यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ कहा और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उस बात को जस का तस दोहरा दिया। जिस देश की अर्थव्यवस्था सात फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही हो क्या उसे ‘डेड इकोनॉमी’ नहीं कहा जा सकता है। राहुल गांधी भी इस बात को जानते हैं। हाल ही में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनों ने भारत की अर्थव्यवस्था की दर का अनुमान सुधारा और सात फीसदी किया।
बीते हफ्ते हुए तीन कार्यक्रम और उनसे निकले संदेश बहुत अहम हैं। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ यानी आरएसएस की स्थापना के शताब्दी वर्ष के समापन समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण से एक विशेष विमर्श आरंभ हुआ। उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस विमर्श को और आगे बढ़ाया। बाद में एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इस विमर्श को इसके सभी आयामों के साथ देश के नागरिकों के सामने रखा। इस विमर्श की सबसे अहम बात यह है कि विपक्ष यानी कांग्रेस, राहुल गांधी और अन्य नेता देश के खिलाफ लड़ रहे हैं और उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसा लग रहा है, जैसे विपक्ष भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लड़ते लड़ते देश के खिलाफ लड़ने लगा है। विपक्ष के नेताओं ने पहले केंद्रीय एजेंसियों की साख पर सवाल उठाए और अब सभी वैधानिक व संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा गिराने का काम किया जा रहा है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि कुछ विदेशी ताकतें भारत की प्रगति से ईर्ष्या करती हैं और वे भारत के खिलाफ साजिश कर रही हैं। निश्चित रूप से पहले भी सरकारें इस तरह के बातें करती थीं और विपक्ष पर विदेशी ताकतों से मिले होने के आरोप भी लगाती थीं। लेकिन पहले कभी विपक्ष का रवैया इतने प्रत्यक्ष रूप से विदेशी नैरेटिव से मिलता हुआ नहीं दिखता था। इसे कई बातों में स्पष्ट देखा जा सकता है। यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ कहा और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उस बात को जस का तस दोहरा दिया। जिस देश की अर्थव्यवस्था सात फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही हो क्या उसे ‘डेड इकोनॉमी’ नहीं कहा जा सकता है। राहुल गांधी भी इस बात को जानते हैं। हाल ही में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनों ने भारत की अर्थव्यवस्था की दर का अनुमान सुधारा और सात फीसदी किया। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है।
बहरहाल, यह भी सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है कि विपक्ष के प्रदर्शन का चेहरा बनीं वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा ने बांग्लादेश के प्रोटेस्ट से प्रेरणा लेने की बात कही। इसी तरह बार बार फ्रांस के हिंसक प्रोटेस्ट की मिसाल देने को भी सिर्फ संयोग नहीं माना जा सकता है। यह कितनी बड़ी बात है कि विपक्ष के एक सांसद ने अल्बानिया का सुप्रीम कोर्ट जलाए जाने का पुराना वीडियो शेयर किया। क्या यह देश की न्यायपालिका को दबाव में लाने का प्रयास नहीं है? यह भी क्या संयोग है कि कांग्रेस पार्टी की एक प्रदेश कमेटी के सोशल मीडिया हैंडल से और तृणमूल कांग्रेस की एक सांसद के हैंडल से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का नाम लेकर असम्मानजनक टिप्पणी की गई? विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ दल से लड़ने और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की बजाय ‘रिजीम चेंज’ की बात कर रही हैं। क्या ‘रिजीम चेंज’ जैसी शब्दावली का इस्तेमाल संयोग है?
