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शिक्षा, परीक्षा और युवाओं के भविष्य का सवाल

जिस समाज में मेहनत की जगह शॉर्टकट को और ईमानदारी की जगह जुगाड़को महत्व मिलेगा, वहां पेपर लीक परीक्षा-केंद्र तक सीमित घटना नहीं रहेगा। वह धीरे-धीरे स्वीकार्य सामाजिक व्यवहार में बदल जाएगा। याद रखिए शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, मनुष्य और समाज के बीच एक जागरूक, उत्तरदायी संबंध बनाना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में भरोसा दिया है, ‘देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है’। यह आश्वासन स्वागतयोग्य है। मौजूदा वक्त भी ऐसे ही भरोसे की मांग करता है। पर सवाल यह है कि युवाओं के भविष्य की यह चिंता ज़मीन पर कैसी दिखाई देती है? हमें देखना होगा कि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग, परीक्षा की मिलीजुली व्यवस्था इस मानक पर कितनी खरी उतरती है। आज जो हलचल है, वह कुछ तकनीकी गड़बड़ियों की सूची नहीं, हमारी सामूहिक नीति और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रतिफल है। एक ओर विद्यालय और विश्वविद्यालय हैं। दूसरी ओर कोचिंग की फैलती हुई दुनिया है। इनके बीच खड़ा युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त से अधिक उलझा और आशंकित दिखता है।

हाल की एक परिघटना इस सवाल को और गंभीरता दे रही है। दुनिया भर में उच्च शिक्षा पर नई बहस चल रही है। कई शिक्षाविद ‘डेथ ऑफ डिग्री’ की बात कर रहे हैं। आशय यह कि परंपरागत डिग्री का पुराना जादू टूट रहा है। कॉरपोरेट जगत में भी यह बदलाव दिखाई देता है। बड़ी तकनीकी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब केवल डिग्री नहीं देखतीं। वे यह जानना चाहती हैं कि अभ्यर्थी ने क्या बनाया है, वह कैसे सोचता है, अनिश्चितता में कैसे निर्णय लेता है। कई स्थानों पर भर्ती प्रक्रिया से कठोर डिग्री शर्तें हट चुकी हैं। तकनीकी दुनिया में यह पूछा जाने लगा है कि व्यक्ति कॉलेज ट्रांसक्रिप्ट (अंकपत्र) से ज़्यादा, अपने हुनर से क्या साबित कर सकता है? ऐसा नहीं है डिग्री का महत्व समाप्त हो गया है या फिर वह अप्रासंगिक बन गई है। पर उसका केंद्र ‘प्रमाणपत्र’ से ‘कार्यक्षमता’ की ओर खिसक रहा है।

ऐसे समय में भारत का शिक्षा विमर्श अब भी मुख्यतः डिग्री, रैंक और सीटों के इर्द-गिर्द घूमता है। ताज़ा आंकड़े इस परिदृश्य का एक अलग चेहरा दिखाते हैं। पहली बार देश में शिक्षकों की संख्या एक करोड़ के पार पहुंची है। भारत में लगभग 14.7 लाख विद्यालय हैं और 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी इन संस्थानों में पढ़ रहे हैं। यह बताता है कि दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्था आज भारत में है। शिक्षा मंत्रालय की हाल की रिपोर्टें, इसी तस्वीर को व्यवस्थित रूप में सामने रखती हैं। इसी गैप को भरने की एक कोशिश राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के रूप में सामने आई। प्रस्ताव यह है कि छठी से बारहवीं तक शिक्षा को केवल विषय-सूची से नहीं, कौशल और जीवन-योग्यताओं से जोड़ा जाए। स्कूली स्तर पर ही हस्त-कौशल, स्थानीय व्यवसाय, आधुनिक तकनीक और रचनात्मक क्षमताओं को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। मूल भाव यह है कि स्कूल से निकलने वाला विद्यार्थी परीक्षा पास करने के साथ-साथ काम करने, बनाने, समस्या सुलझाने और समाज से जुड़ने की वास्तविक क्षमता लेकर बाहर आए।

यह दिशा गांधी की बुनियादी तालिम के विचारों से भी जुड़ती है। गांधी बार-बार कहते थे कि साक्षरता मात्र शिक्षा नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री या रोज़गार नहीं, स्वावलंबी और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है, जो अपने श्रम और ज्ञान से समाज को मजबूत बनाए। यह दृष्टि आज भी हमें यह परखने का अवसर देती है कि हमारी डिग्री, परीक्षा और कोचिंग, इनसे वास्तव में समाज को क्या मिल रहा है।

