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सियासी इस्लाम पर सोचने की हिम्मत कहां?

अंबेडकर ने साफ शब्दों में लिखा है कि, ”मुस्लिम राजनीति अनिवार्यतः मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को मान्यता देती है हिन्दू और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। …. नायपॉल ने घायल सभ्यता में वर्णन किया है वह इस्लामी आक्रमणों का दिया घाव ही है, जिस से भारत उबर नहीं पाया‌ है। इस के बावजूद, विडंबना ही है कि भारत ने अपनी बरबादियों से इतना कम सबक सीखा। …हिन्दू नेता और बौद्धिक उस पर चुप रहे हैं।

राजनीतिक इस्लाम की समझ जरूरी-1

संभवतः पहली बार किसी बड़े भारतीय नेता — योगी आदित्यनाथ — ने राजनीतिक इस्लाम पर ध्यान देने की जरूरत बताई। इस विषय से भारत का इतिहास और भविष्य गहराई से जुड़ा है। यह कितना महत्वपूर्ण है, यह इसी से समझ सकते हैं कि समाजवादी पार्टी के नेता जियाउर्रहमान बर्क के सिवा सब ने योगी की बात पर चुप्पी रखी। यह असामान्य चुप्पी भी दिखाती है कि विषय गंभीर है।‌

साथ ही, यह चुप्पी यहाँ अब तक की परंपरा के अनुरूप ही है। यद्यपि आधुनिक काल में अनेक मनीषियों ने भी उस पर ऊँगली रखी, और इस के बावजूद कि अयोध्या में राम मंदिर पुनर्स्थापना का ऐतिहासिक आंदोलन, और भारत की केंद्रीय सत्ता में चेहरों का परिवर्तन भी उस विषय से जुड़ा हुआ है। पर भारत के राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग में मानसिक हिचक बनी हुई है। योगी आदित्यनाथ ने हिचक तोड़ने का आरंभ किया। यह स्वागत योग्य है।

निस्संदेह, राजनीतिक इस्लाम भारत ही नहीं पूरे विश्व के लिए गंभीर विषय है। अर्थात् वह राजनीति जो इस्लाम के अनुसार चलती है। इस्लाम एक है, और आरंभ से ही स्पष्ट रूप में स्थाई नमूने के साथ निर्धारित है। इसीलिए, पूरी दुनिया में उस के दावे, क्रिया-कलाप, और परिणाम सदियों से मूलतः एक समान रहे हैं। भारत उस का सब से महत्वपूर्ण हस्तक्षेप क्षेत्र रहा है, न केवल पिछले हजार वर्ष के इतिहास में वरन आज भी। इसी बिन्दु को योगी आदित्यनाथ ने रेखांकित किया। इस पर सही समझ रखना अपरिहार्य है।

योगी ने कहा, ‘‘देश में अंग्रेजों के शासन, ब्रिटिश उपनिवेश की चर्चा होती है। पर राजनीतिक इस्लाम की कहीं चर्चा नहीं होती। इस ने (भारत की) आस्था पर सर्वाधिक कुठाराघात किया। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ हमारे पूर्वज लड़े थे। लेकिन राजनीतिक इस्लाम के खिलाफ भी हमारे पूर्वजों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी थीं। छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा का हम इसीलिए स्मरण करते हैं। इसीलिए उन को राष्ट्रनायक के रूप में सम्मान देते हैं। लेकिन यह राजनीतिक इस्लाम वही है आज भी राष्ट्र माता के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा के साथ कार्य कर रहा है।’’

वस्तुत: यह भूमिका राजनीतिक इस्लाम यहाँ पहले भी दिखा चुका है। भारत-विभाजन का बुनियादी कारण वही था। मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने इस्लाम का ही दावा रखा था। उन के शब्दों में, ”हिन्दू और मुसलमान दो भिन्न सभ्यताओं से जुड़े हैं जिन के विचार और धारणाएं एक-दूसरे से विपरीत हैं। वे भिन्न-भिन्न स्त्रोतों से प्रेरणाएं लेते हैं। उन की प्रेरक कथाएं, नायक, और प्रसंग बिलकुल अलग-अलग हैं। प्रायः एक के लिए जो नायक हैं, वह दूसरे लिए खलनायक रहे हैं। उसी तरह उन की जीत और हार भी दोनों के लिए ऊपर-नीचे पड़ती रहती हैं।” (22 मार्च 1940 )