इन सबसे जाहिर है कि विपक्षी पार्टियां अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी यानी भाजपा से सिर्फ राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़ रही हैं, बल्कि उनकी लड़ाई अब देश और देश की संस्थाओं से भी हो गई है। इसी बात की ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इशारा किया। उन्होंने संभवतः पहली बार इतने सख्त शब्दों में कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार के ऊपर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस कब तक एक फेल्ड प्रोडक्ट को लॉन्च करती रहेगी। प्रधानमंत्री ने तंज करने के अंदाज में रहा कि श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण रेंज से जितनी सेटेलाइट लॉन्च नहीं होती है उतनी बार राहुल गांधी को लॉन्च किया गया। दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली रैली से एक बार फिर राहुल गांधी को लॉन्च किया जाएगा। इससे पहले कितनी ही रैलियों और यात्राओं के जरिए उनको लॉन्च किया जा चुका है।
बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में एक और अहम बात कही। उन्होंने नेहरू गांधी परिवार को लेकर कहा कि यह परिवार अपनी पार्टी के लिए भी बोझ बन गया है। यह बहुत बड़ी टिप्पणी थी। कांग्रेस में भी ऐसा मानने वाले बहुत से नेता हैं कि परिवार के कारण पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा है। हालांकि कई लोग बार बार कहते हैं कि कांग्रेस को एक रखने के लिए नेहरू गांधी परिवार का होना जरूरी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इनके रहने के बावजूद कांग्रेस एक नहीं रह पाई है। ममता बनर्जी से लेकर शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी तक अनेक नेता पिछले तीन दशक में कांग्रेस से अलग हुए, अपनी पार्टी बनाई औऱ सरकार भी वनाई। इसके अलावा सैकड़ों अच्छे नेता कांग्रेस पार्टी छोड़ गए। प्रधानमंत्री इसी बात की ओर इशारा कर रहे थे।
असल में कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े पुराने नेता पार्टी छोड़ कर चले गए या पार्टी में हाशिए में डाल दिए गए। उनकी जगह वामपंथी विचार वाले और एनजीओ की मानसिकता वाले लोग कांग्रेस में और राहुल गांधी के आसपास भर गए। इसका असर राहुल की राजनीति में दिखता है। वे लगातार इस तरह की राजनीति करते हैं, जो भारत के राजनीतिक व सामाजिक मूल्यों के अनुकूल नहीं होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो वे एक नवंबर को दिल्ली में रैली नहीं कर रहे होते। देश के व्यापारी वर्ग ने चिट्ठी लिख कर उनसे कहा है कि दिवाली से ठीक पहले इस तरह की रैली से हजारों करोड़ का कारोबार प्रभावित होगा। लेकिन इसका राहुल गांधी और उनकी टीम पर कोई असर नहीं है।
राहुल गांधी की राजनीति को विपक्ष की एक पार्टी का राजनीतिक मामला बता कर अनदेखा भी किया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी इसलिए उसका कर कदम देश की लिहाज से बहुत अहम हो जाता है। यह सही है कि विपक्ष से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह सरकार की उपलब्धियों को स्वीकार करे। लेकिन उससे यह उम्मीद जरूर की जाती है कि वह ऐसी बातों पर सवाल नहीं उठाया या उनका विरोध न करे, जो देश हित की हैं। मिसाल के तौर पर भारत में मतदाता सूची कि शुद्धिकरण का काम चल रहा है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआऱ की प्रक्रिया चल रही है और हो सकता है कि इसमें कुछ प्रशासनिक कमियां हों लेकिन इसे वोट चोरी कहना जिम्मेदार विपक्ष का काम नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था सात फीसदी की दर से बढ़ रही है तो इसे ‘डेड इकोनॉमी’ कहना जिम्मेदार विपक्ष का काम नहीं है। एक के बाद एक दुनिया के देशों के साथ भारत मुक्त व्यापार संधि कर रहा है, जिसका लाभ भारत के हर समूह को मिल रहा है, जिससे भारत का निर्यात लगातार बढ़ रहा है तो इसमें भी कमियां निकालना जिम्मेदार और रचनात्मक विपक्ष का काम नहीं है।
यह वास्तविकता है कि भारत में बहुत से ऐसे बुनियादी काम हो रहे हैं, जिनसे भारत की अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षेत्र के फंडामेंटल्स मजबूत हो रहे हैं। इसका असर आने वाले दिनों में और ज्यादा दिखाई देगा। अभी जो बुनियादी बनाई जा रही है उससे भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार और तेज होगी। इसका लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा। विपक्ष भले इन बातों को स्वीकार न करे लेकिन उसे अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश के अंदर और बाहर बैठी भारत विरोधी ताकतों के हाथ मजबूत करने वाले काम नहीं करने चाहिए। प्रधानमंत्री ने इसी ओर इशारा किया। देश के दुश्मन सिर्फ भारत के बाहर नहीं बैठे हैं, देश के अंदर भी हैं। उनको भी विपक्ष की इस राजनीति से ताकत मिलती है। वे देश में अराजकता की स्थिति पैदा होने का इंतजार कर रहे हैं। यह अनायास नहीं है कि दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील’ का नारा लिखा जा रहा है तो कहीं खालिस्तान का नारा लिखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि राहुल गांधी की कांग्रेस दिमागी नक्सलियों के नियंत्रण में चली गई है। कांग्रेस अगर इससे बाहर नहीं निकलती है तो उसका अपना नुकसान तो होगा ही वह देश का भी नुकसान कर सकती है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
