31 मार्च को कोठानूर इलाके के एक हाई-राइज अपार्टमेंट में एक युवा तकनीकी जोड़ी ने आत्महत्या कर ली। पति भानुचंद्र रेड्डी (32) और पत्नी बीबी शाजिया सिराज (31)। दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर, दोनों की कमाई लाखों में, अमेरिका में काम का अनुभव, 80 लाख का सालाना पैकेज और सफलता की सारी बाहरी निशानियां। लेकिन अंदर से?
बेंगलुरु, जिसे भारत की आईटी राजधानी के नाम से भी जाना जाता है, पिछले दिनों एक ऐसी घटना से हिल गया है जो न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है। गत 31 मार्च को कोठानूर इलाके के एक हाई-राइज अपार्टमेंट में एक युवा तकनीकी जोड़ी ने आत्महत्या कर ली। पति भानुचंद्र रेड्डी (32) और पत्नी बीबी शाजिया सिराज (31)। दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर, दोनों की कमाई लाखों में, अमेरिका में काम का अनुभव, 80 लाख का सालाना पैकेज और सफलता की सारी बाहरी निशानियां। लेकिन अंदर से? नौकरी खोने का भय और बढ़ता तनाव। ठीक उसी दिन जब वैश्विक स्तर पर एआई की वजह से आईटी सेक्टर में भारी छंटनी की खबरें आ रही थीं।
भानुचंद्र अमेरिका में काम कर रहे थे। एआई टूल्स के कारण उनकी टीम में छंटनी हुई और उनकी नौकरी चली गई। भारत लौटकर वे नई नौकरी की तलाश में लगे, लेकिन असफल रहे। चिंता ने उन्हें घेर लिया। स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने यही लिखा, “नौकरी की अनिश्चितता और लगातार दबाव।” पत्नी शाजिया आईबीएम में नाइट शिफ्ट कर रही थीं। सुबह 7:30 बजे घर लौटीं तो पति का कमरा अंदर से बंद था। सुरक्षा गार्ड ने दरवाजा तोड़ा तो भानुचंद्र फांसी पर लटक रहे थे। शाजिया ने 20 मिनट तक वह दृश्य देखा। फिर वे अचानक 18वें फ्लोर पर पहुंचीं और वाहन से नीचे कूद गईं।
यह घटना एआई क्रांति की उस काली साइड का प्रतीक है जो कल तक ‘भविष्य की तकनीक’ मानी जा रही थी। ठीक उसी दिन, 31 मार्च 2026 को, अमेरिकी सॉफ्टवेयर दिग्गज ओरेकल (Oracle) ने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। कंपनी एआई डेटा सेंटर बनाने के लिए भारी निवेश कर रही है। 2026 में 500 करोड़ डॉलर से ज्यादा का कैपिटल निवेश भी किया। लेकिन इस खर्च को पूरा करने के लिए उसने लागत घटाने का फैसला किया। CNBC, ब्लूमबर्ग और बिजनेस इंसाइडर की रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 20,000-30,000 तक के कर्मचारी प्रभावित हुए हैं।
ओरेकल अकेली नहीं। 2026 में एआई की वजह से बिग टेक की छंटनी की लहर चल रही है। अमेजन ने जनवरी में 16,000 कॉर्पोरेट जॉब्स काटे। माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 15,000 पद घटाए। मेटा, एटलासियन, ब्लॉक आदि सभी कंपनियां एआई के नाम पर कर्मचारियों को ‘रिडंडेंट’ बता रहे हैं। भारत में भी आईटी सेक्टर में 2017 से अब तक 227 से ज्यादा सुसाइड केस दर्ज हुए हैं। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार कुल 1,71,418 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें युवा प्रोफेशनल्स (25-40 साल) की संख्या सबसे ज्यादा हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे हर शहर में एआई छंटनी का डर युवाओं को घेर रहा है।
समस्या सिर्फ नौकरी चले जाने की नहीं। समस्या है उस चिंता की भी है, जो एआई के नाम पर पैदा हो रही है। एआई टूल्स कोडिंग, डेटा एनालिसिस, यहां तक कि सॉफ्टवेयर डिजाइन में इंसानों से बेहतर साबित हो रहे हैं। कंपनियां सोच रही हैं कि,’कम लोगों से ज्यादा काम’। लेकिन कर्मचारी? उनके लिए यह जीवन-मरण का सवाल बन गया है। ईएमआई, लोन, परिवार की जिम्मेदारी, सब कुछ एक नौकरी पर टिका है। जब नौकरी चली जाती है, तो चिंता डिप्रेशन में बदल जाती है। और समाज? हम अभी भी इसे ‘व्यक्तिगत कमजोरी’ मानते हैं।
