कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों सबूत जुटाने के लिए मेहनत भी नहीं करना चाहते हैं। अगर कांग्रेस को लगता है कि सचमुच वोट चोरी हुई है या सचमुच एसआईआर से करोड़ों वास्तविक मतदाताओं के नाम कट गए हैं तो उसे ऐसे लोगों को सामने लाना चाहिए। इस मामले में कांग्रेस पार्टी महात्मा गांधी से सीख सकती है।…. महात्मा गांधी ने 10 हजार किसानों के बयान दर्ज कराए। सबकी डिटेल लिखी गई और 10 हजार लोगों की गवाही के साथ महात्मा गांधी ने अंग्रेज जज के सामने अपना मुकदमा प्रस्तुत किया।
विपक्ष ने भारतीय जनता पार्टी को एक नया नारा दे दिया है। पहले भी जब कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर कोई हमला करती थी या हमले के लिए नारा गढ़ती थी तो उसका उलटा ही असर होता था। कांग्रेस का नारा भाजपा को लाभ पहुंचाने के राजनीतिक विमर्श में बदल जाता था। जैसे अभी बिहार में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम में एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा, ‘मोदी कहीं नहीं जाएगा’। अब यह भाजपा के प्रचार की टैग लाइन बन गई है। प्रधानमंत्री दो दिन के गुजरात दौरे पर थे, जहां इस नारे के प्लेकार्ड लेकर लोग सड़कों पर खड़े थे। अब भाजपा कह रही है ‘देश को आत्मनिर्भर बनाए बगैर, देश को टॉप इकोनॉमी बनाए बगैर, भारत को विकसित बनाए बगैर, मोदी कहीं नहीं जाएगा’। कांग्रेस के लिए मुश्किल यह भी है कि जब उसके एक कार्यकर्ता ने यह बात कही थी तो जवाब में मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री के पिता को लेकर एक बयान दिया था, उसे अब पार्टी दोहरा भी नहीं सकती है। सो, तीर उसके हाथ से निकल गया, जिसे भाजपा ने अपना हथियार बना लिया।
याद करें कैसे राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाया तो देश भर में ‘मैं भी चौकीदार’ का अभियान चला। या ‘सूट बूट की सरकार’ का आरोप कैसे ‘सूझ बूझ की सरकार’ में बदल गया। वैसे ही ‘मोदी कहीं नहीं जाएगा’ अब आगे के चुनाव के लिए भाजपा का नारा बन गया है। इसके जरिए भाजपा नरेंद्र मोदी के कामकाज की निरंतरता का मुद्दा लोगों की दिल दिमाग में बैठाएगी। यह प्रचार होगा कि देश के लिए प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जरूरी हैं। कह सकते हैं कि कांग्रेस ने जो ईंट उनकी ओर उछाली उसे उन्होंने अपने लिए ढाल बनी ली। अब तक पिछले साढ़े 12 साल में यही होता आया है। तभी कांग्रेस नेताओं की बेचैनी बढ़ रही है। उसके नेता अनाप शनाप बातें कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं। जब तक कांग्रेस अपने आरोपों को साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश नहीं करेगी तब तक लोगों को उस पर यकीन नहीं होगा। अब भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और वोट चोरी को लेकर कांग्रेस जो धारणा बनाने की कोशिश कर रही है उसमें उसके पास कोई ठोस सबूत नहीं है।
कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों सबूत जुटाने के लिए मेहनत भी नहीं करना चाहते हैं। अगर कांग्रेस को लगता है कि सचमुच वोट चोरी हुई है या सचमुच एसआईआर से करोड़ों वास्तविक मतदाताओं के नाम कट गए हैं तो उसे ऐसे लोगों को सामने लाना चाहिए। इस मामले में कांग्रेस पार्टी महात्मा गांधी से सीख सकती है। महात्मा गांधी ने भारत आने के बाद पहला सत्याग्रह चंपारण में किया, जहां उन्होंने किसानों के शोषण का मुद्दा उठाया। उस समय उन्होंने एक सिद्धांत स्थापित किया, जिसका सार यह है कि सत्य इस रूप में सामने आना चाहिए कि उसे आप कहीं भी प्रस्तुत कर सकें और उस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सके। इसके लिए महात्मा गांधी ने 10 हजार किसानों के बयान दर्ज कराए। सबकी डिटेल लिखी गई और 10 हजार लोगों की गवाही के साथ महात्मा गांधी ने अंग्रेज जज के सामने अपना मुकदमा प्रस्तुत किया। सबूत ऐसे अकाट्य थे और सत्य इतना प्रत्यक्ष था कि अंग्रेज जज भी अंग्रेजी हुकूमत का बचाव नहीं कर सका। किसान मुकदमा जीत गए और नील की खेती में होने वाला शोषण बंद हो गया।
किसानों को इस शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए गांधी पहले चंपारण गए। उन्होंने अपनी आंखों से किसानों की दुर्दशा देखी। जब उनको भरोसा हो गया कि सचमुच किसान बहुत तकलीफ झेल रहे हैं तब उन्होंने सत्याग्रह का अभियान शुरू किया। उसी तरह अगर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी, जो आरोप लगा रहे हैं उसको लेकर अगर उनके मन में भरोसा है। उनको लग रहा है कि सचमुच वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे हैं तो वे भी महात्मा गांधी की तरह सबूत इकट्ठा करें। लाखों नहीं तो कम से कम हजारों मतदाताओं के नाम, पते, इपिक नंबर आदि के साथ उनका हलफनामा तैयार कराएं और उनके सत्य को इस रूप में प्रस्तुत करें कि कोई उस पर सवाल नहीं उठा सके।
