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एसीओ और ब्रिक्स पर ट्रंप का साया

महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर दुनिया पर हर हाल में अपना वर्चस्व कायम रखने पर आमादा अमेरिका और उसके बरक्स बहु-ध्रुवीय दुनिया के निर्माण की कोशिशों से जुड़े देशों के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है। नतीजा है कि अब दोनों तरफ दांव लगा कर चलना कठिन होता जा रहा है। इस नई स्थिति का तनाव ब्रिक्स+ और एससीओ के वे सदस्य देश महसूस कर रहे हैं, जो हाल तक इस राह पर चलते रहे। उनकी दुविधा का साया इन दोनों समूहों पर पड़ा है।

अपनी स्थापना के 25 साल पूरा कर चुके शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का 26वां शिखर सम्मेलन 31 अगस्त-1 सितंबर को किर्गिजिस्तान की राजधानी बिशकेक में हुआ। इसके बाद ध्यान 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन पर आकर टिक गया है। ये दोनों वो मंच हैं, जिनकी चर्चा अक्सर एक साथ जोड़ कर होती है। इसलिए कि अभी हाल तक इन्हें नई विश्व व्यवस्था का ध्वजवाहक समूह समझा जाता था। ध्यान देने की बात यह है कि इनमें से किसी मंच की स्थापना इस मकसद से नहीं हुई थी। मगर 2022 में यूक्रेन पर रूस की विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू होने के बाद बनी विश्व परिस्थितियों में दोनों मंचों से वैसी की आस जोड़ ली गई (या यह कहा जाए कि इन देश-समूहों ने वैसी आस जगा दी)।

मगर अब स्थिति यह है कि वैसी बड़ी संभावनाओं को लेकर कुछ शक और कई सवाल माहौल में तैरते नज़र आते हैं। इसकी वजह ट्रंप काल में दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अमेरिका से मिली प्रत्यक्ष चुनौती है। इससे दुनिया में अनिश्चय और अस्थिरता का माहौल बना है। बतौर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय व्यवहार की मूलभूत मर्यादाओं को भी तिलांजलि दे दी है। इससे बने नए हालात में तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों को अपनी भूमिका की फिर से तलाश करनी पड़ रही है। एससीओ और ब्रिक्स+ के सामने भी ऐसी चुनौती पेश आई है।

यहां यह स्पष्ट कर लेना उचित होगा कि यह बात इन मंचों का महत्त्व कम करके बताने के लिए नहीं कही जा रही है। बल्कि इसका उल्लेख यह समझने के क्रम में किया जा रहा है कि ब्रिक्स (BRICS+ और एससीओ (SCO) के सामने अब नई चुनौतियां क्या हैं? ये मंच ग्लोबल साउथ के देशों को पश्चिमी (मुख्यतः अमेरिकी) वर्चस्व से निकलने का माध्यम बनने में फिलहाल कितने सक्षम हैं? और क्या सभी विकासशील देशों के शासक वर्ग असल में ऐसा करने को इच्छुक भी हैं?

ट्रंप काल में जो हकीकत सामने दिखी है, उससे ही ये सवाल पैदा हुए हैं। जिस समय अमेरिका कम-से-कम सैद्धांतिक और दिखावटी रूप से ही सही- अंतरराष्ट्रीय कानून, आम सहमति से निर्णय, और ‘वैश्विक हित’ के प्रति निष्ठा जताता था, ग्लोबल साउथ के देशों के लिए नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसी बातें करना उतना जोखिम भरा नहीं था। लेकिन जब उन निष्ठाओं को अमेरिका सिरे से नकार दिया है, और दुनिया को ताकत के जरिए अपने माफिक चलाने पर आमादा दिखता है, तब ज्यादातर देशों के शासक तबके उससे बिगाड़ मोल ना लेने में ही अपना भला देखने लगे हैं। इसलिए एससीओ और ब्रिक्स+ में होने वाली बातों और उनके व्यवहार के बीच का फासला बढ़ता चला जा रहा है।

