आखिर यह कैसे संभव है कि तिमाही विकास दर 7.8 प्रतिशत पहुंच जाए, जबकि खपत और वास्तविक उत्पादन-मात्रा के संकेतक पीछे रह जाएं? इसे समझने के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की कार्यप्रणाली के भीतर लगे तकनीकी पहियों को देखना होगा। मुख्यतः तीन प्रक्रियाएं ऐसा परिणाम पैदा करती हैं। विभागों में नीति अब उस तस्वीर के हिसाब से ढलने लगती है जो बाहर दिखाई जानी है—रैंकिंग, प्रेस-किट में दर्ज उपलब्धियां, सिंगल-विंडो के दावे और लक्ष्य पूरे होने की घोषणाएं। उद्देश्य यह नहीं रह जाता कि व्यवस्था में रगड़ कहां है, उसे पहचानें और दूर करें। उद्देश्य व्यवस्था को इस तरह पैक करना हो जाता है कि कागज पर रगड़ दिखाई ही न दे। नतीजा विचित्र है। अनुभव और आंकड़ों पर आधारित शासन का पूरा औपचारिक ढांचा कायम रहता है, लेकिन माप और सुधार को जोड़ने वाली नसें कट जाती हैं।… वह जीएसटी का एक-एक रुपया गिन सकता है, लेकिन परिवार की हालत नहीं पढ़ सकता।
आधुनिक राज्य केवल आंकड़े इकट्ठा नहीं करता; वह उनसे ऐसी वास्तविकता भी गढ़ता है जिसे प्रशासन पढ़ और दिखा सके। भारत में सात दशकों में एक विशाल, बिखरी और मुख्यतः असंगठित अर्थव्यवस्था को समझने के लिए जो सांख्यिकीय तंत्र खड़ा हुआ था, उसे धीरे-धीरे इस तरह बदला गया है कि आर्थिक वास्तविकता बताने की बजाय पहले प्रशासन के अनुकूल तस्वीर तैयार करें। यह राष्ट्रीय आय की गणना में पैदा हुई कोई अकेली विसंगति नहीं है। यह शासन की एक प्रवृत्ति है, जो पूरे प्रशासनिक ढांचे में अब दिखाई देती है—जीडीपी के बड़े आंकड़े से जनगणना के समय तक, कल्याण योजनाओं की ब्रांडिंग से नियामकीय सुधारों की प्रस्तुति तक।
जब सत्ता के लिए यह लगातार साबित करना जरूरी हो जाए कि देश अभूतपूर्व और निरंतर परिवर्तन से गुजर रहा है, तब आंकड़ों का काम वास्तविकता को दर्ज करना भर नहीं रह जाता। वे शासन के औजार बन जाते हैं। मानो किताब लिखे जाने से पहले उसका चमकदार मुखपृष्ठ तैयार करना हो।
इसमें नुकसान आंकड़ों के प्रकाशन का नहीं है। नुकसान उस नैदानिक क्षमता का है, जिससे राज्य समय रहते अपनी अर्थव्यवस्था की रगड़, कमजोरी और गड़बड़ी को पहचानता और सुधारता है। यानी राज्य के पास आंकड़े तो हैं, पर उनसे अपने ही देश की नब्ज पहचानने की क्षमता कमजोर होती जाती है।
आखिर यह कैसे संभव है कि तिमाही विकास दर 7.8 प्रतिशत पहुंच जाए, जबकि खपत और वास्तविक उत्पादन-मात्रा के संकेतक पीछे रह जाएं? इसे समझने के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की कार्यप्रणाली के भीतर लगे तकनीकी पहियों को देखना होगा। मुख्यतः तीन प्रक्रियाएं ऐसा परिणाम पैदा करती हैं।
पहला—वे पिछले साल के देश को छोटा कर देते हैं।
प्रतिशत वृद्धि का गणित उसके आधार, यानी denominator, पर निर्भर करता है। यदि पिछली अवधि समाप्त हो जाने के काफी बाद उसके उत्पादन अनुमान को नीचे संशोधित कर दिया जाए, तो मौजूदा प्रदर्शन जिस आधार से नापा जा रहा है, वह बाद में छोटा हो जाता है। तब वर्तमान उत्पादन में मामूली वास्तविक वृद्धि भी प्रतिशत में बड़ी छलांग दिखाई दे सकती है।
माल ढुलाई का टन भार, डीजल की खपत, उर्वरकों की बिक्री जैसे वास्तविक मात्रा के संकेतक सपाट रहें या मामूली बढ़ें, फिर भी मुख्य विकास दर तेज दिखाई दे सकती है। क्योंकि तेजी अर्थव्यवस्था के वास्तविक विस्तार में नहीं, अनुपात के गणित में पैदा हुई।
