सोशल मीडिया पर वायरल हो रही ये पोस्ट वास्तविक तैयारियों को अतिरंजित रूप में पेश कर रही हैं। हाइब्रिड खतरे, मध्य-पूर्व में संभावित वृद्धि, और जलवायु-संबंधी व्यवधान जैसे कई जोखिम मौजूद हैं। लेकिन ये ‘कल से सब कुछ खत्म हो जाएगा’ वाला संकेत नहीं हैं। ऐसे में ‘तैयारी’ बुद्धिमानी है, ‘घबराहट’ नहीं।
बीते कुछ दिनों से दुनिया भर के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह के पोस्ट वायरल हो रहे हैं। इनमें दावा किया जा रहा है कि ‘20 से 33 देशों’ ने अपने नागरिकों से खाद्य पदार्थ, पानी, दवाइयाँ और नकदी का स्टॉक जमा करने को कहा है। कई पोस्ट इसे मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध से जोड़ते हुए किसी बड़े आसन्न संकट का संकेत बता रहे हैं। कुछ जगहों पर तो ‘तीसरे विश्व युद्ध’ या ‘तेल संकट’ जैसी आशंकाएँ खुलकर व्यक्त की जा रही हैं। सवाल यह है कि ये चेतावनियाँ कितनी वास्तविक हैं? इनके पीछे कौन-सा संकट छिपा है? और भारत को इससे क्या सीखना चाहिए?
वास्तविकता यह है कि कई देशों ने घरेलू तैयारियों की सलाह दी है, लेकिन यह कोई एक साथ जारी की गई वैश्विक आपात चेतावनी नहीं है। ब्रिटेन ने 22 अक्टूबर को ‘बी रेडी’ अभियान शुरू किया, जिसमें परिवारों को तीन दिन (72 घंटे) के लिए पानी, टिन फूड, रेडियो, नकदी और पॉवर बैंक रखने की सलाह दी गई। फ्रांस और कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने भी 72 घंटे की किट की बात कही। जापान भूकंप और ज्वालामुखी जोखिमों को देखते हुए तीन से सात दिन की आपूर्ति की सलाह दे रहा है। स्वीडन का ‘इन केस ऑफ़ क्राइसिस ऑर वॉर’ गाइड एक सप्ताह की तैयारी सुझाता है, जबकि जर्मनी दस दिन तक की बात करता है।
ये सलाहें न तो एक ही दिन जारी की गईं और न ही सभी देशों में एक जैसी हैं। कई देश पहले से ही ऐसी तैयारियाँ रखे हुए थे। अमेरिका में Ready.gov की सलाह वर्षों पुरानी है। भारत में भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) घरेलू आपातकालीन किट रखने की सलाह देता है, हालांकि इसमें निश्चित दिनों की संख्या नहीं बताई गई है। थाईलैंड जैसे देशों के प्रधानमंत्री ने अपने नागरिकों को घबराहट से बचने और खाद्य सुरक्षा पर भरोसा रखने को कहा है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यह कोई एक ‘अपेक्षित संकट’ नहीं है। बल्कि कई अलग-अलग जोखिम हैं जो कि एक साथ बढ़ रहे हैं। यूरोप में रूस की हाइब्रिड वारफेयर बढ़ रही है, साइबर हमले, ड्रोन घुसपैठ, तोड़फोड़ और बुनियादी ढाँचे पर खतरे बने हुए हैं। मध्य-पूर्व में ईरान के साथ युद्ध फरवरी 2026 से चल रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और इजराइल मिडटर्म चुनाव (3 नवंबर) के बाद ईरान पर छोटी लेकिन तीव्र कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। खाड़ी देशों को भी संभावित जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा गया है। इसके अलावा जलवायु संबंधी चरम मौसम, बिजली ग्रिड और संचार प्रणालियों पर साइबर खतरे, तथा जापान जैसे देशों में प्राकृतिक आपदाएँ भी शामिल हैं।
देखा जाए तो ये जोखिम वास्तविक हैं। 2022 के बाद से यूरोप में रूसी हाइब्रिड गतिविधियों में वृद्धि दर्ज की गई है। मध्य-पूर्व में तेल आपूर्ति और शिपिंग मार्गों पर खतरा बना हुआ है। लेकिन जानकर मानते हैं कि इन्हें ‘कल से विश्व युद्ध शुरू हो जाएगा’ जैसा एक एकल संकट नहीं माना जा सकता।
