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बीजिंग में बदल चुकी दुनिया का नज़ारा

फिलहाल चीन ने टकराव को एक सीमा के अंदर रखने और उसे यथासंभव संभालने के लिए आपसी संबंध में रचनात्मक रणनीतिक स्थिरताका फॉर्मूला भर दिया है। ये फॉर्मूला तभी तक कारगर रहेगा, जब तक अमेरिका चीन की लक्ष्मण रेखाओं का पालन करे। मगर, अमेरिका के लिए भी लंबे समय तक ऐसा करना कठिन होगा, क्योंकि उस स्थिति में चीन अपनी ताकत में बढ़ोतरी करता रहेगा, जिससे स्वतः दुनिया पर उसका प्रभाव बढ़ता जाएगा। आखिर अमेरिकी शासक वर्ग इसे कब तक बर्दाश्त करेंगे!

चीन यात्रा के लिए डॉनल्ड ट्रंप का उत्साह अमेरिका के लिए भारी पड़ा। अब तक दुनिया में चर्चा थी कि चीन अपनी बढ़ती ताकत के साथ दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। ट्रंप की यात्रा के दौरान जाहिर हुआ कि चुनौती देने की बात पुरानी पड़ चुकी है- ताजा हकीकत यह है कि चीन अब अमेरिका से संबंध की शर्तें थोप रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ आधिकारिक वार्ता की शुरुआत में ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा- ‘दुनिया में उस रूपांतरण की गति तेज हो रही है, जैसा बदलाव एक सदी में नहीं देखा गया।’ (शी ने यह बात पांच-छह साल पहले कहनी शुरू की थी। इससे उनका तात्पर्य संभवतः यह रहा है कि रूस में बोल्शेविक क्रांति से दुनिया जैसे बदल गई थी, कुछ उसी तरह के प्रभाव वाली परिघटना से अभी हम गुजर रहे हैं)

(प्राचीन ग्रीक इतिहासकार थुसिडाइड्स ने तत्कालीन युद्धों का अध्ययन किया था। ईसा पूर्व पांचवीं सदी में उन्होंने यह सिद्धांत विकसित किया कि जब किसी साम्राज्य का क्षय और नई शक्ति का उदय होता है, तो साम्राज्य आसानी से अपनी हैसियत का समर्पण नहीं करता। बल्कि अधिकांश मौकों पर नई उभरती शक्ति के साथ उसका युद्ध होता है।)

अपनी शुरुआती टिप्पणी में ही इन बातों के साथ शी ने चीन-अमेरिका संबंध के बीच ‘रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता’ का अपना नजरिया पेश किया। इसका अर्थ उन्होंने बताया- संबंध में सहयोग के साथ सकारात्मक स्थिरता। बाद में रात्रि भोज के मौके पर शी ने कहा- ‘मैं और राष्ट्रपति ट्रंप चीन-अमेरिका संबंध के बारे में रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता की (constructive China-U।S। relationship of strategic stability) की नई दृष्टि पर सहमत हुए हैं। अगले तीन साल तक (ट्रंप के कार्यकाल में) और उसके आगे भी यह दृष्टि चीन-अमेरिका संबंधों का रणनीतिक मार्ग-निर्देशन करेगी।’

अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े विश्लेषकों ने इस व्याख्या को ट्रंप की बीजिंग यात्रा का सार माना है। पूर्व बाइडेन प्रशासन में ह्वाइट हाउस नेशनल सिक्यूरिटी काउंसिल (NSC) के सदस्य रुष दोषी ने लिखा- ‘चीन अब अमेरिका से संबंध के बारे में नए स्वरूप (frame) के साथ सामने आया है। चीन अपने लिए लाभदायक “युद्धविराम” कायम करना चाहता है, जिसे वह ट्रेड वॉर उपरांत संबंध की आधार-रेखा मानेगा। अब अमेरिका अगर चीन की अत्यधिक उत्पादन क्षमता या टकराव रोकने की दिशा में बढ़ेगा, तो चीन उसे नए स्वरूप का उल्लंघन बताएगा। अब तक चीन अमेरिका से अपने रिश्ते को प्रतिस्पर्धा बताता था, लेकिन अब इसे एक स्वीकार्य सीमा पर स्थिर रखने की बात कर रहा है।’