कोचिंग संस्थान मूलतः सहायक साधन थे, पर धीरे-धीरे मुख्य मार्ग बन बैठे। अब छात्र पहले कोचिंग खोजते हैं। बाद में विद्यालय चुनते हैं। अभिभावक पहले बैच और फीस पूछते हैं। फिर कक्षा और पुस्तकालय की स्थिति देखते हैं। कोचिंग ने भय को पाठ्यक्रम बना दिया, असुरक्षा को व्यापार की पूंजी बना दिया। समय का मानक घड़ी नहीं, टेस्ट-सीरीज़ हो गया। यहां पाठ्यक्रम, तो ‘कवर’ होता है। पर, शिक्षा की मूल संकल्पना ‘संकुचित’ हो जाती है। छात्र उत्तर याद करते हैं या रटते हैं। पर प्रश्न पूछने की आदत या प्रश्नाकुलता नहीं बनती है। उनकी दुनिया ओएमआर शीट के गोलों में सिमट जाती है।

इस प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक असर गहरा है। असफलता किसी जीवन-यात्रा का हिस्सा नहीं, स्थायी ठप्पा बन जाती है। सहपाठी सहयोगी से अधिक प्रतिद्वंद्वी दिखने लगते हैं। आत्म-मूल्यांकन का पूरा ढांचा एक ही कसौटी, रैंक पर टिक जाता है। जब शिक्षा का घोषित उद्देश्य लगभग एकरेखीय हो जाए, तो संवेदना, सहकार और आलोचनात्मक विवेक स्वाभाविक रूप से पीछे हट जाते हैं।

हम परीक्षा-संकट की चर्चा में अक्सर पेपर लीक को उदाहरण के रूप में लेते हैं। आम तौर पर पूरी चर्चा सरकार और तंत्र की विफलता तक सीमित रहती है। यह आलोचना आवश्यक है, क्योंकि परीक्षा-प्रणाली की सुरक्षा राज्य की ज़िम्मेदारी है। पर असल सवाल यहीं समाप्त नहीं होता। सवाल यह भी है कि समाज के भीतर ऐसी प्रवृत्तियों के लिए मांग कहां से पैदा होती है।

अक्सर कहा जाता है कि कई विकसित देशों में पेपर लीक जैसी घटनाएं बहुत कम हैं। कारण यह नहीं कि वहां कोई जादुई तंत्र चल रहा है। बड़ा कारण यह है कि वहां समाज के भीतर लीक पेपर के लिए खुली मांग ही नहीं बनती। अभिभावक अपने बच्चों के लिए शॉर्टकट को ‘सफलता’ का वैध साधन नहीं मानते। वे उन्हें खरीदे हुए प्रश्न-पत्र से मिली उपलब्धि पर पुरस्कृत नहीं करते। पर, हमारे यहां स्थिति अलग है। हम कोचिंग संस्थानों पर लाखों रुपये ख़र्च करने को तैयार हैं। यदि कोई संस्थान यह विश्वास दिलाए कि वह ‘अंदर की सेटिंग’ करा देगा, तो हम उसके पीछे भी चल पड़ते हैं। कई जगह अभिभावक, शिक्षक और स्थानीय नेटवर्क मिलकर बच्चों के लिए ऐसे मार्ग तलाशते हैं। हालांकि वे खुद इसे स्वीकार नहीं करना चाहेंगे, पर बच्चों के भविष्य के नाम पर इसे उचित ठहराने की कोशिश करते हैं। पर, इसकी परिणति क्या है? यही कि पेपर लीक केवल ‘अपराध’ नहीं रहता, वह एक ‘सर्विस’ बन जाता है। इसकी कीमत तय होती है।

यहां समस्या दोहरी है। एक ओर हम सरकार से अपेक्षा रखते हैं कि वह हर तरह की धांधली रोके। दूसरी ओर हम स्वयं, सीधे या परोक्ष रूप से, ऐसी धांधलियों की मांग में हिस्सेदार बन जाते हैं। जिस समाज में मेहनत की जगह शॉर्टकट को और ईमानदारी की जगह ‘जुगाड़’ को महत्व मिलेगा, वहां पेपर लीक परीक्षा-केंद्र तक सीमित घटना नहीं रहेगा। वह धीरे-धीरे स्वीकार्य सामाजिक व्यवहार में बदल जाएगा। याद रखिए शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, मनुष्य और समाज के बीच एक जागरूक, उत्तरदायी संबंध बनाना है। जब दुनिया ‘डेथ ऑफ डिग्री’ की चर्चा के बीच नए प्रकार की सीख और प्रमाणिकता खोज रही है, तब हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे युवा केवल प्रमाणपत्र नहीं, वास्तविक क्षमता लेकर समाज में उतरें। जब यह संतुलन बनेगा, तब डिग्री केवल काग़ज़ नहीं रहेगी, सीख या कौशल का साक्षी बनेगी। (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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