वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका समय आ गया है। ऐसा लगने में कोई बुराई नहीं है। जो विपक्ष में है उसे लगना चाहिए कि उसका समय आ गया है या आ रहा है। लेकिन सिर्फ लगने से कुछ नहीं होता है। कांग्रेस के बारे में अक्सर यह बात कही जाती है कि वह सत्ता में रहती है या सत्ता के इंतजार में रहती है। अभी राहुल गांधी सत्ता का इंतजार कर रहे हैं। इंतजार जैसे जैसे लंबा होता जा रहा है वैसे वैसे उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। तभी हर छोटी बड़ी घटना पर वे यह मानने लगते हैं कि अब सरकार कमजोर हो गई है और उनका समय आ गया है, वे चुनाव जीत सकते हैं। तभी चुनाव आयोग को लेकर अंग्रेजी के एक अखबार ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की तो राहुल गांधी को लगा कि यह मौका है। सिर्फ उन्हीं को नहीं, बल्कि दूसरी विपक्षी पार्टियों को भी लगा कि यह एक बड़ा मौका है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगा कि यह बहुत बड़ा अवसर है और इस बहाने अपने को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
ममता बनर्जी तो इतनी उत्साहित हो गईं कि दशकों की दुश्मनी भूल कर सीपीएम के महासचिव एमए बेबी को फोन कर दिया। उनसे आग्रह किया कि वे विपक्षी पार्टियों को एकजुट करें। उन्होंने राहुल गांधी से अपील करते हुए कहा कि वे ‘इंडिया’ ब्ल़ॉक की बैठक बुलाएं। इसी तरह का उत्साह राहुल गांधी में भी दिखा। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें इस अंदाज में बात कर रहे थे, जैसे उनकी सरकार आ गई हो। वे मुख्य चुनाव आयुक्त से कह रहे थे कि वे इस्तीफा कर दें और सरकारी गवाह बन जाएं। इससे ऐसा लगा, जैसे देश में उनकी सरकार हो। लेकिन असल में उनके उत्साह का कोई ठोस आधार नहीं है। चाहे ममता बनर्जी हों या राहुल गांधी दोनों अपने अपने कारणों से मौजूदा हालात का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक अस्तित्व की चिंता है तो राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका सत्ता का इंतजार समाप्त होने वाला है। तभी आने वाले दिनों में इसी लाइन पर संपूर्ण विपक्ष की राजनीति देखने को मिलेगी।
परंतु वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है। चाहे चुनाव आयोग हो या कोई दूसरी एजेंसी वह किसी पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकती है। चुनाव जनता के वोट से जीता जाता है। जनभावना जिस पार्टी के साथ होती है वह चुनाव जीतती है। बाकी बातों का कोई खास अर्थ नहीं होता है। मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल का चुनाव देखा जा सकता है। 2021 में पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए बहुत अनुकूल माहौल दिख रहा था। लेकिन जनभावना तृणमूल कांग्रेस के साथ थी तो भाजपा नहीं जीत सकी। इसके उलट 2026 में जनभावना ममता बनर्जी के खिलाफ हुई तो पुलिस और प्रशासन का सारा प्रबंधन होने के बावजूद वे खुद भी हारीं और पार्टी भी हार गई। ऐसी अनके मिसालें दी जा सकती हैं।
ध्यान रहे किसी भी पार्टी के चुनाव जीतने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। पहली, पार्टी का संगठन। दूसरी, एक करिश्माई नेतृत्व और तीसरी चीज है नैरेटिव। जिस पार्टी के पास मजबूत संगठन होगा, करिश्माई नेता होगा और धारणा पर नियंत्रण होगा वही चुनाव जीतेगा। इस समय ये तीनों चीजें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं। इसलिए वह लगातार चुनाव जीत रही है। दूसरी ओर अगर कांग्रेस की बात करें तो उसके पास सबसे बड़ी कमजोरी संगठन की है। उसका संगठन बहुत कमजोर है और राज्यों में भी उसके पास अच्छे नेताओं का अकाल है। प्रदेशों के ज्यादातर बड़े नेताओं ने अपनी प्रादेशिक पार्टी बना ली या कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। अगर नेतृत्व की बात करें तो पिछले 22 साल से लगातार मेहनत करके राहुल गांधी अपने को नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही है। नेतृत्व के मामले में विपक्ष में आपसी सहमति भी नहीं है। जहां तक धारणा का सवाल है तो विपक्ष के प्रति आम जनमानस में निगेटिव धारणा है। अगर विपक्ष के पास संगठन, नेता और नैरेटिव ये तीन चीजें नहीं हैं तो फिर वह भाजपा जैसी बड़ी पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे करिश्माई नेता को कैसे चुनौती दे पाएगा?