वैसे भी ग्लोबल साउथ के ज्यादातर देशों का आम रुख जारी व्यवस्था और उसके विकल्प की चर्चा- दोनों तरफ दांव लगा कर चलने का रहा है। लेकिन ट्रंप काल में ऐसा करना कठिन होता गया है। भारत इन दोनों स्थितियों का एक खास उदाहरण है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब अमेरिका ने रूस और चीन विरोधी गोलबंदी शुरू की, तो उसका सक्रिय हिस्सा बनने के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीदारी जारी रखी। इसे तब भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की मिसाल बताया गया। लेकिन जब ट्रंप काल में अमेरिका ने सचमुच पेच कसा, तो इस कथित स्वायत्तता को बरकरार रखना भारत के लिए कठिन हो गया। ऐसी स्थितियां अनेक देशों के सामने पेश आई हैं।

भविष्य में ऊर्जा संबंध के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस संबंधी प्रतिमान एक ऐसा मसला बनने जा रहा है, जिस पर विभिन्न देशों के लिए “रणनीतिक स्वायत्तता” का पालन कठिन होता जाएगा। चीन के शंघाई में जुलाई में हुए एआई समिट के दौरान 29 देशों ने WAICO (World Artificial Intelligence Cooperation Organization) के गठन संबंधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इनमें से तीन- ब्राजील, इंडोनेशिया, और कजाख़स्तान अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका के भी सदस्य हैं। WAICO में शामिल उज्बेकिस्तान ने अब पैक्स सिलिका में भी शामिल होने की इच्छा जताई है। इनमें से ब्राजील और इंडोनेशिया ब्रिक्स+ के सदस्य हैं, जबकि कजाखस्तान और उज्बेकिस्तान एससीओ के।

WAICO की स्थापना के बाद अमेरिका ने दो-टूक कहा कि देशों को एआई तकनीक और मानकों के मामले में चीन या अमेरिका में से किसी एक पक्ष को चुनना होगा। अमेरिकी विदेश विभाग का एक ड्राफ्ट पत्र सामने आया, जिसमें कहा गया है कि अगर कोई देश अमेरिकी नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका गठबंधन का हिस्सा है, तो वह चीनी नेतृत्व वाले WAICO जैसे प्रतिस्पर्धी ढांचों में शामिल नहीं हो सकता। जाहिर है, बहुत जल्द ब्राजील, इंडोनेशिया, कजाखस्तान आदि को इस बारे में फैसला करना होगा।

संदेश यह है कि महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर दुनिया पर हर हाल में अपना वर्चस्व कायम रखने पर आमादा अमेरिका और उसके बरक्स बहु-ध्रुवीय दुनिया के निर्माण की कोशिशों से जुड़े देशों के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है। नतीजा है कि अब दोनों तरफ दांव लगा कर चलना कठिन होता जा रहा है। इस नई स्थिति का तनाव ब्रिक्स+ और एससीओ के वे सदस्य देश महसूस कर रहे हैं, जो हाल तक इस राह पर चलते रहे। उनकी दुविधा का साया इन दोनों समूहों पर पड़ा है।

इसी साये में ब्रिक्स+ का 18वां वार्षिक शिखर सम्मेलन आयोजित होगा। मेजबान भारत ने इस सम्मेलन की विषयवस्तु “धीरज, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण” (Building for Resilience, Innovation, Cooperation, and Sustainability) तय की है। यह भावात्मक विषयवस्तु है, जिसका सीधा अर्थ है कि मेजबान देश ने ऐसा ठोस विषय रखने से बचने की कोशिश की, जिससे किसी नई विश्व व्यवस्था की दिशा में जाने का संकेत मिलता। हाल के वर्षों में दुनिया में कारोबार की नई मौद्रिक व्यवस्था कायम करना ब्रिक्स+ की एक खास विषयवस्तु रहा है। बोलचाल में इसे ‘डी-डॉलराइजेशन’ (डॉलर पर निर्भरता कम करना) कहा जाता रहा है।

साल 2024 में रूस में आयोजित शिखर सम्मेलन में ‘ब्रिक्स क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट इनिशिएटिव’ (BRICS Cross-Border Payments Initiative) की शुरुआत की गई थी। 2025 में ब्राजील में आयोजित शिखर सम्मेलन में इस पर चर्चा को आगे बढ़ी। वहां व्यापार और भुगतान में घरेलू मुद्राओं का उपयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। कुछ खबरों के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक ने 2026 के शिखर सम्मेलन के एजेंडे में ब्रिक्स देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDCs) को आपस में जोड़ने (Interoperability) के मुद्दे को शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। यह प्रस्ताव भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच भुगतान के ऐसे प्रयोग के अनुभवों पर आधारित है।