देश जरूरी नहीं कि पहले से अधिक तेजी से बढ़ा हो। अतीत को छोटा कर दिया गया।
दूसरा—उत्पादन को इनपुट कीमतों से deflate करना।
वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (Real GVA) की गणना में अधिकांश सेवाओं के लिए single deflation और विनिर्माण में implicit deflator framework का इस्तेमाल होता है। जब वैश्विक कमोडिटी कीमतें नरम पड़ती हैं, तब थोक मूल्य मुद्रास्फीति अक्सर उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति से काफी नीचे चली जाती है। चूंकि इनपुट कीमतें उत्पादन की कीमतों से अधिक तेजी से गिरती हैं, इसलिए गणना में इस्तेमाल होने वाला deflator शून्य के करीब पहुंच सकता है या नैगेटिव हो सकता है।
फिर गणित अपना खेल दिखाता है। नाममात्र वृद्धि को बहुत कम या नैगेटिव deflator से समायोजित करने पर वास्तविक उत्पादन वृद्धि बड़ी दिखाई देने लगती है। इनपुट लागत में गिरावट को गणना इस तरह दर्ज कर सकती है मानो भौतिक उत्पादन और परिवारों की क्रय-शक्ति बढ़ गई हो।
अर्थात लागत का गिरना भी उत्पादन बढ़ने का आभास पैदा कर सकता है।
तीसरा—कॉरपोरेट बाजार हिस्सेदारी को पूरे क्षेत्र की वृद्धि समझ लेना।
भारत के राष्ट्रीय उत्पादन का लगभग दो-पांचवां हिस्सा और रोजगार का बड़ा बहुमत आज भी अनौपचारिक तथा असंगठित अर्थव्यवस्था में है। वहां तिमाही आधार पर वास्तविक समय के विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं होते। इसलिए राष्ट्रीय खातों को असंगठित गतिविधियों का अनुमान लगाने के लिए औपचारिक कॉरपोरेट फाइलिंग—विशेषकर MCA-21 रिकॉर्ड—का सहारा लेना पड़ता है।
समस्या तब पैदा होती है जब अर्थव्यवस्था किसी बड़े संरचनात्मक झटके या पूंजी के केंद्रीकरण से गुजर रही हो। ऐसे दौर में बड़ी औपचारिक कंपनियां संकटग्रस्त छोटे और असंगठित प्रतिस्पर्धियों की बाजार हिस्सेदारी अपने कब्जे में ले सकती हैं। यदि उन्हीं बड़ी कंपनियों की लाभप्रदता को असंगठित क्षेत्र के मूल्य-वर्धन का संकेतक बनाया जाए, तो बाजार का केंद्रीकरण अर्थव्यवस्था की शुद्ध वृद्धि बनकर दर्ज होने लगता है।
जो बच गया, वह गिना गया। जो उजड़ गया, वह आंकड़े से बाहर हो गया।
इनमें से किसी बात को समझने के लिए किसी षड्यंत्र की कल्पना जरूरी नहीं है। और न ही “आंकड़े फर्जी हैं” चिल्ला देने से समस्या समझ में आती है। पुरानी 2011–12 श्रृंखला को संशोधित करने का गंभीर सांख्यिकीय आधार मौजूद है। उसमें असंगठित क्षेत्र का कवरेज कमजोर था, भार पुराने पड़ चुके थे, कई जगह उपभोक्ता कीमतों की जगह थोक कीमतों का उपयोग होता था, single deflation पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता थी और उत्पादन तथा व्यय के अनुमानों के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं था। भारत के राष्ट्रीय खातों की पर्याप्तता पर IMF का आकलन भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहा।
Household Consumption Expenditure Survey के नए भार, Supply and Use Tables और नया आधार वर्ष—ये सभी वैध और आवश्यक सांख्यिकीय औजार हैं। किसी देश को अपनी बही सुधारने का पूरा अधिकार है।
