पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में एक एक करके भाजपा या एनडीए की सरकार बन गई थी। लेकिन सबके पता है कि पूर्वोत्तर का गेटवे पश्चिम बंगाल है। वहीं पर एक ऐसी पार्टी की सरकार थी, जो भाजपा और केंद्र सरकार के प्रति लगातार द्वेष भाव रखती थी। इस वजह से पूर्वोत्तर के राज्यों की एनडीए सरकारों को भी समस्या आती थी।50 साल में पहली बार राज्य में ऐसी सरकार बनी है, जो केंद्र सरकार की विरोधी नहीं है।..इससे पूर्वोत्तर के राज्यों को भी नई गति मिली है।
केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद से भाजपा और एनडीए का एक सपना पूर्वोदय का रहा है। इसका अर्थ है कि पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास हो और उनको वास्तविक अर्थों में देश की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने इसके लिए अनेक सफल प्रयास किए। आज समूचा पूर्वोत्तर देश की मुख्यधारा से जुड़ा है और विकास की प्रक्रिया में सहभागी बना है। पिछले 12 साल में पूर्वोदय के अभियान में एक बाधा पश्चिम बंगाल बना हुआ था। राज्य में पिछले 15 साल से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की सरकार थी। इस सरकार ने बंगाल में जो किया वह अपनी जगह है लेकिन सरकार का एक मकसद हमेशा यह रहा कि केंद्र सरकार की योजनाओं में बाधा डाली जाए, उसे आगे बढ़ने से रोका जाए और लोगों को केंद्र की योजनाओं के लाभ से वंचित किया जाए। तृणमूल सरकार की बिल्कुल यही सोच पूर्वोत्तर के राज्यों को लेकर भी थी।
ध्यान रहे पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में एक एक करके भाजपा या एनडीए की सरकार बन गई थी। लेकिन सबके पता है कि पूर्वोत्तर का गेटवे पश्चिम बंगाल है। वहीं पर एक ऐसी पार्टी की सरकार थी, जो भाजपा और केंद्र सरकार के प्रति लगातार द्वेष भाव रखती थी। इस वजह से पूर्वोत्तर के राज्यों की एनडीए सरकारों को भी समस्या आती थी। यह सुखद संयोग है कि पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी सरकार की विदाई हो गई है और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी है। 50 साल में पहली बार राज्य में ऐसी सरकार बनी है, जो केंद्र सरकार की विरोधी नहीं है। इसका लाभ पश्चिम बंगाल के लोगों को मिल रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुनिश्चित हो रही है। साथ साथ पूर्वोत्तर के राज्यों को भी नई गति मिली है। बंगाल में भाजपा की जीत का पूर्वोत्तर के राज्यों में पहला असर यह देखने को मिला कि एक राज्य मिजोरम, जो एनडीए फोल्ड से बाहर था वहां की भी सत्तारूढ़ पार्टी जेडपीएम यानी जोराम पीपुल्स मूवमेंट ने एनडीए के साथ अपने को जोड़ लिया है। राज्यसभा और लोकसभा में उसके एक एक सांसद हैं। उनकी ओर से कहा गया है कि वे संसद में केंद्र सरकार को मुद्दों पर आधारित समर्थन देंगे। यह एक बड़ा बदलाव है, जिसके संकेतों को समझने की जरुरत है।
पूर्वोत्तर के जितने भी राज्य हैं, असम से लेकर सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय और त्रिपुरा तक हर राज्य किसी न किसी धागे से आपस में जुड़ा है और सारे राज्यों को कोई न कोई तार पश्चिम बंगाल से भी जोड़ता है। बंगाल को छोड़ कर बाकी राज्यों के जुड़ाव और लगभग सभी राज्य में एनडीए की सरकार होने से इस क्षेत्र में कई पुरानी समस्याओं का समाधान होने लगा था। परंतु पश्चिम बंगाल में भाजपा विरोधी पार्टी की सरकार होने से बहुत सारे मामले सुलझ नहीं रहे थे। इनमें कई मामले रोजमर्रा की प्रशासनिक फैसलों से जुड़े थे और ज्यादातर मामले पूर्वोत्तर के राज्यों के आम लोगों के जीवन से जुड़े थे। सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने शासन की बागडोर संभालते ही उन लंबित मुद्दों का निपटारा शुरू कर दिया है।
इसकी एक मिसाल सिक्किम से दी जा सकती है। सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) जैसे मृदु स्वभाव वाले, सादगी पसंद और व्यवहार कुशल नेता को भी कभी तृणमूल कांग्रेस शासित बंगाल से सहयोग नहीं मिला। उनके तमाम प्रयासों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने उनके साथ सामंजस्य बैठाने और उनके साथ सहयोग करने की पहल नहीं की। एनडीए का मुख्यमंत्री होने के कारण प्रेम सिंह तामंग को ममता बनर्जी ने हमेशा परेशान ही किया और तकलीफ़ पहुंचाई। यही कारण था कि सिक्किम के मुख्यमंत्री ने हमेशा उनसे सावधानीपूर्वक दूरी बनाए रखने में ही राज्य की भलाई समझी।
परंतु अब स्थितियां बदल गई हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा शासन आने करीब दो महीने बाद मुख्यमंत्री गोले ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से सौजन्य भेंट की। दोनों के बीच जो अपनापन, दोस्ताना, गहरा आत्मीय संबंध और एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव दिखा उससे यह संकेत मिला कि सिक्किम और बंगाल के बीच जो मुद्दे बरसों से लंबित हैं, उनका समाधान हो जाना अब महज समय की बात है। पहली ही मुलाकात में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल और सिक्किम के बीच सालों से लंबित पांच प्रशासनिक मुद्दों का महज ढाई मिनट में स्पष्ट निर्देश दे कर निपटारा कर दिया। मतलब सिर्फ आधे मिनट में एक मुद्दे का निपटारा हुआ। यह सुवेंदु अधिकारी की कार्यकुशलता को तो दिखाता ही है साथ ही सिक्किम के मुख्यमंत्री के साथ उनके आत्मीय रिश्ते को भी दिखाता है औऱ पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ वर्षों से लंबित मुद्दों को समयबद्ध तरीके से निपटाने की उनकी प्रतिबद्धता भी इसमें दिखती है।
