केवल नारे लगाने से चुनाव आयुक्त नहीं हटेगा। आरोपों को प्रमाण में बदलना होगा। बूथवार हटाए गए नाम, उनके कारण, शिकायतें, आयोग के जवाब और न्यायालयों के आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड में आने चाहिए। ऐसा रिकॉर्ड जिसे कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस झुठला न सके। आयोग के दूसरे सदस्यों की भी जिम्मेदारी है। यदि उन्होंने भीतर आपत्तियाँ उठाई हैं तो देश को जानने का अधिकार है कि वे क्या थीं।
दिल्ली में तिरपन साल का कमता प्रसाद दर्जी है। पैंतीस वर्षों से वोट डालता आया है। लेकिन 2026 में मतदाता सूची के पुनरीक्षण ने उसे मृत घोषित कर दिया। अब वह एक सरकारी दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर लगा रहा है। यह साबित करने के लिए कि वह जिंदा है। हर दिन की भागदौड़ में उसकी ढाई सौ रुपए की मजदूरी जाती है। इसी कमाई से चार लोगों का परिवार चलता है। अधिकारी भरोसा देते हैं कि नाम वापस जुड़ जाएगा। मगर कब? उसके इलाके में नौ हजार मतदाताओं में से लगभग दो हजार नाम कटने का अनुमान है। पूरी दिल्ली में मसौदा सूची से 42 लाख नाम हटाए गए। रॉयटर्स के अनुसार देश भर में करीब 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं।
भारत में जिंदा आदमी को सरकारी कागजों में मृत घोषित करने की कहानी नई नहीं है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में 1975 में लाल बिहारी को उसके चाचा ने एक अधिकारी को रिश्वत देकर मृत दर्ज करवा दिया था। मकसद उसकी एक एकड़ से भी कम जमीन हड़पना था। लाल बिहारी को अपने जीवित होने का सरकारी प्रमाण पाने में उन्नीस वर्ष लगे। उसने अपने नाम के साथ ‘मृतक’ जोड़ लिया और ऐसे लोगों का संगठन बनाया जिन्हें सरकारी रिकॉर्ड ने जीते-जी मार दिया था।
तब एक अधिकारी, एक रिश्वत और एक जमीन का मामला था। आज वही सवाल करोड़ों मतदाताओं के सामने है। गलती से हो या जानबूझकर, अपने जीवित होने का प्रमाण नागरिक को देना पड़ रहा है।
जबकि भारतीय गणतंत्र की शुरुआत इसके ठीक उलट विश्वास से हुई थी।
1951 में पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के सामने 17 करोड़ 30 लाख मतदाताओं का चुनाव कराने की चुनौती थी। इनमें अधिकांश निरक्षर थे। हर उम्मीदवार के लिए चुनाव चिह्न वाला अलग मतपेटी रखी गई। मतदाता परदे के पीछे जाकर अपनी पसंद की पेटी में पर्ची डालता था। पूरी व्यवस्था एक विश्वास पर टिकी थी कि गरीब से गरीब नागरिक का वोट उसी तरह गिना जाएगा जैसा उसने चाहा है।
लोगों ने भरोसा किया। उसी भरोसे पर भारतीय गणतंत्र खड़ा हुआ।
पचहत्तर वर्ष बाद सवाल उसी भरोसे का है। चुनाव आयोग उसे आदेश से पैदा नहीं कर सकता। और एक बार वह खत्म हुआ तो कोई कानून उसे वापस नहीं ला सकता।
संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए अनुच्छेद 324 में मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा दी। उसे विशेष संसदीय प्रक्रिया के बिना हटाया नहीं जा सकता। मकसद था कि सरकार अपनी सुविधा से चुनाव आयुक्त को निकाल न सके।
लेकिन संविधान निर्माताओं ने शायद यह कल्पना नहीं की थी कि सरकार उसे हटाने के बजाय अपनी पसंद का व्यक्ति नियुक्त करने की व्यवस्था बना लेगी।
मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश की समिति बनाई। संसद ने उसी वर्ष कानून बदल दिया। प्रधान न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री आ गया। तीन सदस्यीय समिति में सरकार के दो सदस्य हो गए।
फरवरी 2025 में इसी व्यवस्था से ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने। विपक्ष के नेता ने असहमति जताई। सर्वोच्च न्यायालय में कानून की वैधता पर सुनवाई लंबित होने के कारण नियुक्ति टालने को कहा। लेकिन दो सदस्यों के बहुमत ने फैसला कर लिया। आधी रात के आसपास नाम घोषित हुआ।