लेकिन मौजूदा समस्या दूसरी है।
आधार वर्ष या श्रृंखला का संशोधन सांख्यिकीय दृष्टि से उचित हो सकता है और उसी समय तिमाही आंकड़ों में denominator को छोटा करने वाली मशीन भी बन सकता है। नई श्रृंखला की वर्तमान तिमाही की तुलना पुरानी श्रृंखला की पिछली तिमाही से करना गलती है। और यह मान लेना भी गलती है कि बेहतर पद्धति अपने-आप असंगठित भारत की आजीविका की अधिक सच्ची तस्वीर देगी।
पद्धति आधुनिक हो सकती है और निदान कमजोर।
आज भारत इसी विरोधाभास के बीच खड़ा है।
और यह प्रवृत्ति केवल राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक राज्य की काम करने की पद्धति बनती जा रही है।
नियामकीय ढांचे में बड़े बदलावों को संरचनात्मक छलांग के रूप में पेश किया जाता है। निवेश मंजूरी की नई व्यवस्थाएं हों या ‘सिंगल विंडो’ का पुनर्गठन—इन्हें पूंजी और निवेश की रफ्तार बढ़ाने वाले सुधारों की तरह बेचा जाता है। लेकिन इनका पहला काम अक्सर वास्तविक बाधाओं को पहचानना नहीं, बल्कि एक अनुकूल छवि बनाना होता है। रेटिंग एजेंसियों को संकेत जाता है कि कारोबार आसान हुआ है, जबकि पसंदीदा परियोजनाओं को प्रक्रियागत रुकावटों से बचाने की व्यवस्था भी बनती है।
विभागों में नीति अब उस तस्वीर के हिसाब से ढलने लगती है जो बाहर दिखाई जानी है—रैंकिंग, प्रेस-किट में दर्ज उपलब्धियां, सिंगल-विंडो के दावे और लक्ष्य पूरे होने की घोषणाएं। उद्देश्य यह नहीं रह जाता कि व्यवस्था में रगड़ कहां है, उसे पहचानें और दूर करें। उद्देश्य व्यवस्था को इस तरह पैक करना हो जाता है कि कागज पर रगड़ दिखाई ही न दे।
नतीजा विचित्र है। अनुभव और आंकड़ों पर आधारित शासन का पूरा औपचारिक ढांचा कायम रहता है, लेकिन माप और सुधार को जोड़ने वाली नसें कट जाती हैं।
यह आंकड़े दबाने या सीधे-सादे सेंसरशिप से अलग स्थिति है। तंत्र आंकड़े छिपाता नहीं। वह लगातार आंकड़े पैदा करता है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग व्यवस्थाओं के सामने प्रक्रियागत अनुपालन भी पूरा दिखाई देता है।
फिर भी इस विशाल प्रशासनिक शरीर में राज्य के हाथ तो हैं, नसें नहीं।
वह जीएसटी का एक-एक रुपया गिन सकता है, लेकिन परिवार की हालत नहीं पढ़ सकता।
कर-व्यवस्था औपचारिक इनवॉइस और लेन-देन को जबरदस्त डिजिटल सटीकता से वास्तविक समय में ट्रैक करती है। लेकिन क्योंकि उसकी निगाह आजीविका पर नहीं, लेन-देन पर है, इसलिए वह उस परिवार की घटती वास्तविक मजदूरी नहीं देख पाती जो रोजमर्रा की वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर चुका रहा है।
राज्य डिजिटल पहचान के रास्ते एक दिन में कल्याण योजना का पैसा खाते में पहुंचा सकता है, लेकिन यह नहीं जानता कि पैसा पाने वाले व्यक्ति के पास नौकरी अभी भी है या नहीं।
Direct Benefit Transfer ने अभूतपूर्व प्रशासनिक गति से नकद सहायता पहुंचाना संभव बनाया है। वह घोर आर्थिक संकट को कुछ हद तक कम भी कर सकता है। मगर व्यवस्था नागरिक को श्रम बाजार में सक्रिय व्यक्ति की जगह सरकारी पूंजी पहुंचाने की मंजिल और राजनीतिक ब्रांडिंग के पात्र के रूप में देखने लगे, तो उसे यह पता नहीं चलता कि दिया गया पैसा खो चुकी मजदूरी की भरपाई कर रहा है या उत्पादक काम से होने वाली आय में कुछ जोड़ रहा है।