इस में सरलता से देख सकते हैं कि यह दावा स्थाई है। इस में कोई शिकायत नहीं है, बल्कि हर हाल में अलग और विरुद्ध रहने का दावा है। दूसरे धर्मावलंबियों को खारिज करने, यानी इस्लामी एकाधिकार और राजनीतिक एकाधिकार का दावा। जिस में सह-अस्तित्व खारिज है। ऐसी विकट समस्या का समाधान पहले उस से आँख मिलाकर देखने, और खुली वैचारिक चुनौती देकर ही संभव है। यानी, वैचारिक और राजनीतिक, दोनों प्रकार की दृढ़ता। उतनी ही खुली दृढ़ता, जो राजनीतिक इस्लाम रखता है। क्यों कि यह अस्तित्व की लड़ाई है। जिसमें बीच का रास्ता नहीं होता।

अतः राजनीतिक इस्लाम के दावे को नकारना, तथा उसे वैचारिक, यानी मनोवैज्ञानिक रूप से भी हराना अनिवार्य है। निर्विकल्प और खुल‌ कर हराना। पर यह तभी होगा जब इस की सही समझ हो। जिस के अभाव में ही भारत, नये सिरे से, पिछले सौ सालों से तबाह होता रहा है। शक्ति की कमी से नहीं, बल्कि समझ की कभी से। राजनीतिक इस्लाम के खुले दावे से आँख चुराने और झूठी कल्पनाओं से चलने के कारण।

राजनीतिक इस्लाम के प्रति गफलत के कारण ही गाँधीजी और कांग्रेस ने 1919 में खलीफत आंदोलन को समर्थन देकर इस्लामी अलगाव और दबदबे की मानसिकता को हवा दी। श्रीअरविन्द जैसे मनीषी ही नहीं, एनी बेसेंट जैसे नेताओं ने भी इस के विरुद्ध चेतावनी दी थी। किन्तु गफलत की गई। फिर उस से भी सबक नहीं लिए गए। जिस कारण ही फिर एकाएक देश का विभाजन भी कर लिया गया। क्योंकि खलीफत-समर्थन की भयंकर गलती पर पर्दा डालने के लिए इस्लामी राजनीति पर विचार विमर्श के बदले चुप्पी रखी गयी, ताकि गाँधी और कांग्रेस की भूल छिपाई जाए। फिर वही दुहराव खुशी-खुशी भारत-विभाजन करके किया गया — मानो वह केवल प्रॉपर्टी और कुर्सी का बँटवारा हो! असलियत तुरंत मालूम हो गई जब इस्लाम ने लाखों सिखों-हिन्दुओं को ‘धर्मांतरण या मौत’ का विकल्प दिया।

तब फिर, पंजाब और बंगाल के प्रति गाँधी और कांग्रेस के विश्वासघात को छिपाने के लिए, देश-विभाजन के पूरे प्रसंग पर भी स्थाई पर्दा डाल दिया गया! फलत: राजनीतिक इस्लाम के प्रति वही नासमझी बदस्तूर बनी रही। फलत: उस के वही परिणाम, गणितीय निश्चितता से, लगातार होते रहे। आगे कश्मीर से भी हिन्दुओं का सफाया, और बचे हुए बंगाल, असम, तथा अनेक क्षेत्रों में वही प्रक्रिया बिलकुल एक ही पैटर्न से, कभी धीरे, कभी झटके में निरंतर चल रही है।

