। दूसरी तकनीक पर। एक चेहरों को पढ़ती है। दूसरी स्क्रीन को। धीरे-धीरे दोनों समझते हैं कि अपराध चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, उसे समझने के लिए अब भी इंसानी संवेदनाएं सबसे बड़ी तकनीक हैं। यही विचार इस सीरीज़ को साधारण पुलिस-थ्रिलर बनने से रोकता है।

राजकुमार हिरानी की फ़िल्मों को यदि ध्यान से देखें तो पाएंगे कि वे हमेशा व्यवस्था से पहले इंसान को रखते हैं। ‘मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.’ में मेडिकल सिस्टम से पहले करुणा थी। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में राजनीति से पहले गांधी का विचार था। ‘थ्री इडियट्स’ में परीक्षा में अंकों से पहले सीखने की खुशी थी। ‘पीके’ में धर्म से पहले इंसान था। ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ उसी परंपरा का डिजिटल विस्तार है।

यह साइबर अपराध पर लेक्चर नहीं देती। यह कहानी सुनाती है और कहानी के भीतर ही दर्शकों को सावधान भी कर देती है। किसी भी अच्छी स्क्रिप्ट की पहचान भी यही है।

राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी और सुयश त्रिवेदी की कहानी और स्क्रीनप्ले का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे तकनीकी विषय को भी मानवीय बनाए रखते हैं। प्रांजल सक्सेना और शशांक कुंवर के संवाद सहज हैं। कहीं भी तकनीकी शब्दावली दर्शक को डराती नहीं है। साइबर दुनिया आम दर्शक की समझ में आने लगती है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सीरीज़ साइबर विशेषज्ञ अमित दुबे की चर्चित पुस्तकों ‘हिडेन फाइल्स’ और ‘रिटर्न ऑफ़ द ट्रॉजन हॉर्स’ से प्रेरित है। सो, घटनाओं में एक विश्वसनीयता बनी रहती है।

अभिनय की बात करें तो अरशद वारसी इस पूरी सीरीज़ की आत्मा हैं। वे अभिनय करते हुए अभिनय करते नहीं दिखते। तकनीक से परेशान एक पुराने ख़यालात वाले पुलिस अधिकारी का उनका चित्रण कई बार हमारे अपने घर के किसी बड़े सदस्य की याद दिलाता है। उनके चेहरे पर झलकती उलझन, हास्य और संवेदना साथ-साथ चलते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

वीर हिरानी का अभिनय सुखद आश्चर्य है। पहली ही परफॉरमेंस में वे आत्मविश्वास से भरे दिखाई देते हैं। उनकी स्क्रीन प्रजेंस भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है। वे अपने किरदार को अनावश्यक नायकत्व नहीं देते। उनकी सहजता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। अरशद वारसी के साथ उनकी केमिस्ट्री पूरी सीरीज़ को ऊर्जा देती है।

विक्रांत मैसी सीमित उपस्थिति में भी प्रभाव छोड़ते हैं। उनका रहस्यमय हैकर केवल अपराधी नहीं, बल्कि डिजिटल समय की एक जटिल मानसिकता का प्रतिनिधि बनकर सामने आता है। मोना सिंह, राजेश शर्मा, सत्यदीप मिश्रा, श्रुति मराठे और बोमन ईरानी भी अपनी-अपनी भूमिकाओं से कहानी को रंग देते हैं।

निर्देशक अविनाश अरुण का संयम विशेष रूप से प्रभावित करता है। वे गोवा को पोस्टकार्ड नहीं बनने देते। शहर कहानी का जीवित पात्र बन जाता है। हास्य कभी फूहड़ नहीं होता और रहस्य कभी अनावश्यक रूप से बोझिल नहीं बनता। छह एपिसोड की गति भी संतुलित है।

लेकिन मेरे लिए इस पूरी सीरीज़ का सबसे खूबसूरत क्षण इसका गीत ‘माफ़ी’ है। शांतनु मोइत्रा का संगीत, स्वानंद किरकिरे के बोल और श्रेया घोषाल की आवाज़ इस गीत को केवल एक संगीत रचना नहीं रहने देते; यह पूरी सीरीज़ का भावनात्मक केंद्र बन जाता है। गीत सुनते हुए अचानक एक विचार भीतर उतरता है कि चाहे ज़िंदगी हो या सिनेमा, बहुत सी मुश्किलें आसान हो सकती हैं यदि हम एक बात सीख लें- “कभी किसी से माफ़ी मांग लो, कभी किसी को माफ़ कर भी दो”।

यह सुनने में जितना सरल लगता है, जीवन में उतना ही कठिन है। हम पासवर्ड बदलना सीख गए हैं, लेकिन अपने अहंकार नहीं। हम मोबाइल सुरक्षित रखना जानते हैं, रिश्ते सुरक्षित रखना नहीं। हम दो स्तरीय सुरक्षा (टू फ़ैक्टर ऑथेंटिकेशन) का महत्व समझते हैं, लेकिन संवाद और क्षमा जैसी दो मानवीय सुरक्षाओं को अक्सर भूल जाते हैं। यही वजह है कि ‘माफ़ी’ केवल इस सीरीज़ का गीत नहीं, बल्कि फ़लसफ़ा बन जाता है।

कई बार जीवन में सबसे कठिन काम किसी हैकर को पकड़ना नहीं होता, बल्कि अपने भीतर बैठे अहंकार को हराना होता है। यहीं ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ मनोरंजन से आगे बढ़कर जीवन की बात करने लगती है।

हां, कुछ सीमाएं भी हैं। विक्रांत मैसी के किरदार को थोड़ा और विस्तार मिल सकता था। कुछ रहस्य अपेक्षाकृत जल्दी सुलझ जाते हैं। लेकिन ये छोटी-छोटी बातें उस समग्र अनुभव को कम नहीं करतीं जो सीरीज़ अपने दर्शकों को देती है।

आज जब ओटीटी पर अपराध आधारित कहानियां अक्सर हिंसा, अंधेरे और सनसनी का सहारा लेती हैं, तब ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ एक अलग रास्ता चुनती है। यह विश्वास करती है कि गंभीर बात भी मुस्कुराते हुए कही जा सकती है। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।

इस सीरीज़ को देखते हुए बार-बार लगा कि डिजिटल युग में हमें केवल साइबर सुरक्षा की नहीं, भावनात्मक सुरक्षा की भी ज़रूरत है। हमारी ज़िंदगी को सबसे ज़्यादा नुकसान हमेशा कोई हैकर नहीं पहुंचाता। कई बार वह चोट हमारे अपने अहंकार, हमारी चुप्पियों और हमारी अधूरी माफ़ियों से आती है। शायद इसलिए इस पूरी सीरीज़ का सबसे बड़ा संदेश साइबर अपराध नहीं, बल्कि जीवन है। अगर हम यह सीख जाएं, तो शायद केवल हमारी डिजिटल दुनिया ही नहीं, हमारी मानवीय दुनिया भी पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो जाएगी। जिओ हॉटस्टार पर है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

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