युद्ध तीन हफ़्ते चले या तीन महीने, जब ख़त्म होगा तो ईरान अगर हारा तो हार कर भी जीत जाएगा और इज़राइल-अमेरिका जीते भी तो जीत कर हार जाएंगे। इस युद्ध का नतीजा कुछ भी निकले, एक बात तय है कि इस के बाद किसी भी देश पर आक्रमण करने की हिम्मत अमेरिका बरसों-बरस नहीं करेगा।
दुनिया भर को हर वक़्त अपनी धौंसबाज़ी के तेवर दिखाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ईरान से उलझने के बाद भीतर से इतने भयभीत हो गए हैं कि अंडे के आकार वाले अपने दफ़्तर में आसपास खड़े पादरियों के साथ थरथर मुद्रा में बैठे पूजा-पाठ कर रहे हैं। ट्रंप ने अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों से चुनींदा पादरियों को ओवल ऑफिस बुलाया। पादरियों ने अपने हाथ ट्रंप के बदन पर रखे और प्रार्थना की कि ‘इस चुनौतीपूर्ण दौर में‘ उन्हें ‘अलौकिक मार्गदर्षन‘ और ‘बु़द्धमत्ता’ हासिल हो। अमेरिकी सेना की हिफ़ाज़त के लिए भी पादरियों ने विशेष आराधना की। ट्रंप अर्चना-वंदना की पूरी अवधि में अपनी कुर्सी पर सिर झुका कर बैठे रहे और मन-ही-मन कुछ बुदबुदाते रहे।
इस पूजन के मुख्य पादरी टॉम मुलिन्स थे। वे दक्षिण फ्लोरिडा के क्राइस्ट फैलोशिप चर्च के संस्थापक हैं। पादरी बनने के पहले वे फुटबॉल-कोच थे। पॉम बीच गार्डन्स में रहते हैं। ट्रंप का मूल निवास मार-ए-लागो रिसॉर्ट क्लब भी पॉम बीच गार्डन्स में ही है। पूजा-पाठ के बारे में मुलिन्स ने बताया है कि हम ने परमपिता से प्रार्थना की है कि वे ट्रंप के दिलो-दिमाग को इस मौक़े पर विवेक-बुद्धि से ओतप्रोत रखें। हम ने देवलोक से यह अनुरोध भी किया है कि वह अमेरिकी सेना की रक्षा करे।
लक्षण साफ हैं। ट्रंप बाहर से दहाड़ रहे हैं, मगर अंदर-ही-अंदर ख़ुद की मिमियाहट ख़ुद ही सुन रहे हैं। उन्हें अहसास हो गया है कि ईरान के मामले में वे बुरी तरह फंस गए हैं। ईरान को ले कर उन का आकलन ग़लत निकल गया है। तबाह होते ईरान ने इज़राइल को भी बर्बाद करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है। अरब और खाड़ी के मुल्क़ों में जितने भी अमेरिकी सैन्य अड्डे थे, उन्हें ईरान ने तक़रीबन ध्वस्त कर दिया है। अमेरिकी प्रशासन को ईरान की तरफ़ से इतने असरदार प्रतिकार का अंदाज़ नहीं था। सो, अब ट्रंप को लग रहा है कि उन्होंने इज़राइली प्रधानमंत्री बैंजामिन नेतन्याहू के चक्कर में अच्छी-ख़ासी मुसीबत मोल ले ली है।
ईरान-प्रसंग में अमेरिका दुनिया में अकेला-सा पड़ गया है और ट्रंप अमेरिका में अकेले पड़ गए हैं। अमेरिकी संसद से ले कर वहां की सड़कों तक पर ट्रंप विरोधी माहौल है। उन्हें अमेरिका को नाहक एक परेशानी में फंसाने के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ भी ईरान युद्ध की बेहद सख़्ती से निंदा कर चुका है। ज़्यादातर देश ईरान पर हमले को अनुचित बता चुके हैं। इन में वे देश भी शामिल हैं, जो आमतौर पर अमेरिका के हमजोली और हमसफ़र माने जाते हैं। ज़ाहिर है कि इस सब ने ट्रंप के आत्मविश्वास को भीतर से बुरी तरह हिला दिया है और वे पालनहारे की शरण में चले गए हैं। ‘तेरे बिन हमरा कौनो नाहीं’ की यह मनोदशा किन परिस्थितियों में व्यक्ति का आलिंगन करती है, आप जानते ही हैं।