इसे केवल ‘डेमोग्राफी’ का मामला बताना फिर वही भूल है। डेमोग्राफी बदलना एक परिणाम भर है, कारण नहीं। मूल कारण राजनीतिक इस्लाम है। जिस की रणनीति और कार्यनीति में किसी समाज, और अंततः पूरे विश्व पर इस्लाम का शासन ही एक मात्र लक्ष्य है। इस के फलस्वरूप डेमोग्राफी बदलती है, बदलनी ही है। अतः डेमोग्राफी बदलना रोकने का एक ही उपाय हैं कि राजनीतिक इस्लाम को हराएं। न कि गैर-मुस्लिम लोग अधिक बच्चे पैदा करें — जो एक मूर्खतापूर्ण सलाह है, जो राजनीतिक इस्लाम के प्रति घोर अज्ञान रखने वाले ही दे सकते हैं।

यह कितनी रोचक, और हिन्दुओं के लिए लज्जाजनक बात है, कि जहाँ राजनीतिक इस्लाम ने सदैव अपनी टेक एक और दो-टूक बनाए रखी, और उस के लिए लड़ता रहा — वहीं हिन्दू समाज के नेताओं ने — हर प्रकार के नेताओं ने — सदैव नयी-नयी बनावटी बातें, नई-नई झूठी सलाहें, और नई-नई आत्म-प्रवंचनाएं, कल्पनाएं ही दिखाई हैं। किसी हिन्दू नेता ने, गाँधी से‌ लेकर आज तक, इस्लाम के राजनीतिक दावे को उस की ही जमीन पर संबोधित करने का काम नहीं किया। योगी आदित्यनाथ ने पहले की है, पर यह देखा जा सकता है कि आम हिन्दू नेता मुँह चुरा रहे हैं। उन्हें गाँधीजी की तरह अपनी प्रवंचनाएं और सुखानुभूति अधिक प्यारी है।

ठीक इसीलिए राजनीतिक इस्लाम सब पर भारी है। अपनी डेमोग्राफिक ताकत नहीं, बल्कि अपनी मनोवैज्ञानिक दृढ़ता के कारण। जो वहाँ भी दिखती है, जहाँ मुस्लिम आबादी 18 प्रतिशत है, और वहाँ भी दिखती है जहाँ वह मात्र 8 प्रतिशत है। इसलिए डेमोग्राफी को मुद्दा बनाना अपने को भरमाना है। ऐसे भ्रमित महानुभावों को यह सोचना चाहिए कि 82 प्रतिशत गैर-मुस्लिम आबादी के सामने 18 प्रतिशत मुस्लिम कैसे डटकर अपनी चलाने की जिद रखते हैं? यह संगठन की बात भी नहीं है। क्यों कि सब देख सकते हैं कि दर्जनों फिरकों में बँटे रहकर भी, अकेले मुस्लिम नेता भी जम कर अपनी चलाते हैं। और उन के सामने ‘दुनिया के सब से बड़े संगठन’ संघ-परिवार के सैकड़ों नेता और सत्ताधारी बगलें झाँकते नजर आते हैं!

इसीलिए, क्योंकि सभी तरह के हिन्दू नेता मुस्लिमों की मूल शक्ति — इस्लामी मतवाद — पर आदर रखते हुए उसे चुनौती नहीं देते। इस तरह, असली कारण को भुलाकर नकली कारणों के फेर में गलत उपाय करते रहते हैं। फलत: सदैव हारते हैं। धीरे-धीरे भी, और एकाएक भी। यह हाल का खुला इतिहास है। भारत में राजनीतिक इस्लाम पर खुले विचार-विमर्श पर संकोच के कारण ही उसे लगातार वाक-ओवर मिलता रहा है। इसी संकोच, इसी गफलत में गत सौ साल से भारत की सारी विभीषिका छिपी है।

इस से पहले नोबल पुरस्कृत लेखक वी. एस. नायपॉल ने राजनीतिक इस्लाम पर ऊँगली रखी थी। अपनी पुस्तक ‘भारत – एक घायल सभ्यता’ (1977) में नायपॉल ने भारत में छः सौ साल चले इस्लामी शासनकाल के बारे में यहाँ छाई चुप्पी को रेखांकित किया था। उन्होंने कहा कि यहाँ ब्रिटिश उपनिवेशवाद की चर्चा खूब की जाती है, जबकि उस से पहले के इस्लामी राज और हमलों द्वारा किए गये आमूल विध्वंस और पूर्ण संहार पर चुप्पी रखी जाती है। जिस के कारण भारतीय सभ्यता 18 सदी के मध्य तक लगभग मृतप्राय हो चुकी थी। इस्लामी हमलों और संहारों में सब से पहले, और निश्चित रूप से, समाज के विचारवान लोगों का, समाज के ‘माथे’ का — ब्राह्मणों, भिक्षुओं, शिक्षकों, और वीरों का — ही खात्मा किया जाता था।