इसके बावजूद अगर राहुल गांधी हमलावर हैं तो उसका कारण यह है कि वे पूरे घटनाक्रम को गलत नजरिए से पढ़ रहे हैं। वे नेता प्रतिपक्ष हैं और इस नाते सरकार के खिलाफ बोलना या राजनीति करना उनका काम है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से वे सरकार और भाजपा का विरोध करते करते देश की संवैधानिक संस्थाओं का विरोध करने लगे हैं। अपने अति उत्साह में राहुल गांधी देश की संस्थाओं की साख को कमजोर करने और उनके ऊपर संदेह बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं। अंग्रेजी के एक अखबार ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर एक खुलासा किया तो उससे जुड़े मुद्दों पर सवाल करने की बजाय राहुल गांधी ने पूरी संस्था और उसकी साख पर सवाल खड़े कर दिए। वे इसको एक अलग ही दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्होंने मुख्य चुनाव आय़ुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का विरोध किया था और आपत्ति दर्ज कराई थी। हकीकत यह है कि उन्होंने बाकी दोनों आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी की नियुक्ति पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी। जाहिर है वे सेलेक्टिव होकर हमले कर रहे हैं। उनको चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आय़ुक्त रहे एमएस गिल को मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री बनाया था। नवीन चावला का विवाद भी कांग्रेस के राज का है, जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति के शिकायत की थी कि चावला कांग्रेस के आदमी हैं। वास्तविकता यह है कि कांग्रेस की सरकारों ने चुनाव आयोग जैसी संस्था का राजनीतिकरण किया था। यह भी एक तथ्य है कि कांग्रेस के शासन में सीधे सरकार ही चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करती थी।
बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि देश में एसआईआर जरूरी है या नहीं? इसका स्पष्ट जवाब है कि एसआईआर जरूरी है। मतदाता सूची में करोड़ों ऐसे लोगों के नाम हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है। लाखों ऐसे नाम हैं, जो डुप्लीकेट हैं। ऐसे नामों को हटा कर मतदाता सूची की पवित्रता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनावी आयोग की होती है। उसने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व के तहत यह काम किया है। अगर उसमें कहीं कोई त्रुटि है और नेता विपक्ष उसकी ओर ध्यान दिलाएं तो बात समझ में आती है। लेकिन यह दावा करना कि एसआईआर के कारण भाजपा जीत रही है या चुनाव आयोग के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी नहीं होती है, एक बचकानी बात है। कोई भी एजेंसी या संस्था किसी सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी को खत्म नहीं कर सकती है और न चुनाव जिता सकती है। ध्यान रहे एसआईआर की प्रक्रिया पिछले साल जून में शुरू हुई और कांग्रेस के हारने का सिलसिला उससे बहुत पुराना है। इसी साल एसआईआर के बीच पांच राज्यों में चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस केरल में जीती है और एक नई बनी पार्टी तमिलनाडु में जीत गई। इसलिए किसी भी घटना को एक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता होती है। हर चीज चुनावी राजनीति के लिए नहीं होती है।
असल में राहुल गांधी ढाई साल पहले ही अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इसके लिए वे पार्टी संगठन को मजबूत करते या जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम करते नहीं दिख रहे हैं। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनावी माहौल बना रहे हैं। वे चुनावी लाभ के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता प्रतिपक्ष अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आदि को देश को नष्ट करने वाला बता रहे हैं। वे सम्मानित उद्योगपतियों, राष्ट्रवादी संगठन से जुड़े लोगों और मीडिया की हस्तियों को भी देश विरोधियों की सूची में शामिल कर रहे हैं। इस तरह का एक्सट्रीम नैरेटिव पता नहीं उनको कितना चुनावी लाभ पहुंचाएगा लेकिन देश को निश्चित रूप से इसका नुकसान होगा। देश विरोधी शक्तियों को इन बातों से भारत विरोधी की गतिविधियां तेज करने का अवसर मिलता है। नेता प्रतिपक्ष के नाते उनको एक जिम्मेदार व्यक्ति के तौर पर बरताव करना चाहिए। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