युद्ध तीन हफ़्ते चले या तीन महीने, जब ख़त्म होगा तो ईरान अगर हारा तो हार कर भी जीत जाएगा और इज़राइल-अमेरिका जीते भी तो जीत कर हार जाएंगे। इस युद्ध का नतीजा कुछ भी निकले, एक बात तय है कि इस के बाद किसी भी देश पर आक्रमण करने की हिम्मत अमेरिका बरसों-बरस नहीं करेगा। ईरान युद्ध से दुनिया भर में उस की दादागीरी का, उस की धौंसपट्टी का, उस की लुच्चागिरी का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा है। यह यु़द्ध ट्रंप की व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा पर भी पूर्ण विराम लगाने वाला साबित होगा।
ईरान युद्ध से किस-किस की अर्थव्यवस्था पर क्या-क्या असर पड़ेगा, इस का विश्लेषण अलग-अलग विशेषज्ञ हर रोज़ कर रहे हैं। युद्ध के नफ़ा-नुक़्सान पर ‘जाकी रही भावना जैसी’ के आवरण से झांकती टिप्पणियां हम आजकल दिन-रात सुन-पढ़ रहे हैं। इस युद्ध से पूरी दुनिया पर होने वाले तरह-तरह के प्रभावों को हम आने वाले दिनों में देखेंगे-भुगतेंगे। मगर जो सब से बड़ा और तक़रीबन अमिट असर यह युद्ध छोड़ कर जाएगा, वह यह होगा कि दशकों-दशक लोग यह याद करेंगे कि, अमेरिका और इज़राइल तो छोड़िए, किस तरह अपने-अपने स्वार्थ साधने की हवस में किन-किन मुल्क़ों ने नैतिकता और न्याय के सिद्धांतों को उठा कर ताक पर रख दिया था?
अर्थवान लोग कभी नहीं भूलेंगे कि कैसे, जब शांति वार्ताएं जारी थीं और चौबीस घंटे बाद एक समझौते पर दस्तखत करने के आसार पूरी तरह बन गए थे, तब अमेरिकी बघर्रे ने ईरानी मेमने पर खराब हो गई अपनी नीयत को एकदम नंगा कर दिया और कौन-कौन फिर भी तमाशबीन बना रहा? कैसे, जब तमाम अंतरराष्ट्रीय नियम-परंपराओं को लात मार कर किनारे कर देने के बाद एक सार्वभौम मुल्क़ के सर्वोच्च नेता की हत्या कर दी गई तो किन-किन की ज़ुबान से अफ़सोस के दो लफ़्ज़ भी नहीं निकले? कैसे जब भारत का मेहमान बन कर आए हथियारविहीन ईरानी युद्धपोत को अपने घर वापस जाते वक़्त अमेरिकी पनडुब्बी ने हिंद महासागर में टारपीडो से ध्वस्त कर दिया तो, बाकी तो छोड़िए, मेज़बान तक की ज़बान भी ख़ामोश ही बनी रही?
लोग याद करेंगे कि एक ऐसा भी वक़्त था, जब पांच-छह हज़ार बरस पुरानी सभ्यता को अपने में समाए एक मुल्क़ के अनीतिपूर्ण विध्वंस पर, उतनी ही पुरानी सभ्यता की विरासत वाले एक देश में ऐसे लोग भी मौजूद थे, जिन की ख़ुषी का कोई ठिकाना नहीं था। वे इस बर्बादी का ज़श्न मना रहे थे। कौन भूलेगा कि विश्व राजनय के मूल्यों, परंपराओं और पवित्रता का जब पूरी निर्लज्जता से चीरहरण हो रहा था तो यह दृश्य देख कर भी किस-किस की पराक्रमी छाती सिकुड़ कर चूं-चूं बन गई थी?
मुझे तो अच्छी तरह याद है। आप को भी याद है न कि जब अलगू चौधरी अपने दोस्त जुम्मन शेख के खि़लाफ़ फ़ैसला देने से हिचकिचा रहा था तो खाला जान ने उस से क्या सवाल किया था? खाला जान ने पूछा था, ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?’ प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर में खाला जान का यह प्रश्न इतिहास का सब से मार्मिक प्रश्न है। यही प्रश्न आज मुझे अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के सिर पर मंडराता दिख रहा है। यही प्रश्न मुझे अपने चौथे स्तंभ के पीछे से झांकता दिखाई दे रहा है कि बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न कहोगे?
इस सवाल को परे धकेलने वाले आने वाली पीढ़ियों के गुनाहगार होंगे। हमारी भावी नस्लें उन पर इसलिए शर्म करेंगी कि एक समय ऐसा भी आया था कि अन्याय का प्रतिकार गौतम और गांधी के जिस देश की जन्मघुट्टी में था, उस के तत्कालीन कर्णधार अपने गुदगुदे गद्दों की लिप्सा में अपने फ़र्ज़ निभाना भूल गए थे। भारत का भविष्य नज़रें उठा कर जी सके, ऐसा कुछ करने में अभी भी शायद बहुत देर नहीं हुई है। देखें, क्या होता है?