अगर मध्य-पूर्व में संघर्ष फिर से तीव्र होता है, तो सबसे बड़ा झटका तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ेगा। भारत जैसे तेल आयातक देश सबसे अधिक प्रभावित होंगे। यूरोप में बुनियादी ढाँचे पर हमले बिजली, परिवहन और संचार को बाधित कर सकते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होंगी। खाद्य सुरक्षा भी दबाव में आ सकती है, खासकर तब यदि वैश्विक व्यापार बाधित हो। सोशल मीडिया पर फैली घबराहट से ही ब्रिटेन में टिन फूड, टॉयलेट पेपर और रेडियो की बिक्री अचानक बढ़ गई। यह दिखाता है कि सूचना का गलत प्रसार वास्तविक कमी भी पैदा कर सकता है।
सवाल उठता है कि क्या इस चेतावनी को सच मन लिया जाए? आंशिक रूप से हाँ। सोशल मीडिया पर सामान्य तैयारी की सलाहों को ‘आसन्न आपदा’ या ‘सरकारों की गुप्त चेतावनी’ के रूप में पेश किया जा रहा है। कई पोस्ट पुरानी या अलग-अलग समय की सलाहों को एक साथ जोड़कर सनसनी पैदा कर रहे हैं। मध्य-पूर्व युद्ध को लेकर पहले से मौजूद चिंता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। गौरतलब है कि ऐसा पैटर्न 2020 के कोविड काल या अन्य संकटों के दौरान भी देखा गया था।
हालाँकि, इसे पूरी तरह से फर्जी या केवल ‘लोगों को चिंतित रखने’ वाला अभियान कहना भी गलत होगा। यूरोप में हाइब्रिड खतरे बढ़े हैं और मध्य-पूर्व में सैन्य तैयारी की रिपोर्टें विश्वसनीय मीडिया स्रोतों से आ रही हैं। सरकारें नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं ताकि आपातकालीन सेवाएँ सबसे कमजोर लोगों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। यह दीर्घकालिक लचीलेपन की नीति है, न कि केवल घबराहट पैदा करने का प्रयास।
ऐसे में भारत को घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सतर्क रहने की जरूरत है। हमारे पास खाद्य भंडार अपेक्षाकृत मजबूत है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा अभी भी कमजोर है। रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की योजनाएँ पहले से चल रही हैं, जिन्हें तेज किया जाना चाहिए। क्रिटिकल मिनरल्स के स्टॉकपाइल पर भी काम जारी है और इसे भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
नागरिक स्तर पर, बिना घबराहट पैदा किए, एनडीएमए की मौजूदा सलाह को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाया जा सकता है। सिविल डिफेंस और समुदाय स्तर की तैयारी को मजबूत करना उचित होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी चाहिए और मध्य-पूर्व तथा यूरोप दोनों से संभावित अतिरिक्त प्रभावों (तेल कीमतें, व्यापार बाधाएँ) पर नजर रखनी चाहिए।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही ये पोस्ट वास्तविक तैयारियों को अतिरंजित रूप में पेश कर रही हैं। हाइब्रिड खतरे, मध्य-पूर्व में संभावित वृद्धि, और जलवायु-संबंधी व्यवधान जैसे कई जोखिम मौजूद हैं। लेकिन ये ‘कल से सब कुछ खत्म हो जाएगा’ वाला संकेत नहीं हैं। ऐसे में ‘तैयारी’ बुद्धिमानी है, ‘घबराहट’ नहीं। भारत को शांत, तथ्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए: अपनी कमजोरियों को पहचानें, भंडार मजबूत करें और नागरिकों को सही जानकारी दें। सोशल मीडिया की शोरगुल भरी चेतावनियों के बजाय, वास्तविक लचीलापन ही सबसे अच्छी सुरक्षा है।