इसके बाद बिहार की मतदाता सूची के पुनरीक्षण में 65 लाख नाम मसौदा सूची से हटे। आयोग ने पहले व्यक्तिगत नाम और कारण सार्वजनिक नहीं किए। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बूथवार सूची और कारण प्रकाशित हुए।
बिहार में मिंटू पासवान को मृत दिखाया गया। वह सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। उसका सवाल था कि नाम काटते समय कोई दस्तावेज नहीं माँगा गया, लेकिन वापस जुड़वाने के लिए बैंक के कागज, स्कूल प्रमाणपत्र और आधार कार्ड माँगे जा रहे हैं।
यही पूरी समस्या है। सरकार को बताना चाहिए कि नागरिक वोट क्यों नहीं दे सकता। उलटे नागरिक को साबित करना पड़ रहा है कि वह मौजूद है।
पश्चिम बंगाल में मार्च 2026 तक 63.66 लाख नाम हटाए गए और लगभग 60 लाख मामलों को न्यायिक जाँच के लिए भेजा गया। जिन 22 लोगों को मृत बताया गया था, वे कोलकाता में मुख्यमंत्री के साथ धरने पर बैठे। कर्नाटक में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरे मतदाताओं की श्रेणियों में लगभग 1.08 करोड़ नाम आए। एक प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार इनमें 85 प्रतिशत मामले मृत्यु के अतिरिक्त कारणों से संबंधित थे।
आयोग का तर्क है कि वह मृत, दोहरे और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटा रहा है। गलत नाम कटने पर सुधार का अवसर है। निस्संदेह ऐसी प्रविष्टियाँ भी होंगी जिन्हें हटाना जरूरी था। मगर सवाल यह है कि गलती आयोग करे और उसकी कीमत नागरिक चुकाए, यह कैसी व्यवस्था है?
दिल्ली में कमल लाल को स्थानांतरित बता दिया गया, जबकि वह उसी फ्लाईओवर के नीचे रहता है। कांग्रेस द्वारा 31 अक्टूबर को आयोजित जन महाभियोग में कुन्ने लाल ने बताया कि कोई बूथ अधिकारी उसके घर आया ही नहीं। फिर भी वह मृत दर्ज हो गया। अनिता जायसवाल ने बताया कि मतदाता पहचानपत्र उसके बैंक खाते, मुकदमे और बेटी की छात्रवृत्ति से जुड़ा था। नाम कटने का असर केवल मतदान पर नहीं पड़ा।
सितंबर 2026 तक आयोग के भीतर भी असहमति सामने आई। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार दस महीनों में दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर चौदह बार सवाल उठाए। लेकिन देश को यह जानकारी आयोग से नहीं, अखबार से मिली।
यही संस्थागत संकट है।
नरेंद्र मोदी सरकार के बारह वर्षों में संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सवाल लगातार उठे हैं। 2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को आचार संहिता संबंधी शिकायतों में क्लीन चिट देने से असहमति जताई। बाद में उनके परिवार के सदस्यों की आयकर जाँच हुई। अगस्त 2020 में उन्होंने इस्तीफा दिया। नवंबर 2022 में अरुण गोयल ने सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और अगले दिन चुनाव आयुक्त नियुक्त हो गए। सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्ति की असाधारण तेजी पर सवाल किया।
इन घटनाओं के अपने-अपने सरकारी स्पष्टीकरण हैं। लेकिन साथ रखकर देखने पर संस्थाओं की नियुक्तियों और स्वतंत्रता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
याद करें, 15 अगस्त 2014 को लाल किले से मोदी ने स्वयं को प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक कहा था। उसी समय सरकार ने नागरिकों के दस्तावेजों के स्वप्रमाणीकरण की व्यवस्था बढ़ाने का फैसला किया। गरीब को किसी राजपत्रित अधिकारी से कागज प्रमाणित कराने के लिए भटकना न पड़े।
बारह वर्ष बाद वही नागरिक फिर सरकारी दफ्तरों में अपनी पहचान साबित करने को मजबूर है।
पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के सामने पहुँची अपीलों का अनुभव और गंभीर है। अगस्त तक लगभग 82 हजार अपीलें निपटी थीं। इनमें 91 प्रतिशत में नाम बहाल करने का आदेश हुआ। लाखों लोग अपील तक नहीं कर पाए। सवाल है, यदि न्यायिक जाँच में इतनी बड़ी संख्या में नाम बहाल हो रहे हैं तो प्रारंभिक सूची से उन्हें हटाने की प्रक्रिया कितनी भरोसेमंद थी?