मगर यह सवाल बना हुआ है कि क्या नरेंद्र मोदी सरकार इस प्रस्ताव को शिखर सम्मेलन के एजेंडे में सचमुच अहमियत देगी? ज्यादा संभावना यही है कि डी-डॉलराइजेशन के मुद्दे पर असंगति और असहमति बनी रहेगी। ब्रिक्स+ की मुश्किल यह है कि बारी-बारी से मिलने वाली अध्यक्षता साल-दर-साल प्राथमिकताओं को बदल देती है। हर मेजबान देश अपने रणनीतिक हितों के मुताबिक एजेंडा तय करता है। भारत उन देशों में है, जो अमेरिका के साथ संबंध और डॉलर के प्रति अमेरिकी संवेदनशीलता को लेकर अत्यधिक सतर्क हैं।

और बात सिर्फ डी-डॉलराइजेशन की नहीं है। सर्व-प्रमुख मुद्दा यह है कि कोई देश नई विश्व व्यवस्था की जरूरत को किस गहराई से महसूस करता है? यहां जब हम देश की बात करते हैं, तो जाहिर है, उसका अर्थ वहां के शासक वर्ग से होता है। हकीकत यह है कि अधिकांश देशों के शासक वर्गों ने अपने हित अमेरिका केंद्रित वैश्विक साम्राज्यवाद से गहराई से जोड़ रखे हैं। ऐसे में वे इस व्यवस्था के भीतर स्वायत्तता तो चाहते हैं, लेकिन उसे खुलेआम चुनौती देना अपने वर्ग हित में नहीं मानते। और अब जबकि अमेरिका ने इस व्यवस्था की रक्षा करने के लिए आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है, तो इन सरकारों के लिए ऐसा रुख अपनाना और भी कठिन हो गया है, जिसमें अमेरिकी अधिकारियों के नाराज होने का जोखिम हो।

पहले वेनेजुएला और फिर ईरान पर अमेरिकी युद्ध अपने वैश्विक वर्चस्व को जताने और आगे बढ़ाने की अमेरिकी शासक वर्ग बेहिचक रणनीति का ही परिणाम रहे हैं। इन युद्धों के जरिए साम्राज्य के संचालकों ने यह दो टूक पैगाम देने की कोशिश की कि संप्रभुता आधारित किसी विश्व व्यवस्था को वे स्वीकार नहीं करते। ईरान के हाथों अमेरिका की अप्रत्याशित रणनीतिक पराजय से फिलहाल उसका अश्वमेधी घोड़ा बंध गया है, लेकिन यह नई छिड़ी लड़ाई का सिर्फ एक अध्याय है।

वेनेजुएला और ईरान के मामलों में ब्रिक्स+ और एससीओ के सदस्य देशों ने कैसी प्रतिक्रिया दी- नई परिस्थितियों के प्रति उनके रुख को समझने का यह सबसे आसान माध्यम है। उदाहरण के लिए ईरान को दुनिया में “पराया” बनाने के मकसद से छेड़े गए अमेरिका के “आर्थिक डी-डे” (Economic D-Day) अभियान पर ध्यान देना उचित होगा। इस पर चीन की प्रतिक्रिया सिर्फ एक राजनयिक आपत्ति तक सीमित नहीं रही। बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कैसे संचालित किया जाना चाहिए, इस बारे में उसकी सोच उसकी प्रतिक्रिया के जरिए दुनिया के सामने आई।

यह प्रतिक्रिया चीन की पारंपरिक समझ के अनुरूप है। चीन ऐसे मामलों में अपनी सोच अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पर आधारित रखता है। यह ‘कानून-आधारित विश्व व्यवस्था’ (law based world order) की भाषा है, जहां वैधता उन बाध्यकारी नियमों से मिलती है, जिन्हें देशों ने अंतरराष्ट्रीय संधियों में स्वीकार किया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर, उसके तहत हुई अनेक संधियां, और सुरक्षा परिषद के आदेश (Mandates) शामिल हैं। इस तर्क के अनुसार जबरिया कदम (coercive measures) तभी वैध होते हैं, जब उनका कोई मान्यता प्राप्त कानूनी आधार हो। सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे इससे भटकाने वाले कदम हैं। इसलिए उन प्रतिबंधों का पालन करने के लिए कोई देश बाध्य नहीं है। ऐसे प्रतिबंध देशों की संप्रभु समानता, उनकी सहमति और बहुपक्षीय प्रक्रिया का अनादर करते हुए लगाए जाते हैं।