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे कहता है कि 80% लोग मानसिक बीमारी का इलाज नहीं लेते। वजह, ‘कलंक’ और सुविधाओं की कमी। भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर सिर्फ 0.75 साइकिएट्रिस्ट हैं। जिला स्तर पर मनोवैज्ञानिक क्लिनिक नाममात्र के। हमें एक मजबूत ‘साइकोलॉजिकल इकोसिस्टम’ की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे सामान्य अस्पतालों का नेटवर्क है। हर जिले में फुल-टाइम मेंटल हेल्थ सेंटर, फ्री या सस्ती ओपीडी, टेली-मेंटल हेल्थ, आयुष्मान भारत में मानसिक स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य। कॉर्पोरेट कंपनियों को कर्मचारी सहायता कार्यक्रम (ईएपी) अनिवार्य करने होंगे लेआउफ के समय न सिर्फ आउटप्लेसमेंट, बल्कि मानसिक सहायता भी देनी चाहिए।
लेकिन इलाज सिर्फ दवाओं और काउंसलिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारतीय संस्कृति में सदियों से ध्यान, योग और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ चिंता पर विजय पाने का रास्ता बताते हैं। जब एआई छंटनी का दबाव बढ़े, तो आध्यात्मिक मार्गदर्शन मन को स्थिरता दे सकता है। भगवद्गीता में कर्मयोग की शिक्षा है—कर्म करो, लेकिन फल की चिंता मत करो। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”। यह सिखाता है कि नौकरी चली जाए तो भी आत्मसम्मान और जीवन का अर्थ खत्म नहीं होता।
ध्यान और योग एंग्जायटी को कम करने में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में अब ‘माइंडफुलनेस’ प्रोग्राम चल रहे हैं। कई कंपनियां कर्मचारियों के लिए योग सेशन्स और आध्यात्मिक सत्र आयोजित कर रही हैं। आध्यात्मिक गुरुओं और काउंसलर्स का कहना है कि जब मन अशांत हो, तो प्रार्थना, सत्संग या गीता पाठ से आंतरिक शक्ति जागृत होती है। यह चिंता को ‘स्वीकार’ करने की क्षमता देता है, कि बदलाव जीवन का हिस्सा है, लेकिन हम उससे ऊपर उठ सकते हैं। ध्यान रखें, आध्यात्मिक मार्गदर्शन पेशेवर मनोचिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक है। जब डॉक्टर की दवा के साथ ध्यान और गीता का ज्ञान जुड़ जाए, तो रिजल्ट बेहतर होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि आध्यात्मिक प्रैक्टिस डिप्रेशन के मरीजों में रिकवरी रेट बढ़ाती है।
सरकार, कॉर्पोरेट और समाज को मिलकर काम करना होगा। स्कूल-कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी शामिल करें। मीडिया आत्महत्या की खबरों को संवेदनशील तरीके से कवर करे। परिवारों में खुली बातचीत का माहौल बने। बेंगलुरु की यह त्रासदी और ओरेकल जैसी कंपनियों की छंटनी हमें चेतावनी दे रही है। एआई भविष्य है, लेकिन बिना मानवता के नहीं। जब हम मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक बीमारी की तरह देखेंगे, जब अस्पतालों की तरह साइकोलॉजिकल सेंटर्स हर जगह होंगे और जब आध्यात्मिक मार्गदर्शन हमें अंदर से मजबूत करेगा, तब ही हम इस दबाव को पार कर पाएंगे।
भानुचंद्र और शाजिया सिर्फ एक जोड़ी नहीं थे। वे हजारों उन युवा आईटी प्रोफेशनल्स का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आज भी चुपचाप एआई छंटनी की चिंता में जूझ रहे हैं। समय आ गया है कि हम बदलें। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को एक साथ देखें। तभी एक स्वस्थ, सशक्त और संतुलित भारत बनेगा।