इस सिलसिले में उल्लेखनीय है कि बीजिंग में जब अमेरिकी पत्रकारों ने ट्रंप से ताइवान के बारे में सवाल पूछा, तो उन्होंने चुप्पी साध ली।

फिर ऐसा लगता है कि थुसिडाइड्स ट्रैप की बात तुरंत ट्रंप को समझ में नहीं आई। उन्होंने इस पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। संभवतः बाद जब उन्हें इसका अर्थ समझाया गया, तब सोशल मीडिया पर उन्होंने जवाब दिया। लेकिन ये जवाब क्या है, उस पर गौर कीजिए-

ये बातें अपने-आप जाहिर कर देती हैं कि ट्रंप की चीन यात्रा अमेरिका के रुतबे के लिए कितनी हानिकारक रही। जाहिर यह हुआ कि ट्रंप बिना कोई मकसद तय किए बीजिंग पहुंचे। अपने साथ देश के सबसे धनी कारोबारियों को वहां ले गए। कहा कि उनके लिए चीन के बाजार को खुलवाएंगे। लेकिन मुद्दा यह है कि चीन ने वो बाजार बंद ही कब किया था? चीन से कारोबार पर प्रतिबंध तो अमेरिका ने लगाए थे! अब बोइंग जैसी अमेरिकी कंपनियों को चीन से खरीदारी के कुछ नए ऑर्डर मिल जाते हैं, तो रणनीतिक या कूटनीतिक लिहाज से उन्हें भले ट्रंप अमेरिका की जीत के रूप पेश करें, लेकिन बाकी दुनिया उसे उस रूप में नहीं देखेगी।

गौरतलब है कि ट्रंप के बीजिंग पहुंचने से ठीक पहले वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए चीन की इन चार लक्ष्मण रेखाओं को स्पष्ट कर दिया थाः

–     ताइवान का मसला

–     लोकतंत्र और मानव अधिकार

–     चीन की राजनीतिक व्यवस्था, एवं

–     चीन का विकास मार्ग

दूतावास ने कहा कि चीन-अमेरिका संबंधों के बीच की ये लक्ष्मण रेखाएं हैं, जिन्हें चुनौती नहीं दी जानी चाहिए।  (इनके जरिए चीन ने यह संदेश दिया कि इन मुद्दों पर अब अमेरिका से कोई लेक्चर नहीं सुनेगा, जैसा पहले अमेरिकी अधिकारी चीन यात्रा के दौरान करते थे।)

उधर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार पीपुल्स डेली ने ट्रंप की यात्रा पर एक टिप्पणी प्रकाशित की, जिसका शीर्षक था: “चीन–अमेरिका संबंध अतीत में नहीं लौट सकते, लेकिन वे एक बेहतर भविष्य को अपना सकते हैं।” मोटे तौर पर इस टिप्पणी का आशय थाः

–     चीन अमेरिका को चुनौती देने या उसका स्थान लेने की कोशिश नहीं करता। बल्कि वह एक समृद्ध और सफल अमेरिका का स्वागत करता है।

–     मगर चीन अपने वैध हितों की रक्षा पर अडिग है। अपने सिद्धांतों और अपनी सीमाओं पर दृढ़ रहते हुए चीन मानता है कि उसने कठोर मेहनत से शक्ति और अंतरराष्ट्रीय सम्मान अर्जित किया है। अमेरिका को इसका ख्याल रखना चाहिए।

दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप सोशल मीडिया पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ में कसीदे कढ़ते रहे। एलान करते रहे कि वे एक महान यात्रा पर जा रहे हैं। मगर अमेरिका में इस आशंका के गहराने के संकेत थे कि ईरान युद्ध में जाहिर हुई अमेरिका की कमजोरियों ने चीन का हौसला बढ़ा दिया है। अतः ट्रंप की इस यात्रा से दुनिया यह संदेश ग्रहण कर सकती है कि अमेरिका अब चीन पर दबाव डालने की हैसियत में नहीं है। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट पॉलिटिको ने एक विश्लेषण में कहाः

(गौरतलब है कि ट्रंप की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कोई साझा विज्ञप्ति जारी नहीं हुई। चीन ने अलग से प्रेस वक्तव्य जारी किया, जिसमें ज्यादातर शी और ट्रंप की टिप्पणियों को शामिल किया गया। ह्वाइट हाउस ने बेहद छोटा बयान जारी किया। उसमें मादक पदार्थ फेंटानील का निर्यात रोकने और अमेरिका से अधिक तेल-गैस खरीदने के चीन के वादे का जिक्र है। साथ ही उसमें कहा गया कि चीन ने होरमुज जलडमरूमध्य से मुक्त नौवहन का समर्थन किया, वहां टोल टैक्स लेने के खिलाफ राय जताई और दोहराया कि वह ईरान के परमाणु क्षमता हासिल करने के खिलाफ है। लेकिन इन बातों का चीनी वक्तव्य में जिक्र नहीं हुआ। वैसे भी इन बातों का संदर्भ सैद्धांतिक भर है।)

खैर, इन बातों यह अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि चीन अब अमेरिका को हलके से लेने लगा है। दुनिया का कोई गंभीर विश्लेषक ऐसी गलती सिर्फ अपनी ना-जानकारी या अति-उत्साह में ही कर सकता है। इसलिए कि अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें अमेरिका की शक्ति अभी बरकरार है। दुनिया का शक्ति संतुलन बात सिर्फ इस तथ्य से बदली है कि चीन ने अपनी अलग ताकत विकसित कर ली है, जिससे दुनिया के शक्ति संतुलन में गुणात्मक परिवर्तन आया है।

इस सिलसिले में लेखक एवं ‘China as a System’ सबस्टैक के प्रकाशक लियोन लियाओ की इस पंक्तियों पर गौर करेः – ‘अमेरिका के पास अब भी दुनिया की सबसे मज़बूत सैन्य व्यवस्था, डॉलर प्रणाली, पूंजी बाज़ार, विश्वविद्यालय नेटवर्क, प्रौद्योगिकी कंपनियां, तथा खुफ़िया और सुरक्षा गठबंधनों की ताकत है। उसकी प्रभुत्वकारी शक्तियां समाप्त नहीं हुई हैं। कई क्षेत्रों में वे इतनी गहराई से जमी हुई हैं कि उन्हें बेदखल करना कठिन है। जब वैश्विक वित्तीय संकट होता है, तो दुनिया अब भी अमेरिकी सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व की ओर देखती है। जब यूरोपीय सुरक्षा पर दबाव होता है, तो दुनिया अब भी NATO और अमेरिका की ओर देखती है। उन्नत कंप्यूटर चिप्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई फाउंडेशन मॉडल, सेमी-कंडक्टर उपकरण, डॉलर क्लियरिंग, वित्तीय प्रतिबंध की ताकत और सैन्य गठबंधन अब भी अमेरिकी नेतृत्व वाली प्रणाली में गहरे रूप से मौजूद हैं।