अमेरिकी रुख एक अलग अवधारणा पर टिका हुआ है। उसने अब तो ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ (rule based order) की बात भी छोड़ दी है, लेकिन जब वह ऐसा करता था, तब भी उसके ‘नियम’ अनिवार्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं होते थे। वे नियम और मानदंड खुद अमेरिका बनाता था और मानमाने ढंग से उन्हें लागू करता था। इसी ढांचे के भीतर अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंधों और ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum pressure) की रणनीति अपनाई।

यह समझने की बात है कि चीन जब ऐसे प्रतिबंधों पर आपत्ति जताता है- जो अंतरराष्ट्रीय कानून या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आदेश के तहत नहीं हों, तो वह विश्व संचालन की अमेरिकी धारणा को खारिज करता है। अमेरिकी धारणा का आधार यह सोच है कि कोई एक देश बाकी सबके लिए नियमों की परिभाषा और व्याख्या कर सकता है और एकतरफा ढंग से उन्हें लागू कर सकता है।

सोच का यह अंतर केवल ईरान युद्ध तक सीमित नहीं है। ना ही जो समझ चीन फिलहाल रख रहा है, उसका संबंध सिर्फ उससे या उसके हितों से है। दरअसल, जब नई विश्व व्यवस्था की बात की जाती है, तो उसका मतलब उस चलन को बदलना होता है, जो अब तक प्रचलित रहा है। आने वाले दशकों में नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कायम करने की कोशिश के साथ यह मौलिक सवाल जुड़ा रहेगा कि क्या विभिन्न देशों को संचालित करने वाले नियम सार्वभौमिक (universal) होंगे, या वे इस पर निर्भर करेंगे कि उन्हें परिभाषित और लागू करने की ताकत किसके पास है?

ट्रंप काल में अमेरिका ने खुलेआम ताकत के सिद्धांत की वकालत की है। वेनेजुएला पर हमला करने और वहां के निर्वाचित राष्ट्रपति का अपहरण करने के लिए उसने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई मामला तैयार करने की कोशिश नहीं की। बल्कि ट्रंप ने सीधे कहा कि वेनेजुएला के तेल भंडार पर कब्जा करने के लिए उन्होंने ये कदम उठाया। ईरान के तेल टैंकरों पर जब अमेरिकी नौ सेना ने कब्जा कर लिया, तो ट्रंप ने खुलेआम कहा कि अमेरिकी फौज ने समुद्री डाकुओं की तरह व्यवहार किया। उन्होंने गर्व के साथ कहा- हम समुद्री डाकू हैं। (इस वर्ष एक मई को वॉशिंगटन की रैली में उन्होंने कहा था- “We took over the ship, we took over the cargo, we took over the oil। It’s a very profitable business। We’re like pirates। We’re sort of like pirates but we are not playing games।”)

जब वैश्विक पूंजीवाद के केंद्र, वर्तमान साम्राज्यवादी व्यवस्था के नेता और सबसे शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति खुलेआम और गर्व के साथ अपने देश को डाकू बताने लगे, तो बाकी दुनिया के लिए जो संदेश है, उसे आसानी से समझा जा सकता है। उस समय नई विश्व व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता कहीं अधिक जाहिर हो जाती है। ऐसे में ब्रिक्स+ और एससीओ को नई भूमिका ग्रहण करनी चाहिए थी। लेकिन चूंकि इनके सदस्य अनेक देशों के शासक वर्ग comprador (बिचौलिये) की भूमिका में हैं, इसलिए नई परिस्थिति इन देश-समूहों के लिए नई चुनौती बन गई है। क्या इसके बीच वे नई राह निकाल पाएंगे, इसे देखने पर अब निगाहें टिकी हैं।

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