उस समय तो महात्मा गांधी को अंग्रेज जज के सामने अपनी बात रखनी थी। लेकिन अभी तो विपक्षी पार्टियों के सामने कई मंच हैं, जहां वे सबूत पेश कर सकते हैं। राहुल गांधी विपक्षी नेताओं के साथ नौ अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने गए थे। वहां उन्होंने वोट चोरी के आरोपों का ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा। खुद बाहर कर राहुल और विपक्षी नेताओं ने कहा कि राष्ट्रपति ने इसके सबूत देने को कहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वे सबूत देंगे। लेकिन अब इस बात के तीन हफ्ते से ज्यादा हो गए हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि विपक्ष अभी तक सबूत नहीं जुटा पाया है। इसी तरह 12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया था और एसआईआर रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उस याचिका पर भी एक सुनवाई हो गई और आगे की सुनवाई 17 नवंबर को होने वाली है। विपक्ष मेहनत करके सबूत जुटाए और उसे वहां प्रस्तुत करे। विपक्ष रविवार, एक नवंबर को रामलीला मैदान में रैली भी कर रहा है। कथित वोट चोरी के सबूतों को वहां भी प्रस्तुत किया जा सकता है। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को चुनौती दी है कि संसद का विशेष सत्र बुलाते हैं और विपक्ष वहां एसआईआर के हर पहलू पर चर्चा कर ले। लेकिन अफसोस की बात है कि विपक्ष की ओर से किसी भी मंच पर वोट चोरी के सबूत नहीं पेश किए जा रहे हैं।
इसका स्पष्ट अर्थ है कि विपक्ष को सिर्फ धारणा की लड़ाई लड़नी है। उसे वोट चोरी का नैरेटिव भर बनाना है। असल में उसको भी पता है कि उसकी हार का कारण वोट चोरी नहीं है। हो सकता है कि एसआईआऱ के दौरान कुछ प्रक्रियागत गड़बड़ियां हुई हों। ‘एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट’ यानी ‘एएसडीडी’ श्रेणी में कुछ वास्तविक मतदाताओं के नाम भी कट गए हों। यह भी हो सकता है कि तार्किक विसंगति के मामले में कुछ त्रुटियां हों। कुछ मशीनी त्रुटि भी हो सकती है। हालांकि इन सबमें सुधार की प्रक्रिया लगातार चल रही है। लेकिन ऐसा दावा कोई नहीं कर सकता है कि इन कारणों से ही कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियां हार रही हैं। हाल ही में बैलेट पेपर से विधान परिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुआ और मतदाता सूची पर भी किसी विपक्षी पार्टी ने सवाल नहीं उठाया था। फिर भी कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीत पाई। कर्नाटक में जहां उसकी सरकार है वहां वह सभी चार सीटें हार गई।
इसलिए कांग्रेस पार्टी को अपनी हार के कारण तलाशने चाहिए। उसे राजनीति का यह बुनियादी सिद्धांत समझना चाहिए कि चुनावी राजनीति में विमर्श का अपना एक निश्चित स्थान होता है लेकिन राजनीति का विमर्श बिल्कुल अलग चीज है। अफसोस की बात है कि कांग्रेस राजनीति का विमर्श नहीं पकड़ पा रही है। वह हर दिन नया विमर्श खड़ा करके राजनीति को साधना चाहती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और एसआईआर रद्द कराने का मामला भी एक नया विमर्श है। अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस अपने संगठन और नेतृत्व की कमजोरी को ठीक करने का काम कर रही होती। एसआईआर और वोट चोरी का विमर्श किसी हाल में कांग्रेस को चुनावी जीत नहीं दिला सकता है। क्योंकि कांग्रेस इस कारण से हार ही नहीं रही है।
देश के लगभग आधे राज्य ऐसे हैं, जहां कांग्रेस तीन या चार दशक से नहीं जीत रही है। यानी ईवीएम आने के पहले और जब देश में कांग्रेस की सरकार होती थी तब से वह हार रही है। पश्चिम बंगाल में वह 50 साल से चुनाव नहीं जीती है। तमिलनाडु में 67 साल से कांग्रेस चुनाव नहीं जीती है। बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को चुनाव जीते 37 साल हो गए। गुजरात में भी वह 36 साल से हार रही है। त्रिपुरा और सिक्किम में वह करीब चार दशक से चुनाव नहीं जीती है। आंध्र प्रदेश में जहां 2004 से 2014 तक उसकी सरकार थी वहां तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता नहीं खुला है। क्या इन सभी राज्यों में कांग्रेस चुनाव आयोग के कारण हारती है? असल में कांग्रेस को छोड़ कर बाकी सबको उसका हाल पता है। सब जानते हैं कि उसके पास न नेतृत्व है, न नैरेटिव है और न संगठन है। ये तीन चीजें चुनावी सफलता के लिए सबसे जरूरी हैं। भाजपा के पास ये तीनों है। तभी उसका मुकाबला कांग्रेस सिर्फ आरोपों के सहारे नहीं कर सकती है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