दोनों स्थितियों में खाते में पैसा पहुंचा। लेकिन दोनों की अर्थव्यवस्था एक नहीं है।
राज्य समय पर कंक्रीट बिछा सकता है। प्रशासनिक गति से राजमार्ग बना सकता है। फिर भी उसे यह मालूम न हो कि जिस जिले के लिए सड़क बनी है, वहां के लोगों में उस माल को खरीदने की क्षमता भी है या नहीं जिसे सड़क ढोने वाली है।
सरकार के नेतृत्व में बुनियादी ढांचा सचमुच प्रभावशाली भौतिक गति से खड़ा किया जा सकता है। लेकिन यदि व्यापक आर्थिक मापन-व्यवस्था दूरदराज के असंगठित समाज में घटती क्रय-शक्ति को दर्ज ही नहीं कर रही, तो नया राजमार्ग ऐसी स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के बीच से गुजर सकता है जिनके पास बनाई गई क्षमता का उपयोग करने लायक प्रभावी मांग ही नहीं है।
सड़क चमकती है। बाजार सुस्त रहता है।
राजस्व वसूली, सीधे नकद हस्तांतरण और सरकार-निर्देशित बुनियादी ढांचा तकनीकी रूप से बहुत कुशल हो सकते हैं, क्योंकि इनमें मुख्य आवश्यकता क्रियान्वयन की है, निदान की नहीं। राज्य को पता है पैसा कैसे वसूलना है, कैसे भेजना है और परियोजना कैसे बनानी है।
जो क्षमता धीरे-धीरे खत्म होती है, वह है—अपने को सुधारने की क्षमता।
जब मुख्य सांख्यिकीय आंकड़ों और नई योजनाओं के लॉन्च दस्तावेजों को अर्थव्यवस्था की जांच रिपोर्ट के बजाय सफलता का प्रमाण मान लिया जाए, तब शासन की feedback व्यवस्था टूटने लगती है। वही feedback सरकार को बताता है कि राजकोषीय नीति कहां बदलनी है, संरचनात्मक बेरोजगारी का उपचार कहां जरूरी है या व्यापार नीति में किस दिशा में संशोधन चाहिए।
लेकिन जब तंत्र वास्तविक स्थिति के बजाय मापदंड को बेहतर दिखाने के लिए काम करने लगे, तो उसके पास दिशा बताने वाले उपकरण ही कमजोर हो जाते हैं।
राज्य तब अपनी बनाई हुई ‘पठनीय वास्तविकता’ के भीतर फंस जाता है। रास्ता बदलना कठिन हो जाता है, क्योंकि रगड़ स्वीकार करने का अर्थ होगा यह स्वीकार करना कि जिस मापदंड से सफलता नापी जा रही थी, उसमें ही कमी थी।
इस अंतर को सबसे पहले निजी पूंजी पहचानती है।
सरकारी आंकड़ों में तेज विकास के बावजूद घरेलू कॉरपोरेट निवेश दबा रह सकता है, क्योंकि कंपनी की बैलेंस शीट सरकारी विकास दर से नहीं, उसकी ऑर्डर बुक से जवाब मांगती है। कोई उद्योगपति केवल राष्ट्रीय खातों की प्रेस रिलीज देखकर नया कारखाना नहीं लगाता।
उसे बिक्री चाहिए। मांग चाहिए। खरीदार चाहिए।
और जब आधिकारिक तस्वीर तथा बाजार की वास्तविकता में फर्क दिखाई देता है, तब संस्थागत पूंजी सरकारी समग्र आंकड़े को छोड़कर दूसरे संकेतकों से अर्थव्यवस्था को पढ़ना शुरू करती है।
यहीं से एक दूसरी, समानांतर बही बननी शुरू होती है।
विश्लेषक तब अर्थव्यवस्था की दिशा समझने के लिए दोपहिया वाहनों के पंजीकरण को डीजल की खपत के साथ रखते हैं। गैर-खाद्य बैंक ऋण को ग्रामीण वास्तविक मजदूरी से मिलाते हैं। FMCG की बिक्री की मात्रा को रेलवे माल ढुलाई के आंकड़ों के साथ पढ़ते हैं। अलग-अलग संकेतकों की परतें जोड़कर वे एक अनौपचारिक, लगातार बदलती हुई ‘छाया-बही’ तैयार करते हैं—एक ऐसी समानांतर बही, जिसे अभी भी पता है कि देश में क्रय-शक्ति कहां है और कहां सूख रही है।
क्योंकि अंततः बाजार को प्रतिशत नहीं, खरीदार चाहिए।