।।।। मगर चीन की शक्ति अलग ढंग से प्रकट होती है। चीन दुनिया को मुख्यतः वैश्विक सैन्य ठिकानों और सैन्य गठबंधन से संगठित नहीं करता। वह दुनिया को अपनी विनिर्माण क्षमता, इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की योग्यता, आपूर्ति शृंखला की गहराई, पूंजीगत वस्तुओं के निर्यात, अक्षय ऊर्जा उद्योग, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स, इंजीनियरिंग डिलीवरी, व्यापार नेटवर्क, और ग्लोबल साउथ के साथ अपने जुड़ाव के माध्यम से प्रभावित करता है। चीन कई देशों के लिए उद्योगीकरण, अक्षय ऊर्जा की ओर संक्रमण, इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार, उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति और पूंजीगत वस्तुओं की सप्लाई का केंद्रीय स्रोत बन गया है। कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए चीन कोई अमूर्त भू-राजनीति भर नहीं है। वह बंदरगाह, रेलमार्ग, विद्युत ग्रिड आदि के निर्माण, तथा सौर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, दूरसंचार उपकरण, निर्माण मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और कम लागत वाली उपभोक्ता वस्तुओं का स्रोत है।’

मतलब यह कि अमेरिका और चीन दुनिया को संगठित करने के दो अलग-अलग तरीकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमेरिका सुरक्षा–वित्त–गठबंधन व्यवस्था का प्रतिनिधि है, जबकि चीन उत्पादन–व्यापार–इन्फ्रास्ट्रक्चर व्यवस्था के जरिए दुनिया से जुड़ता गया है।

और यही वजह है कि जी-2 जैसी व्यवस्था का बनना संभव नहीं है। यानी ऐसी व्यवस्था, जिसे अमेरिका और चीन मिल कर चलाएं। उल्लेखनीय है कि पिछले अक्टूबर में दक्षिण कोरिया के बुसान में शी जिनपिंग से मुलाकात के पहले डॉनल्ड ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में फिर से जी-2 का उल्लेख किया था। तब उन्होंने कहाः जी-2 की जल्द ही मुलाकात होने जा रही है।

मगर ऐसी कोई व्यवस्था तभी कारगर हो सकती है, जब उसके उद्देश्य पर बुनियादी आम सहमति हो। चीन और अमेरिका के बीच आम सहमति बनना तो दूर, बुनियादी मसलों पर मतभेद चौड़े होते जा रहे हैं। अमेरिकी दस्तावेज अब भी वैश्विक नेतृत्व, सैन्य गठबंधन, वॉशिंगटन में तय किए गए नियमों पर आधारित व्यवस्था, विभिन्न देशों के बीच पदानुक्रम (hierarchy) और सिक्युरिटी कवरेज की भाषा से भरे रहते हैं। इसके विपरीत चीन की आधिकारिक भाषा बहुध्रुवीयता, संप्रभु समानता, विकास का अधिकार, हस्तक्षेप-निषेध और ग्लोबल साउथ के सहयोग पर ज़ोर देती है।

दरअसल, अमेरिका को चिंता इस बात की रही है कि चीन उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था को बदल रहा है। इसी कारण पूर्व बाइडेन प्रशासन ने अपने सुरक्षा रणनीति दस्तावेज में चीन को revisionist power कहा था। अब तक अमेरिका की यह शिकायत थी कि कि चीन बिना कहे अमेरिका केंद्रित विश्व ढांचे को बदलने के प्रयास में है। ट्रंप की यात्रा की खासियत यह रही कि इस दौरान चीन ने ये बात खुल कर अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने कह दी!

इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर चीन और अमेरिका के बीच टकराव को खत्म करना असंभव है। फिलहाल चीन ने टकराव को एक सीमा के अंदर रखने और उसे यथासंभव संभालने के लिए आपसी संबंध में ‘रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता’ का फॉर्मूला भर दिया है। ये फॉर्मूला तभी तक कारगर रहेगा, जब तक अमेरिका चीन की लक्ष्मण रेखाओं का पालन करे। मगर, अमेरिका के लिए भी लंबे समय तक ऐसा करना कठिन होगा, क्योंकि उस स्थिति में चीन अपनी ताकत में बढ़ोतरी करता रहेगा, जिससे स्वतः दुनिया पर उसका प्रभाव बढ़ता जाएगा। आखिर अमेरिकी शासक वर्ग इसे कब तक बर्दाश्त करेंगे!

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