ऐसी व्यवस्था, जो अच्छी शिक्षा नहीं देती, युवाओं से ही डरने लगती है!
सभ्यता अगली पीढ़ी में अपनी आशा निवेश करती है। नौकरशाही अगली पीढ़ी को फाइलों, नियमों और कट-ऑफ के बीच छांटती है। जब शिक्षा जैसी सृजनात्मक प्रक्रिया को केवल परीक्षा एजेंसियों की यांत्रिक व्यवस्था में बदल दिया जाता है, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती। यह उस गणराज्य के नैतिक उद्देश्य का क्षरण बन जाती है। जिस व्यवस्था का मूल काम ही करोड़ों युवाओं को बाहर रखना हो, वहा शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो सकती। किसी भी लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितनी कठिन परीक्षाएं लेता है। उसकी पहचान इससे होती है कि वह अपने...