यहीं माप की विफलता का असली अर्थ खुलता है। समस्या केवल यह नहीं कि जीडीपी का कोई आंकड़ा कुछ अधिक या कम निकल आया। समस्या तब गंभीर होती है जब राज्य के पास अर्थव्यवस्था को देखने के लिए मौजूद उपकरण उस अर्थव्यवस्था से दूर होने लगें जिसे उसे चलाना है।
राज्य अपनी बनाई और सजाई हुई सूचकांक-व्यवस्था के पीछे काम करने लगे तो उसे कुछ समय के लिए कथा की स्थिरता मिल सकती है। सरकार लगातार उपलब्धियां दिखा सकती है। रैंकिंग सुधर सकती है। लक्ष्य पूरे घोषित हो सकते हैं। विकास दर आकर्षक दिखाई दे सकती है। प्रेस-किट में मील के पत्थर जुड़ते जा सकते हैं।
लेकिन इसकी कीमत दीर्घकालीन नीति-नियंत्रण में चुकानी पड़ती है।
क्योंकि अर्थव्यवस्था अंततः प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार व्यवहार नहीं करती।
परिवार अपनी वास्तविक आय के अनुसार खर्च करता है। किसान लागत और मिलने वाली कीमत देखकर निर्णय लेता है। छोटा कारोबारी अपनी दुकान की बिक्री से अर्थव्यवस्था समझता है। कंपनी अपनी ऑर्डर बुक देखकर नया निवेश करती है। बैंक कर्ज की मांग और वापसी देखकर जोखिम आंकता है। इनमें से किसी को भी इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि सरकारी दस्तावेज में वास्तविकता कितनी आकर्षक दिखाई गई है।
इसलिए आधिकारिक आंकड़े और जमीन की अर्थव्यवस्था अलग-अलग दिशाओं में चलने लगें तो निजी क्षेत्र धीरे-धीरे अपने संकेतक खोज लेता है। मगर राज्य के लिए ऐसा करना अधिक कठिन है। क्योंकि राज्य ने यदि अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता उन्हीं सूचकांकों से बांध दी है, तो उनके विरुद्ध मिलने वाला प्रमाण स्वीकार करना स्वयं अपनी सफलता-कथा पर प्रश्न उठाना हो जाता है।
यहीं आंकड़ा शासन का उपकरण होने के बजाय शासन की सीमा बनने लगता है।
यह फर्क महत्वपूर्ण है। तर्क यह नहीं कि सारे सरकारी आंकड़े काल्पनिक हैं। न यह कि हर सांख्यिकीय संशोधन के पीछे राजनीतिक आदेश है। आधुनिक अर्थव्यवस्था की गणना कठिन है—विशेषकर भारत जैसी अर्थव्यवस्था में, जहां औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र साथ-साथ चलते हैं, करोड़ों छोटे प्रतिष्ठान नियमित तिमाही आंकड़े नहीं देते और उत्पादन, रोजगार तथा आय के बड़े हिस्से का तत्काल मापन संभव नहीं है।
इसीलिए बेहतर सर्वेक्षण, नया आधार वर्ष, Household Consumption Expenditure Survey के नए भार, Supply and Use Tables और अधिक आधुनिक राष्ट्रीय लेखा-पद्धति जरूरी हैं।
पर बेहतर पद्धति का अर्थ बेहतर दृष्टि तभी है जब आंकड़े वास्तविकता को जांचने के लिए इस्तेमाल हों, उसे प्रमाणित करने के लिए नहीं।
यदि परिणाम पहले राजनीतिक कथा में तय हो और मापन का तंत्र बाद में उसे पुष्ट करने लगे, तो सांख्यिकी की भूमिका बदल जाती है। वह थर्मामीटर नहीं रहती; वह प्रमाणपत्र बनने लगती है।
और प्रमाणपत्र बीमारी नहीं पकड़ता।
यही कारण है कि किसी अर्थव्यवस्था की असली सांख्यिकीय शक्ति इस बात में नहीं कि वह कितने आंकड़े पैदा करती है। असली शक्ति यह है कि क्या वे आंकड़े सत्ता को अप्रिय सूचना भी दे सकते हैं? क्या वे बता सकते हैं कि जिस नीति को सफल घोषित किया गया, वह जमीन पर अपेक्षित परिणाम नहीं दे रही? क्या वे सरकार को अपनी दिशा बदलने के लिए मजबूर कर सकते हैं?
