फ़िल्म बार-बार यह अहसास कराती है कि आधुनिकता का सपना किसी के लिए सपना होता है, तो किसी के लिए दुःस्वप्न। जंगल कटते हैं, शहर बसते हैं, पर मनुष्य के भीतर का अकेलापन जस का तस रहता है। रॉबर्ट का जीवन इसी विरोधाभास में बीतता है। भीड़ से दूर, पर इतिहास के बीचों-बीच। निर्देशक क्लिंट बेंटली ने बेहद संयमित और आत्मविश्वासी निर्देशन किया है। यह फ़िल्म धैर्य मांगती है और उसी धैर्य का पुरस्कार देती है।
सिने-सोहबत
कुछ फ़िल्में कहानी नहीं सुनातीं, वे समय को धीमा कर देती हैं। आज के ‘सिने-सोहबत’ में ऐसी ही एक फ़िल्म ‘ट्रेन ड्रीम्स’ पर चर्चा की जाए। ‘ट्रेन ड्रीम्स’ एक ऐसी सिनेमाई रचना है, जो शोर से दूर, शब्दों से कम और अनुभूतियों से ज़्यादा बात करती है। यह फ़िल्म डेनिस जॉनसन के प्रसिद्ध नोवेला ‘ट्रेन ड्रीम्स’ पर आधारित है और अमेरिकी इतिहास के उस संक्रमण काल को पकड़ती है जब रेल की पटरियां जंगलों को चीरती हुई आगे बढ़ रही थीं और मनुष्य अपने भीतर के जंगलों से जूझ रहा था।
फ़िल्म की कहानी रॉबर्ट ग्रेनियर (जोएल एडगर्टन) के ईर्द-गिर्द घूमती है। एक साधारण, मेहनतकश आदमी जो बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी इलाक़ों में रेललाइन बिछाने, लकड़ी काटने और अस्थायी मजदूरी करते हुए अपना जीवन बिताता है। वह नायक नहीं है, न ही खलनायक। वह बस अपने समय का प्रतिनिधि एक सामान्य मनुष्य मात्र है।
रॉबर्ट का जीवन बड़े-बड़े नाटकीय मोड़ों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे मौन क्षणों से बनता है। एक पत्नी से मुलाक़ात, विवाह, बेटी का जन्म, जंगल में काम करते हुए अकेलापन और फिर ऐसी त्रासदी जो बिना चेतावनी के आती है और मनुष्य के भीतर एक स्थायी खालीपन छोड़ जाती है। फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि वह इस खालीपन को संवादों से नहीं भरती, बल्कि दर्शक को उसे महसूस करने देती है।
‘ट्रेन ड्रीम्स’ दरअसल समय के साथ बहती स्मृति की फ़िल्म है। यह पूछती है कि जब दुनिया बदलती है, तो उन लोगों का क्या होता है जो बदलाव के औज़ार तो बनते हैं, लेकिन उसके लाभार्थी नहीं बन पाते? रेल की पटरियां प्रगति का प्रतीक हैं, पर रॉबर्ट के लिए वे विस्थापन का संकेत भी हैं।
फ़िल्म बार-बार यह अहसास कराती है कि आधुनिकता का सपना किसी के लिए सपना होता है, तो किसी के लिए दुःस्वप्न। जंगल कटते हैं, शहर बसते हैं, पर मनुष्य के भीतर का अकेलापन जस का तस रहता है। रॉबर्ट का जीवन इसी विरोधाभास में बीतता है। भीड़ से दूर, पर इतिहास के बीचों-बीच।
निर्देशक क्लिंट बेंटली ने बेहद संयमित और आत्मविश्वासी निर्देशन किया है। यह फ़िल्म धैर्य मांगती है और उसी धैर्य का पुरस्कार देती है। कैमरा अक्सर स्थिर रहता है, फ्रेम्स लंबे हैं, और कट्स कम। यह शानदार शैली दर्शक को कहानी देखने नहीं, उसमें रहने का अवसर देती है।
प्रकृति यहां सिर्फ़ बैकड्रॉप नहीं, बल्कि एक पात्र है। जंगल, पहाड़, बर्फ़, आग सब कुछ रॉबर्ट के मानसिक संसार का विस्तार बन जाते हैं। खासकर जंगल की आग वाले दृश्य सिर्फ़ दृश्यात्मक प्रभाव नहीं, बल्कि स्मृति और पश्चाताप की लपटों की तरह महसूस होते हैं।
जोएल एडगर्टन ने रॉबर्ट ग्रेनियर के किरदार को जिस सादगी और संवेदनशीलता से निभाया है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। यह ऐसा अभिनय है जो चिल्लाता नहीं, बल्कि भीतर उतरता है। उनकी आंखों में स्थायी थकान, चेहरे पर मौन स्वीकार्यता और शरीर की भाषा में एक अनकहा दुःख, ये सब मिलकर रॉबर्ट को एक जीवित, सांस लेता हुआ इंसान बनाते हैं।