पश्चिम बंगाल और सिक्किम के बीच सबसे जरूरी मुद्दा तीस्ता नदी से जुड़ा है। गौरतलब है कि तीस्ता नदी में अक्टूबर 2023 में भयंकर बाढ़ आई थी, जिससे नदी का तल काफ़ी ज़्यादा ऊपर उठ गया और बहुत बड़ा इलाका नदी के कटाव क्षेत्र में आ गया था। इससे समस्या यह आ रही है कि हर साल बारिश होने के साथ ही पानी सड़क पर आ जाता है और सिलीगुड़ी से गंगटोक के बीच की एकमात्र सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 10 बंद हो जाती है। साथ ही मामूली बारिश पर भी आसपास के इलाक़ों में भयंकर बाढ़ आ जाती है। यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर सिक्किम का इलाका चीन से घिरा है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा का भी मामला है। इस मामले में तृणमूल सरकार का रवैया बेहद चिंताजनक रहा है।
बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इसके महत्व को समझा और तुरंत बंगाल, सिक्किम और संबंधित केंद्रीय एजेंसियों की एक हाई पॉवर कमेटी बनाने का निर्देश दिया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे तीन से चार दिन में एक शॉर्ट टर्म और एक लांग टर्म समाधान निकाल कर उन्हें इसके बारे में बताएं। सिक्किम के मुख्यमंत्री के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में हुई प्रशासनिक बैठक में उन्होंने सभी अधिकारियों को स्पष्ट रूप से कहा कि सिक्किम और बंगाल भाई भाई है, दोनों में डबल इंजन की सरकार है, आप लोग पुराना ढर्रा बदल दीजिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वे ना की जगह हां बोलने की मानसिकता बना लें। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि हर मुद्दे का त्वरित निराकरण पहले स्तर पर ही होना चाहिए और सभी मुद्दों का मुख्यमंत्री के पास पहुंचना अधिकारियों की विफलता मानी जाएगी। यह दिखाता है कि कैसे सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के अधिकारियों पर भरोसा किया है और उनको सही फैसला करने के लिए प्रेरित किया है। परंतु उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि पिछली सरकार में अधिकारियों को काम अटकाने, भटकाने और लटकाने का प्रशिक्षण मिला है। वे सुवेंदु सरकार में भी ऐसा करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा न हो यह मुख्यमंत्री को हर हाल में सुनिश्चित करना होगा।
बहरहाल, सिक्किम और बंगाल के बीच बरसों से लंबित दूसरा मुद्दा दोनों राज्यों के बीच परिचालित होती टैक्सियों के परमिट की संख्या बढ़ाने का था। यह सीधे आम नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा मुद्दा था। टैक्सियों की संख्या सीमित होने की वजह से लोगों को परेशानी उठानी पड़ती थी। परमिट की संख्या बढ़ाने की मांग पर तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने कभी ध्यान नहीं दिया। परंतु मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने उसी समय एक फ़ोन कॉल करके इस मसले को सुलझा दिया।
तीसरा महत्वपूर्ण लंबित मामला सिक्किम सरकार के प्रस्तावित सिलीगुड़ी स्थित जन कल्याण भवन का था। इसके निर्माण की मंजूरी से जुड़ी सारी प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने भूमिपूजन से एक रात पहले नक्शे की मंजूरी रद्द कर दी थी, जिससे निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका था। यह भी सिक्किम के आम लोगों से जुड़ा मामला था। उस समय सिक्किम सरकार में एक राय यह थी कि इसे कानूनी रूप से चुनौती दी जाए। परंतु मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग ने इस भरोसे के साथ थोड़े दिन इंतजार करने का फैसला किया कि राज्य में सरकार बदलेगी औऱ भाजपा की सरकार आएगी तो तुरंत यह काम होगा। उनका भरोसा सही साबित हुआ। तृणमूल कांग्रेस की विदाई हुई और भाजपा की सरकार बनी। सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री गोले के साथ पहली ही मुलाकात में फ़ोन पर अधिकारियों को तत्काल इसकी मंजूरी का निर्देश दिया। सुवेंदु अधिकारी के शब्द थे, ‘डू इट नाओ टूडे, नो टुमारो’। और शाम तक तक आदेश जारी हो गया।
सिक्किम के साथ बरसों से लंबित इन तीन मुद्दों का जिस त्वरित अंदाज में समाधान हुआ उसके उदाहरण से समझा जा सकता है कि सुवेंदु अधिकारी की सरकार आने वाले दिनों में किस अंदाज में काम करने वाली है। यह इस बात का संकेत है कि पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के साथ पश्चिम बंगाल वास्तविक अर्थों में गेटवे का काम करेगा। वहां गेट बंद करके राज्यों के विकास को बाधित करने या आम नागरिकों की मुश्किल बढ़ाने या राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने का काम अब नहीं होगा। ध्यान रहे राज्यों के बीच सीमा से लेकर पानी और तस्करी से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक के कई मुद्दे जुड़े हैं। सुवेंदु अधिकारी के बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद इन सारे मुद्दों का समाधान आसान हो जाएगा। कह सकते हैं कि अब बंगाल अपने साथ साथ देश और पूर्वोत्तर के राज्यों के विकास का एक्सप्रेसवे बनने जा रहा है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