यदि नहीं, तो तकनीकी रूप से अत्याधुनिक सांख्यिकीय तंत्र भी शासन को अंधा कर सकता है।
और भारत के संदर्भ में खतरा यहीं है।
एक ओर राज्य पहले से कहीं अधिक डिजिटल है। कर संग्रह की गति और सटीकता बढ़ी है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कुछ ही समय में करोड़ों खातों तक पहुंच सकता है। परियोजनाओं की निगरानी डिजिटल डैशबोर्ड पर हो सकती है। कॉरपोरेट फाइलिंग विशाल डेटाबेस में उपलब्ध है। प्रशासन के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक सूचना है।
फिर भी अधिक सूचना का अर्थ जरूरी नहीं कि अधिक समझ हो।
यदि सूचना मुख्यतः उस भारत से आती है जिसे आसानी से दर्ज किया जा सकता है—औपचारिक कंपनी, डिजिटल भुगतान, जीएसटी इनवॉइस, बैंक खाता, सरकारी हस्तांतरण—तो वह उस भारत को कम देखती है जिसकी जिंदगी असंगठित रोजगार, छोटी दुकान, दैनिक मजदूरी, नकद आय और स्थानीय मांग पर टिकी है।
यानी जो आसानी से मापा जा सकता है, वह धीरे-धीरे वही बन जाता है जिसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
और जो माप से बाहर है, वह नीति की दृष्टि से भी बाहर होने लगता है।
यही ‘legibility’ का जाल है। राज्य उस देश को बेहतर देखने लगता है जिसे उसकी मशीनें पढ़ सकती हैं और उस देश को कम देखने लगता है जो उन मशीनों के बाहर जी रहा है।
तब प्रशासन की क्षमता और आर्थिक समझ के बीच एक विचित्र दूरी पैदा होती है। सरकार बहुत कुछ कर सकती है, लेकिन यह जानने की क्षमता कमजोर हो सकती है कि क्या करना चाहिए।
वह कर वसूल सकती है। पैसा भेज सकती है। राजमार्ग बना सकती है। डैशबोर्ड भर सकती है। रैंकिंग दिखा सकती है।
पर सवाल वही है—क्या वह नागरिक की आर्थिक नब्ज पढ़ सकती है?
माप की विफलता अंततः आंकड़ों की विफलता नहीं है। यह feedback की विफलता है। वह तंत्र कमजोर होना, जिसके जरिए वास्तविकता सत्ता तक पहुंचती है और सत्ता को अपनी नीति सुधारने के लिए बाध्य करती है।
जब राज्य चुने और संवारे हुए संकेतकों तथा प्रशासनिक प्रस्तुति के पीछे काम करता है, तो वह थोड़े समय के लिए अपनी कथा को स्थिर रख सकता है। लेकिन उसके बदले वह लंबे समय की नीति-दृष्टि और नियंत्रण खोता है।
गलती यह नहीं कि आंकड़े काल्पनिक हैं।
गलती यह है कि वे उस देश का वर्णन करना बंद कर देते हैं, जिस पर शासन किया जा रहा है।