यह रोल किसी भी अभिनेता के लिए जोखिम भरा हो सकता था, क्योंकि संवाद कम हैं और भावनाएं सूक्ष्म। लेकिन एडगर्टन इस जोखिम को अवसर में बदल देते हैं। वे हमें यह यक़ीन दिलाते हैं कि साधारण जीवन भी असाधारण गहराई रखता है।
फ़िल्म का संगीत न्यूनतम है, लगभग अदृश्य। साउंड डिज़ाइन में हवा की सरसराहट, कुल्हाड़ी की चोट, ट्रेन की सीटी और जंगल की ख़ामोशी, ये सब मिलकर एक भावनात्मक लैंडस्केप रचते हैं। कई बार लगता है कि संगीत नहीं, बल्कि ख़ामोशी ही इस फ़िल्म का असली स्कोर है।
ट्रेन की आवाज़ यहां प्रगति का गीत नहीं, बल्कि दूरी और बिछड़ने की पुकार बन जाती है।
डेनिस जॉनसन की रचना अपने गद्यात्मक सौंदर्य और अस्तित्ववादी भावबोध के लिए जानी जाती है। फ़िल्म उस आत्मा के प्रति ईमानदार रहती है। यह नोवेला का दृश्यात्मक अनुवाद नहीं, बल्कि उसका भावात्मक विस्तार है। जहां शब्द ख़त्म होते हैं, वहां कैमरा बोलता है।
यह फ़िल्म उन दर्शकों के लिए चुनौती हो सकती है जो तेज़ रफ्तार कथा और स्पष्ट निष्कर्ष के आदी हैं। लेकिन जो दर्शक सिनेमा को अनुभव की तरह देखते हैं, उनके लिए ‘ट्रेन ड्रीम्स’ एक दुर्लभ उपहार है।
भारतीय दर्शकों के लिए भी यह फ़िल्म अजनबी नहीं लगेगी। हमारे यहां भी प्रगति के नाम पर गांव, जंगल और जीवन-शैलियां बदली हैं। रेल, सड़क, बांध, ये सब विकास के प्रतीक हैं, पर इनके बीच कहीं न कहीं कोई रॉबर्ट ग्रेनियर भी खड़ा है, जो बदलाव का साक्षी है, नायक नहीं।
इस अर्थ में ‘ट्रेन ड्रीम्स’ एक अमेरिकी कहानी होते हुए भी सार्वभौमिक है। यह मनुष्य और समय के रिश्ते पर बनी फ़िल्म है और यह रिश्ता हर भूगोल में लगभग एक-सा ही होता है।
किसी भी फ़िल्म समीक्षा को सम्पूर्ण तभी मानने का ट्रेंड है जब उसमें फ़िल्म की कुछ कमियां निकाल ली जाएं। ‘ट्रेन ड्रीम्स’ में यदि कोई कमी गिनानी हो, तो यही कि फ़िल्म का धीमा प्रवाह हर दर्शक को बांध नहीं पाएगा। कुछ को यह अत्यधिक आत्ममंथनशील और कथानक-विहीन लग सकती है लेकिन सवाल यह है कि क्या हर फ़िल्म को मनोरंजन की पारंपरिक परिभाषा में ही बांधना ज़रूरी है? ‘ट्रेन ड्रीम्स’, दरअसल उस सिनेमा का हिस्सा है, जो देखे जाने से ज़्यादा महसूस किए जाने के लिए बना है।
‘ट्रेन ड्रीम्स’ एक शांत, मार्मिक और गहराई से मानवीय फ़िल्म है। यह हमें याद दिलाती है कि इतिहास सिर्फ़ विजेताओं और महान व्यक्तियों से नहीं बनता, बल्कि उन अनगिनत गुमनाम लोगों से भी बनता है, जिनके सपने ट्रेनों की तरह गुजर जाते हैं, आवाज़ छोड़कर, धुआं छोड़कर, और पीछे एक लंबी ख़ामोशी।
यह फ़िल्म देखने के बाद शायद आप तुरंत कुछ कह न पाएं। ठीक उसी तरह जैसे गरमा गरम जलेबी खाते ही ये एकदम से पता नहीं चल पाता कि उसमे इलायची की मात्रा पर्याप्त है कि नहीं। कुछ दिनों बाद, किसी शांत शाम, किसी दूर जाती ट्रेन की आवाज़ सुनकर, आपको रॉबर्ट ग्रेनियर याद आ जाएगा और शायद यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता है।
यह फ़िल्म उन दर्शकों के लिए है जो सिनेमा में शोर नहीं, आत्मा ढूंढते हैं।
नेटफ़्लिक्स पर है। देख लीजियेगा।(पंकज दुबे पॉप कल्चर स्टोरीटेलर, मशहूर बाइलिंगुअल उपन्यासकार और चर्चित यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)