इस प्रकार, नायपॉल के अनुसार 18 वीं सदी तक भारत का आम हिन्दू समाज कबंध हो चुका था। सिर‌-विहीन धड़ जैसा। उस में पुनः थोड़ी जान अंग्रेजों का राज बनने के बाद आई, जब अंग्रेजों ने प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करना, उन के बीच से अपने लिए सहयोगी, कर्मचारी, अधिकारी, आदि बनाने का आरंभ किया। सो, नायपॉल ने जिस घाव का वर्णन किया है वह इस्लामी आक्रमणों का दिया घाव ही है, जिस से भारत उबर नहीं पाया‌ है। इस के बावजूद, विडंबना ही है कि भारत ने अपनी बरबादियों से इतना कम सबक सीखा। जो बात नायपॉल या योगी आदित्यनाथ ने रखी, उसी को गर्व से इस्लामी नेता भी अपने अंदाज में कहते रहे हैं। उन का तमाम व्यवहार और कार्य-योजनाएं भी वही रही हैं। पर हिन्दू नेता और बौद्धिक उस पर चुप रहे हैं।

इस के अपवाद केवल डॉ. भीमराव अंबेडकर थे। उन की पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ (1940) में राजनीतिक इस्लाम का एक संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट आकलन है। अंबेडकर के शब्दों में, ”मुस्लिम राजनीति अनिवार्यतः मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को मान्यता देती है – हिन्दू और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। जीवन के किसी भी धर्मनिरपेक्ष तत्व का मुस्लिम समुदाय की राजनीति में कोई स्थान नहीं है, और वे मुस्लिम राजनीतिक जमात के केवल एक ही निर्देशक सिद्धांत के सामने वे नतमस्तक होते हैं, जिसे मजहब कहा जाता है।” यह मजहब इस्लाम है।

इसीलिए, राजनीतिक इस्लाम की कोई अलग किताब नहीं है। मूल इस्लामी पुस्तकें — मुहम्मद की जीवनी, कुरान, और हदीस — ही इस्लामी राजनीति का निर्देशन करती हैं। उसी में इस्लामी राजनीति की रणनीति, कार्यनीति और कूटनीति बताई गई है। जहाँ गैर-मुस्लिमों की बड़ी संख्या हो, वहाँ इस में छल और दिखावे का प्रयोग केंद्रीय तत्व होता है। जिसे डॉ अम्बेदकर ने ‘ग्रावामिन पॉलिटिक’ की संज्ञा दी थी। जिस में ”मुख्य रणनीति यह हो कि शिकायतें पैदा करके सत्ता हथियाई जाए।’’ अर्थात मुस्लिम राजनीति निरंतर शिकायतें करते हुए कपटपूर्वक दबाव बनाती है। जो ”निर्बल की आशंका का स्वांग करती है, किन्तु वास्तव में ताकतवर की राजनीतिक रणनीति है।” अम्बेदकर के अनुसार, यह इस्लामी राजनीति हिन्दुओं के साथ बराबरी नहीं, बल्कि उन के ऊपर वरिष्ठता हासिल करने के लक्ष्य से प्रेरित है।

यह सब अम्बेदकर ने 1940 में ही लिखा था! किन्तु अपने अहंकार और इस्लाम के प्रति भ्रम में गाँधी, नेहरू, आदि तमाम कांग्रेस नेताओं ने उस की उपेक्षा की। नतीजा बंगाल और पंजाब के लाखों हिन्दुओं और सिखों का विनाश हुआ। फिर, उसे छिपाने में आगे भी वही गफलत की गई। इस दुष्चक्र को तोड़ना, यानी राजनीतिक इस्लाम को जानना पहली जरूरत है। (जारी)

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