मार्च 2026 में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के नोटिस दिए। अप्रैल में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। संविधान ने हटाने का रास्ता दिया है, लेकिन उस रास्ते की शुरुआत ही नहीं हो सकी।
तब जनता क्या करे?
केवल नारे लगाने से चुनाव आयुक्त नहीं हटेगा। आरोपों को प्रमाण में बदलना होगा। बूथवार हटाए गए नाम, उनके कारण, शिकायतें, आयोग के जवाब और न्यायालयों के आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड में आने चाहिए। ऐसा रिकॉर्ड जिसे कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस झुठला न सके।
आयोग के दूसरे सदस्यों की भी जिम्मेदारी है। यदि उन्होंने भीतर आपत्तियाँ उठाई हैं तो देश को जानने का अधिकार है कि वे क्या थीं।
लोकतांत्रिक असहयोग का रास्ता भी है। गांधी ने अन्याय से असहयोग को नागरिक कर्तव्य माना था। आयोग के औपचारिक आयोजनों, दिखावटी परामर्श और केवल तस्वीर खिंचवाने वाली बैठकों से दूरी बनाई जा सकती है। लेकिन मतदान का बहिष्कार नहीं होना चाहिए। संदिग्ध चुनाव व्यवस्था का जवाब मतदान छोड़ना नहीं, अधिक मतदान और अधिक निगरानी है।
1990 के दशक में टी. एन. शेषन ने दिखाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करे तो राजनीतिक दलों को भी नियम मानने पड़ते हैं। वे अधिकार आज भी आयोग के पास हैं। लेकिन केवल व्यक्ति बदलने से समस्या हल नहीं होगी। ज्ञानेश कुमार हटें और अगला आयुक्त भी उसी दो-एक के बहुमत से चुना जाए तो बदलेगा क्या?
इसलिए दो माँगें साथ होनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही और नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता। मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने जिस समिति की व्यवस्था की थी, उसे कानून और संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। सरकार, विपक्ष और न्यायपालिका की ऐसी भागीदारी जिसमें किसी एक पक्ष का निर्णय पहले से निश्चित न हो।
यह आसान नहीं है। लेकिन असंभव भी नहीं।
1975 में भारत ने इससे अधिक कठोर समय देखा था। प्रेस पर सेंसरशिप थी। विपक्ष जेल में था। नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित थीं। इक्कीस महीने बाद जनता ने सरकार बदल दी। हिंसा से नहीं, मतदान से। मार्च 1977 में मतदाता कतार में खड़े हुए और सत्ता बदल गई।
उस समय चुनाव आयोग ने वोट ईमानदारी से गिने थे। वही भारतीय गणतंत्र के जीवित होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।
आज संकट इसी भरोसे का है।
गणतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं है। यह विश्वास भी है कि वोट किसी ऐसे व्यक्ति की निगरानी में गिना जाएगा जिससे मतदाता को डरने की जरूरत न हो।
मतदाता की उँगली पर लगी स्याही कुछ सप्ताह में मिट जाती है। लेकिन उसका अर्थ स्थायी होना चाहिए। वोट मतदाता का है, किसी सरकार या चुनाव आयुक्त की संपत्ति नहीं।
1951 में करोड़ों निरक्षर भारतीयों ने एक मतपेटी पर भरोसा किया था। आज मिंटू पासवान, कमता प्रसाद और कुन्ने लाल उसी भरोसे को वापस माँग रहे हैं।
वे जिंदा हैं। लेकिन व्यवस्था उनसे उनके जिंदा होने का प्रमाण माँग रही है।
और सवाल केवल इन लोगों का नहीं है। सवाल उस गणतंत्र का है जिसने नागरिक को सर्वोपरि माना था। यदि अब नागरिक ही अपने अस्तित्व का प्रमाण देने के लिए सरकारी दरवाजों पर खड़ा है तो गणतंत्र किसके लिए है?
जिस भरोसे से जनता ने गणतंत्र बनाया था, उसे वापस माँगने का अधिकार भी उसी जनता का है।
